भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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( १४६ ) माधवनिदान । पैरकी उंगली, घोंटू, हृदय, पेट, उरःस्थल और गला इन ठिकानोंमें रहा जो वायु वह वेगवान् होकर जो वहां नसोंका जाल उसको सुखाय बाहर निकाल दे उस मनुष्यके नेत्र स्थिर होजायँ, मोडा रहिजाय, पसवाडोंमें पीडा होय, मुखसे कफ गिरे और जिससमय मनुष्य धनुषके सदृश नीचेको नवजाय तब वह बली वायु अन्तरायाम रोगको करे ॥ बाह्यायामके लक्षण । बाह्यः स्नायुप्रतानस्थो बाह्यायामं करोति च । तमसाध्यं बुधाः प्राहुर्वक्षःकट्यूरुभञ्जनम् ॥ ३६ ॥ बाहरकी नसोंमें रहती जो वात सो बाह्यायाम अर्थात् पीठको बांकी कर दे उरस्थल कमर और जांघोंको मोड दे, ऐसे इस रोगको पंडित असाध्य कहते हैं ॥ अब पूर्वोक्त आक्षेपकको पित्तकफका अनुबन्ध होता है, उसको कहते हैं- कफपित्तान्वितो वायुर्वायुरेव च केवलः । कुर्यादाक्षेपकं त्वन्यं चतुर्थमभिघातजम् ॥ ३७ ॥ कफपित्तयुक्त वायु अथवा केवल वायु आक्षेपकरोगको करे और दूसरा कहिये दण्डापतानकादि तीनोंकी अपेक्षा चतुर्थ अभिघातज आक्षेपक रोगको करे । इसके लक्षण-“ यदा तु धमनीः सर्वाः ” इत्यादि पूर्वोक्त सामान्यलक्षणोंसे जानने । इस श्लोकका गदाधरने ऐसा अर्थ करा है कि, 'कफपित्तान्वितः' इत्यादि निमित्तभेद करके चार प्रकारका आक्षेपकरोग प्रगट हो, सो ऐसे एक कफान्वित वायुसे, दूसरा पित्तान्वित वायुसे, तीसरा केवल वायुसे और चौथा दंडादिके चोट लगनेसे कुपित वायुसे । इस पक्षमें गर्भपात और रुधिरका अतिस्राव जो होता है सो केवल वातजन्य जानना और उस ठिकाने बारंबार आक्षेपक होता है । इसका कारण यह है कि, ये सब आक्षेपकके भेद हैं ॥ असाध्यत्वको कहते हैं- गर्भपातनिमित्तश्च शोणितातिस्रवाच्च यः । अभिघातनिमित्तश्च न सिद्ध्यत्यपतानकः ॥ ३८ ॥ गर्भपातके होनेसे अथवा अति रक्तस्त्रावके होनेसे अथवा अभिघात कहिये दण्डादिकोंकी चोट लगनेसे जो प्रगट अपतानकरोग सो असाध्य है ॥ पक्षाघातके लक्षण । गृहीत्वाऽर्धं तनोर्वायुः शिरास्नायू विशोष्य च । पक्षमन्यतरं हन्ति सन्धिबन्धान्विमोक्षयन् ॥ ३९ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA