माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
भाषाटीकासमेत । ( ३७९ ) उपविष्टगर्भके लक्षण । गर्भिणी स्त्रीके अत्यन्त दाहकर्ता पदार्थ खानेसे रुधिरका स्राव बहुत होय इसीसे वह गर्भ पीछे बढ़ता न दीखे, उसका हलना चलनामात्र होय ऐसे गर्भको उपविष्ट कहते हैं। यह विष्टम्भ गर्भकाही भेद है ॥ मंथरज्वर ( मोतीज्वर ) के लक्षण । ( योगरत्नसे ) ज्वरो दाहो भ्रमो मोहो ह्यतीसारो वमिस्तृषा । अनिद्रा मुखशोषश्च तालु जिह्वा च शुष्यति ॥ १ ॥ ग्रीवायां परिदृश्यन्ते स्फोटकाः सर्षपोपमाः । घृताशनात्स्वेदरोधाम्मंथरो जायते नृणाम् ॥ २ ॥ अधिक घृत खानेसे, अथवा पसीना रोकनेसे, मनुष्यको मंथनज्वर ( मोतीज्वर ) आता है। इसके लक्षण कहते हैं-ज्वर, दाह, भ्रम, मूर्च्छा, अतीसार, वमन, प्यास, निद्रानाश, मुख तालु और जीभ इनका सूखना, कंठमें सरसोंके समान सफेद मोतीके आकार फोडे होयँ, इस ज्वरको माधवने पित्तज्वरके अन्तर्गत माना है इसीसे इसको पृथक् नहीं कहा, परन्तु व्यवहारमें इसको पृथक् मानते हैं तथा बहुतसे ग्रंथकारोंने इसका नाम जुदा कहकर चिकित्सा भी पृथक् कही हैं ॥ अलर्क ( कुत्ते ) के विषनिदान । ( वाग्भट्टसे ) शूनः श्लेष्मोल्बणा दोषाः संज्ञां संज्ञावहाश्रिताः । मुष्णन्तः कुर्वते क्षोभं धातूनामतिदारुणम् ॥ १ ॥ लालावानन्धबधिरः सर्वतः सोऽभिधावति । स्रस्तपुच्छहनुस्कंधः शिरोदुःखी नताननः ॥ २ ॥ कुत्तेके कफादिक दोष संज्ञाके बहानेवाले स्रोतों ( छिद्रों ) में प्रवेश करके संज्ञा नाशके सदृश करे और उसकी धातुओंका क्षोभ करे इस योगसे उस कुत्तेके मुखसे लार बहे, तथा वह अंधा बहरा होकर इधर उधर दौडने लगे, उसकी पूंछ सीधी हो जाय और थोडी कंधा ढीले हो जायँ, इसको बावला कुत्ता कहते हैं ॥ उसके काटनेके लक्षण । दंशस्तेन विदष्टस्य सुप्तः कृष्णं सरत्यसृक् । हृच्छिरोरुग्ज्वरस्तम्भस्तृष्णा मूर्छोद्भवोऽनु च ॥ ३ ॥ उस बावले कुत्तेके काटनेसे काटनेकी जगह शून्य हो जाय, उसमेंसे काला रुधिर
( ३८० ) माधवनिदानका परिशिष्ट ।
( ३८० ) माधवनिदानका परिशिष्ट । बहे, तथा उस मनुष्यका हृदय और मस्तक दूखे, ज्वर होय, देह जकड जाय, प्यास लगे तथा मूर्च्छा आवे ॥ अनेनान्येऽपि बोद्धव्या व्याला दंष्ट्राप्रहारिणः । शृगालाश्वतराश्वर्क्षद्वीपिव्याघ्रवृकादयः ॥ ४ ॥ इस प्रकार डाढा प्रहार करनेवाले सर्प, स्यार, खच्चर, घोडा, रीछ, चीता, वाघ, भेडिया, आदिशब्दसे सिंह वानर आदि इनके लक्षण भी कुत्तेके समान जानने ॥ सविष निर्विषदंशके लक्षण। कण्डूनिस्तोदवैवर्ण्यसुप्तिक्लेदज्वरभ्रमाः । विदाहरागरुक्पाक- शोफग्रंथिविकुंचनम् ॥ ५ ॥ दंशावदरणं स्फोटाः कर्णिका मण्डलानि च । सर्वत्र सविषे लिंगं विपरीतं तु निर्विषे ॥ ६ ॥ खुजली, नोचनेकीसी पीडा, वर्णका बदलना, शून्यता, क्लेद, ज्वर, भ्रम, दाह लाली, दर्द, पकना, सूजन, गांठ, चोंटनी, काटनेकी जगह चीरा पडे, फोडा, कर्णिका मण्डल असाध्य ये लक्षण सविष दांतके होते हैं। इसके विपरीत लक्षण निर्विषके जानने ॥ असाध्य लक्षण। दष्टो येन तु तच्चेष्टां रुदन् कुर्वन्ति नश्यति । पश्यंस्तमेव चाकस्मादादर्शसलिलादिषु ॥ ७ ॥ जिस प्राणीका काटा हुआ मनुष्य उसी प्राणीकी सब चेष्टा करे और रुदन करे तथा आदर्श (शीसा) पानी आदि पदार्थोंमें उसी प्राणीका प्रतिबिंब देखे वह रोगी मरजाय ॥ जलसंत्रासनामाके लक्षण। योऽद्भ्यस्त्रस्येददृष्टोऽपि शब्दसंस्पर्शदर्शनैः । जलसन्त्रासनामानं दष्टं तमपि वर्जयेत् ॥ ८ ॥ पुरुष पानीके शब्द स्पर्श और अवलोकन (देखने) से डरपे उसको जल- संत्रासनामा कहते हैं। उसको भी वैद्य त्याग देवे ॥ कोई शंका करे कि, जल बिना देखे कैसे मनुष्य डरता है इसवास्ते कहते हैं- अदृष्टस्यापि जन्तोर्हि जलत्रासो भवेद्यदि । तस्यारिष्टं हि विषजं ब्रुवते विषचिन्तकाः । जलं विना जलत्रासो जायते श्लेष्मसंचयात् ॥ ९ ॥ जिस मनुष्यको जलके बिना देखे भय भी लगे, उसको विषज्ञवैद्य विषजरोग कहते हैं। यह जल बिना जलसे त्रास कफके सञ्चयसे होता है सो लिखते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
बुद्धिस्थानं यदा श्लेष्मा केवलं प्रतिपद्यते ॥ १० ॥
भाषाटीकासमेत । (३८१) बुद्धिस्थानं यदा श्लेष्मा केवलं प्रतिपद्यते ॥ १० ॥ तदा बुद्धौ निरुद्धायां श्लेष्मणाधिष्ठितो नरः । जाग्रत्सुप्तोऽथ वात्मानं मज्जन्तामिव मन्यते ॥ सलिलत्रासदा तन्द्रा जलत्रासं तु तं विदुः ॥ ११ ॥ जिस समय कफ केवल बुद्धिके स्थानमें जाकर प्राप्त होता है तब इस पुरुषकी कफकरके बुद्धि आच्छादित होनेसे जागते सोते अपने आपको जलमें डूबा हुआ जाने, इसी कारण वह मनुष्य जलसे डरता है, इसीसे इसको जलत्रास जानना ॥ अब विषनिदानमें कह आये हैं कि, विश्वंभरा, अहिंडूका, कण्डूमका, शूकवृ- न्तादि, पिपीलिका, गौधेरका और सर्षपिका इनका निदान परिशिष्टके अन्तमें लिखेंगे सो यहां सुश्रुतसे लिखते हैं- गौधेरकदंशके लक्षण । प्रतिसूर्यः पिंगभासो बहुवर्णो महाशिराः। तथा निरुपमश्चापि पंच गौधेरकाः स्मृताः ॥ १२ ॥ तैर्भवन्तीह दष्टानां वेग- ज्ञानानि सर्पवत् । रुजश्च विविधाकारा ग्रन्थयश्च सुदारुणाः ॥१३॥ प्रतिसूर्य, पिंगभास, बहुवर्ण, महाशिरा, निरुपम ये पांच प्रकारके गौधेरक (गौहेरा) होते हैं । इनके काटनेके वेग और ज्ञान सर्पके समान जानना और अनेक प्रकारके रोग तथा दारुण गांठ प्रगट होंय, गौधेरककी उत्पत्ति ग्रन्थान्तरोंमें लिखीहै ॥ सर्षपिकादंशके लक्षण । गलगोली श्वेतकृष्णा रक्तराजी तु मण्डला ॥ १४ ॥ सर्वश्वेता सर्षपिकेत्येवं षट् । ताभिर्दष्टे सर्षपिकावर्ज्यं दाहशोफक्लेदा भवन्ति । सर्षपिकया हृदयपीडातिसारश्च ॥ १५ ॥ गलगोली, श्वेतकृष्णा, रक्तराजी, रक्तमण्डला, सर्वश्वेता, सर्षपिका इस प्रकार सर्षपिकाके छः भेद हैं । इनमें सर्षपिकाको छोडकर बाकी गलगोली आदिके काट- नेसे दाह, सूजन और क्लेद होय और सर्षपिकाके काटनेके पूर्वोक्त लक्षण होवें और हृदयमें पीडा तथा अतिसार होय ॥ विश्वम्भरादष्टके लक्षण । विश्वम्भराभिर्दष्टे दंशः सर्षपिकाकाराभिः । पिडिकाभिश्चीयते शीतज्वरार्त्तश्च पुरुषो भवति ॥ १६ ॥ १ कृष्णसर्पेण गोधायां भवेज्जन्तुश्चतुष्पदः । सर्पो गौधेरको नाम तेन दष्टो न जीवति ॥
( ३८२ ) माधवनिदानका परिशिष्ट ।
( ३८२ ) माधवनिदानका परिशिष्ट । विश्वंभराके काटनेकी ठौर सरसोंके समान फुन्सियोंसें व्याप्त हो और शीत ज्वर- करके रोगी व्याकुल होय ॥ अहिंडुकादष्टके लक्षण । अहिंडुकाभिर्दष्टे तोददाहकण्डूश्वयथुका मोहश्च । अहिंडुकाके काटनेकीसी पीडा, दाह, खुजली, सूजन, मोह होय ॥ कण्डूमकादष्टके लक्षण । कण्डूमकादिभिर्दष्टे पीतांगश्छर्द्यतीसारज्वरादिभिर्हन्यते ॥ १७ ॥ कण्डूमका कीडोंके काटनेसे देह पीली हो जाय, वमन, अतिसार और ज्वरादि- रोगोंसे मनुष्य पीडित होय ॥ शूकवृन्तादिदष्टके लक्षण । शूकवृन्तादिभिर्दष्टे कण्डूकोठाः प्रवर्द्धन्ते शूकश्चात्र लक्ष्यते । शूकवृन्तादि कीडोंके काटनेसे खुजली, चकत्ता और शूकरोग हों ॥ पिपीलिकादंशलक्षण । पिपीलिका। स्थूलशीर्षा संवाहिका ब्राह्मणिकांगुलिका कपि- लिका चित्रवर्णेति षट् । ताभिर्दष्टे दंशे श्वयथुरग्निस्पर्शविदा- हशोफौ भवतः ॥ १८ ॥ स्थूलशीर्षा, संवाहिका, ब्राह्मणिका, अंगुलिका, कपिलिका, चित्रवर्णा ये छः प्रकारकी पिपीलिका (चेंटी) हैं इनके काटनेकी जगह सूजन, अग्निस्पर्शके समान दाह और चकत्ते और सूजन होवें ॥ स्नायुके निदान । शाखासु कुपितो दोषः शोथं कृत्वा विसर्पवत् । भिनत्ति तंक्षते तत्र सोष्मा मांसं विशोष्य च ॥ १ ॥ कुर्यात्तन्तुनिभं जीवं वृत्तं सितद्युतिं बहिः । शनैः शनैः क्षताद्याति च्छेदात्कोप- मुपैति च ॥ २ ॥ तत्पाताच्छोफशान्तिः स्यात्पुनः स्थानां- तरे भवेत् । स स्नायुकेति विख्यातः क्रियोक्ता तु विसर्पवत् ॥ ३ ॥ बाह्वोर्यदि प्रमादेन जंघयोस्तुद्यते क्वचित् । संकोचं खंजतां चैव छिन्नो जन्तुः करोत्यसौ ॥ ४ ॥ हाथ पैरोंमें दोष कुपित होकर विसर्पके सदृश सूजन होय, वह सूजन फूट कर घाव पडजावे और उसमें आभ्यंतरीय अग्नि, मांसके शुष्क करके सूतके समान गोल सफेद जीव डोरके सदृश बाहर निकले वह जीव धीरे धीरे घावसे CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( ३८३ ) बाहर निकले समय टूट जावे तो बहुत दुःख देता है, यदि वह समग्र बाहर निकल आवे तो सूजन जाती रहे और उसमेंसे कुछ टुकडा बाकी रहजावे तो वह फिर दूसरे स्थानपर निकले । उस रोगको स्नायुक (नहरुआ) कहते हैं, इसपर चिकित्सा विसर्परोगकीसी कही है, कदाचित् हाथ वा पैरोंमें नहरुआ होकर टूट जावे तो पैरसे टोंटा अथवा लूला होजाय ॥ ध्वजभंगके संगृहीत श्लोक । यौवनेऽनङ्गवेगेन शिशुना केलिमाचरेत् । गुह्यदोषेण तल्लिङ्गे शैथिल्यमुपजायते । स्वगुदोत्पाटनं बाल्ये परैः कारयति स्वयम् । कुरुते तेन दोषेण ध्वजभङ्गोऽभिजायते । अथवा यो भवेन्मर्त्यः करमैथुनलम्पटः । तस्य नूनं प्रजायेत ध्वज- भंगे सुदुर्जयम् ॥ ' करमैथुनं ' हथरस इति प्रसिद्धः ॥ रोगानुक्रमणिका । ज्वरोऽतिसारो ग्रहणी अर्शोऽजीर्णी विषूचिका । अलसँश्च विलम्बी च कृमिरुकू पाँण्डुकामलौ ॥ १ ॥ हलीमकं रक्तै- पित्तं राजयक्ष्मा उरःक्षतम् । कासो हिक्का सहश्वासैः स्वरेभे- दस्त्वरोचकँम् ॥ २ ॥ छ॑र्दिष्टृष्णौ च मूर्च्छाद्याँ रोगाः पानात्ययादयः । दोहोन्माँदावपस्माँरः कथितोऽथाऽऽनिलाँ- मयः ॥ ३ ॥ वातरक्तमुरुस्त॑म्भ आमवा॑तोऽथ शूलरुँक् । पित्तजं शूलैमानाह उदा॑वर्त्तोऽथ गुल्मरुँकँ ॥ ४ ॥ हृद्रोगो मूत्रकृच्छ्रं च मूत्राघा॑तस्तथाइमरी । प्र॑मेहो मधु॑मेहश्च पिटि- काश्चै प्रमेहजाः ॥ ५ ॥ मेदँस्तथोद॑रं शोथो वृद्धिश्चै गल- गंडकैः । गण्डँमालाऽप॑चीग्रैन्थिर्बुदं श्लीपैदं तथा ॥ ६ ॥ विद्रधिव्रणशोथैश्च द्वौ व्र॑णौ भग्नर्नाडिके । भग्नर्देरोपदंशौ च शूकँदोषस्त्वर्गामयः ॥ ७ ॥ शीतैपित्तमुदर्देश्च कोठैश्चै- वाम्लैपित्तकम् । विसर्पश्च सविस्फोटैः सरोमान्त्यौ मसूँ- रिकाः ॥ ८ ॥ क्षुद्राऽऽस्यैर्कर्णैनासौऽक्षि" शिरैः स्त्रीबौँलक- ग्रहाः । विषं चेत्ययमुद्देशो रुग्विनिश्चयसंग्रहे ॥ ९ ॥
( ३८४ ) माधवनिदानका परिशिष्ट ।
( ३८४ ) माधवनिदानका परिशिष्ट । अर्श ( बवासीर ), छर्दी ( रद्द ), मूर्च्छाय ( मूर्च्छा भ्रम तन्द्रा निद्रा संन्यास पानात्यय मदात्यय ), अपस्मार ( मृगी ), अनिलामय ( वातव्याधि ), आनाह ( अफरा ), गुल्म ( गोलेका रोग ), अश्मरी ( पथरी ), वृद्धि ( अंडवृद्धि ), ग्रन्थि ( गांठ ), त्वगामय ( कोढरोग ), आलस्य ( मुखरोग ), ग्रह ( पूतनादिबालग्रह ) ये हमने कठिन शब्दोंके अर्थ लिख दिये हैं, रोगानुक्रमणिका लिखनेका यह प्रयोजन है कि इतने रोम इस ग्रन्थमें कहे हैं इससे विशेष रोग प्रक्षिप्त जानने ॥ टीकाकर्त्ताकी वंशावली । श्रीमन्माथुरमण्डले द्विजकुले श्रीमाथुराणां कुले घासीराम इति प्रथामधिगतो जातः सतां मोदकृत् । श्रीचन्द्रः किल रामचन्द्रविबुधो जातो हरिश्चन्द्रकः पुत्रास्ते त्रितयीव धर्मनिपुणा सर्वे नृपैः पूजिताः ॥ १ ॥ श्रीमन् माथुरमण्डल द्विजकुल श्रीमाथुर ( चौबे ) नके कुलमें श्रीघासीराम इस नामसे प्रसिद्ध सज्जन मनुष्योंको आनन्दकर्त्ता प्रगट भये उनके श्रीचन्द्र और परम बुद्धिमान् रामचन्द्र और हरिश्चन्द्र ये तीन पुत्र वेदत्रयी ( ऋक् साम यजुष ) के समान और सर्व राजमान्य प्रगट भये ॥ तेषां हरिश्चन्द्रसमानकीर्तिर्जातो हरिश्चन्द्रगुणाभिरामः । बभूव तस्मात्किल कृष्णलालः संगीतशास्त्रार्थविचारदक्षः ॥ २ ॥ तिन घासीरामके तीन पुत्रोंमें हरिश्चन्द्रके समान कीर्ति जिनकी ऐसे हरिश्चन्द्र भये, तिनके संगीतशास्त्र (गानविद्या) के अर्थ विचारमें कुशल कन्हैयालाल प्रगट होते भये॥ तस्य पुत्रस्त्वहं जज्ञे दत्तरामो विमूढधीः । भाषायां माधवस्यार्थो यथामति मयोरितः ॥ ३ ॥ तिन कन्हैयालालका पुत्र मैं तुच्छ बुद्धिवाला दत्तराम प्रगट हुआ, मैं अपनी बुद्धिके अनुसार माधवनिदानका अर्थ भाषामें निरूपण किया ॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः ॥
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