माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 161, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( १४३ ) मांस और मेदमें वायुके पहुँचनेसे अंग भारी हो जाय, चोटनेकेसे पीडा होय अथवा निश्चल होजाय अथवा मुक्का मारनेकीसी तथा लकडी मारनेकीसी पीडा होय और थकापन होय ॥ मज्जास्थिगत वायुके लक्षण । मेदोऽस्थिपर्वणां सन्धिशूलं मांसबलक्षयः । अस्वप्नः सतता रुक् च मज्जास्थिकुपितेऽनिले ॥ १८ ॥ मज्जा और हड्डी इन ठिकानेपर वायुका कोप होनेसे हडफूटनी हो, संधिसन्धिमें पीडा हो, मांस बल ये क्षीण हो जायँ, निद्रा आवे नहीं और निरन्तर पीडा हो ॥ शुक्रगत वायुके लक्षण । क्षिप्रं मुञ्चति बध्नाति शुक्रं गर्भमथापि वा । विकृतिं जनयेच्चापि शुक्रस्थः कुपितोऽनिलः ॥ १९ ॥ शुक्रस्थानकी वायुका कोप होनेसे वह वायु शुक्रको जल्दी पतन करे और बंधन करे, अथवा गर्भको जल्दी छोडे और बंधन करे और गर्भका अथवा शुक्रका विकार प्रगट करे ॥ शिरागत वायुके लक्षण । कुर्याच्छिरागतः शूलं शिराकुञ्चनपूरणम् । स बाह्याभ्यन्तरायामं खल्लीं कुब्जत्वमेव च ॥ २० ॥ वायु शिरा (नाडी) गत होनेसे शूल, नाडीका संकोच और स्थूलत्व करे और बाह्यायाम, आभ्यन्तरायाम, खल्ली और कुबडापना इन रोगोंको उत्पन्न करे ॥ स्नायुगत और संधिगत वायुके लक्षण । सर्वाङ्गैकाङ्गरोगांश्च कुर्यात्स्नायुगतोऽनिलः । हन्ति संधिगतः सन्धीञ्छूलशोथौ करोति च ॥ २१ ॥ वायु स्नायुगत होनेसे सर्वांग और एकांग रोगको करे, संधिगत होनेसे सन्धिका विश्लेष (जुदा जुदा होना) और सन्धिका जकड जाना तथा शूल और सूजन इन रोगोंको प्रगट करे ॥ पित्त और कफ इनस आवृत्त हुई प्राणादिक वायुके आधे आधे श्लोकोंमें लक्षण कहते हैं- प्राणे पित्तावृते छर्दिर्दाहश्चैवोपजायते । दौर्बल्यं सदनं तन्द्रा वैरस्यं च कफावृते ॥ २२ ॥ उदाने पित्तयुक्ते तु दाहो मूर्च्छा भ्रमः क्लमः । अस्वेदहर्षौ मन्दाग्निः शीतता च कफा- CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA