भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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( १४४ ) माधवनिदान । वृते ॥ २३ ॥ स्वेददाहौष्ण्यमूर्च्छाः स्युः समाने पित्तसंयुत । कफेन संगे विण्मूत्रे गात्रहर्षश्च जायते ॥ २४ ॥ अपाने पित्त- युक्ते तु दाहौष्ण्यं रक्तमूत्रता । अधःकाये गुरुत्वं च शीतता च कफावृते ॥ २५ ॥ व्याने पित्तावृते दाहो गात्रविक्षेपणं क्लमः । स्तंभनो दंडकश्चापि शोथशूलौ कफावृते ॥ २६ ॥ प्राणवायु पित्तसंयुक्त होनेसे वमन और दाह उत्पन्न होय और कफसंयुक्त होनेसे दुर्बलपना, ग्लानि, तन्द्रा और मुखमें विरसता ये होयँ । उदानवायु पित्त- युक्त होनेसे दाह, मूर्च्छा, भ्रम, अनायास श्रम ये होयँ और कफयुक्त होय तौ पसीना नहीं आवे, रोमाञ्च, अग्नि मन्द होय और शीत लगे । समानवायु पित्तयुक्त होनेसे पसीना, दाह, गरमी और मूर्च्छा ये होते हैं और कफयुक्त होनेसे मलमूत्रका रुकना और रोमाञ्च होय । अपानवायु पित्तयुक्त होनेसे दाह, गरमी, लाल मूत्र होता है और अपानवायु कफयुक्त हो तो कमरके नीचेके भागमें भारीपना और सरदीका लगना होय । व्यानवायु पित्तयुक्त होनेसे दाह गात्रोंका विक्षेप अर्थात् इधर उधरका फेरना और श्रम होय और कफयुक्त होनेसे शरीर लकडीके समान स्तंभ होय, सूजन और शूल होय । इस जगह प्राणादि पंच वायुओंके परस्पर मिलनेसे बीस प्रकारके आवरण चरकोक्त जान लेने और वाग्भटके मतसे आवरण बाईस प्रकारके हैं, हमने ग्रन्थके विस्तारभयसे छोड दिये हैं ॥ आक्षेपकके सामान्य लक्षण । यदा तु धमनीः सर्वाः कुपितोऽभ्येति मारुतः । तदा क्षिपत्याशु मुहुर्मुहुर्देहं मुहुश्चरः । मुहुर्मुहुस्तदाक्षेपादाक्षेपक इति स्मृतः ॥२७॥ जिस कालमें वायु कुपित होकर सब धमनी नाडियोंमें जाकर प्राप्त होय तब उस जगह वह बारम्बार संहार करके देहको बारंबार आक्षिप्त करती है अर्थात् हाथीपर बैठनेवाले पुरुषके समान सब देहको चलायमान करे उस देहको बारम्बार चलानेको आक्षेपक रोग कहते हैं ॥ आक्षेपकके अपतन्त्र और अपतानक ऐसे दो अवस्था- विशेषको कहते हैं-- क्रुद्धः स्वैः कोपनैर्वायुः स्थानादूर्ध्वं प्रवर्त्तते । पीडयन् हृदयं गत्वा शिरःशंखौ च पीडयेत् ॥ २८ ॥ धनुर्वन्नामयेद्गात्रा- १-ऊर्ध्वाधस्तिर्यग्गा धमनीः ।