भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 179

भाषाटीकासमेत । ( १६१ ) असाध्यलक्षण । यदा दाहार्त्तितोदार्त्तो वेपनः पुरुषो भवेत् । ऊरुस्तम्भस्तदा हन्यात्साधयेदन्यथा नवम् ॥ १० ॥ जिस समय पुरुष दाह, शूल और तोद (नोचनेकीसी पीडा) इनसे पीडित होकर कंपयुक्त होय उस समय वह ऊरुस्तंभरोग उसका नाश करे है और ये लक्षण न होंय और रोग नया होय तो यह रोग साध्य है ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्य्यबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायाम् ऊरुस्तम्भनिदानं समाप्तम् ॥ अथामवातनिदानम् । विरुद्धाहारचेष्टस्य मन्दाग्नेर्निश्चलस्य च । स्निग्धं भुक्तवतो ह्यन्नं व्यायामं कुर्वतस्तथा ॥ १ ॥ वायुना प्रेरितो ह्याभः श्लेष्मस्थानं प्रधावति । तेनात्यर्थं विदग्धोऽसौ धमनीः प्रति- पद्यते ॥ २ ॥ वातपित्तकफैर्भूयो दूषितः सोऽन्नजो रसः । स्रोतांस्यभिस्पन्दयति नानावर्णोऽतिपिच्छिलः ॥ ३ ॥ जन- यत्याशु दौर्बल्यं गौरवं हृदयस्य च । व्याधीनामाश्रयो ह्येष आमसंज्ञोऽतिदारुणः ॥ ४ ॥ युगपत्कुपितावेतौ त्रिकसन्धि- प्रवेशकौ । स्तब्धं च कुर्वतो गात्रमामवातः स उच्यते ॥ ५ ॥ विरुद्ध आहार (क्षीर-मत्स्यादि) और विरुद्ध विहार करनेवाले मनुष्यकी, मन्द अग्निवालेकी, जो दंडकसरत न करे और चिकना अम्ल खायकर दण्डकसरत करने- वाले ऐसे पुरुषकी आम वायुसे प्रेरित होकर कफके आमाशयादि स्थानके प्रति जायकर (प्राप्त होय) और उस कफसे अत्यन्त दूषित होकर वही आम धमनीनाडि- योंमें प्राप्त होकर भीतर वह अन्नका रस (आम) वात और कफपित्तसे दूषित होकर नाडियोंके छिद्रोंमें भरजाय, वह अनेक प्रकारके रंगका अतिगाढा होय है और शीघ्र दुर्बलताको तथा हृदयको भारी करता है । व्याधिके उत्पन्न करनेका (आश्रय) स्थान है अर्थात् प्रायः रोग आमाशयके विकृत होनेपरही होता है । इस अत्यन्त भयंकर रोगकी आमसंज्ञा कही है । पीछे यह वात कफ एक ही कालमें ७