भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । (३८१) बुद्धिस्थानं यदा श्लेष्मा केवलं प्रतिपद्यते ॥ १० ॥ तदा बुद्धौ निरुद्धायां श्लेष्मणाधिष्ठितो नरः । जाग्रत्सुप्तोऽथ वात्मानं मज्जन्तामिव मन्यते ॥ सलिलत्रासदा तन्द्रा जलत्रासं तु तं विदुः ॥ ११ ॥ जिस समय कफ केवल बुद्धिके स्थानमें जाकर प्राप्त होता है तब इस पुरुषकी कफकरके बुद्धि आच्छादित होनेसे जागते सोते अपने आपको जलमें डूबा हुआ जाने, इसी कारण वह मनुष्य जलसे डरता है, इसीसे इसको जलत्रास जानना ॥ अब विषनिदानमें कह आये हैं कि, विश्वंभरा, अहिंडूका, कण्डूमका, शूकवृ- न्तादि, पिपीलिका, गौधेरका और सर्षपिका इनका निदान परिशिष्टके अन्तमें लिखेंगे सो यहां सुश्रुतसे लिखते हैं- गौधेरकदंशके लक्षण । प्रतिसूर्यः पिंगभासो बहुवर्णो महाशिराः। तथा निरुपमश्चापि पंच गौधेरकाः स्मृताः ॥ १२ ॥ तैर्भवन्तीह दष्टानां वेग- ज्ञानानि सर्पवत् । रुजश्च विविधाकारा ग्रन्थयश्च सुदारुणाः ॥१३॥ प्रतिसूर्य, पिंगभास, बहुवर्ण, महाशिरा, निरुपम ये पांच प्रकारके गौधेरक (गौहेरा) होते हैं । इनके काटनेके वेग और ज्ञान सर्पके समान जानना और अनेक प्रकारके रोग तथा दारुण गांठ प्रगट होंय, गौधेरककी उत्पत्ति ग्रन्थान्तरोंमें लिखीहै ॥ सर्षपिकादंशके लक्षण । गलगोली श्वेतकृष्णा रक्तराजी तु मण्डला ॥ १४ ॥ सर्वश्वेता सर्षपिकेत्येवं षट् । ताभिर्दष्टे सर्षपिकावर्ज्यं दाहशोफक्लेदा भवन्ति । सर्षपिकया हृदयपीडातिसारश्च ॥ १५ ॥ गलगोली, श्वेतकृष्णा, रक्तराजी, रक्तमण्डला, सर्वश्वेता, सर्षपिका इस प्रकार सर्षपिकाके छः भेद हैं । इनमें सर्षपिकाको छोडकर बाकी गलगोली आदिके काट- नेसे दाह, सूजन और क्लेद होय और सर्षपिकाके काटनेके पूर्वोक्त लक्षण होवें और हृदयमें पीडा तथा अतिसार होय ॥ विश्वम्भरादष्टके लक्षण । विश्वम्भराभिर्दष्टे दंशः सर्षपिकाकाराभिः । पिडिकाभिश्चीयते शीतज्वरार्त्तश्च पुरुषो भवति ॥ १६ ॥ १ कृष्णसर्पेण गोधायां भवेज्जन्तुश्चतुष्पदः । सर्पो गौधेरको नाम तेन दष्टो न जीवति ॥