भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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( ३७८ ) माधवनिदानका परिशिष्ट । प्रजोत्पादने न समर्थाः ॥ १३ ॥ तत्र वातवर्णवेदनं वातेन । पीतवर्णवेदनं पित्तेन । श्लेष्मवर्णवेदनं श्लेष्मणा । शोणित- वर्णपित्तवेदनं रक्तेन । कुणपगन्ध्यनल्पं च रक्तेन पित्तेन च । ग्रंथीभूतं श्लेष्मवाताभ्यां पूयनिभं पित्तवाताभ्यां क्षीणं शुक्रं प्रागुक्तं पित्तवाताभ्यां मूत्रपुरीषगंधि सर्ववर्णवेदनं सन्नि- पातेनेति तेषु कुणपग्रंथिपूयक्षीणरेतः कृच्छ्रसाध्या मूत्र- पुरीषरेतसोऽसाध्याः ॥ वात, पित्त, कफ, रुधिर इनसे दूषित हुआ शवगंधि और बहुत दुर्गंध युक्त तथा राधके समान ऐसा जिस पुरुषका रेत ( वीर्य ) होय उसके सन्तान नहीं होय, जिसका वीर्य वादीसे दुष्ट होय उसका वर्ण काला, लाल होय । तथा उसमें तोदा- दिक पीडा होय । पित्तसे दुष्टहुए शुक्रका वर्ण पीला, नीला इत्यादि वर्णोंका होय तथा उसमें चोषादि पीडा होय । कफसे दुष्टहुए शुक्रका वर्ण श्वेत होय, तथा उसमें मन्द पीडा होय, रुधिरसे दुष्ट हुए शुक्रका वर्ण लाल होवे उसमें चोषादि ( चूसने- कीसी पीडा होय ) तथा रुधिरसे दूषित शुक्रमें मुर्देकीसी बास आवे और विशेष ऐसा हो-कफसे दूषित हुआ शुक्र गांठदार होय, पित्त कफसे दूषित शुक्रमें राध- कीसी वास आवे । पित्तवातसे शुक्र क्षीण होता है । सन्निपातसे दूषितभये शुक्रमें पूर्वोक्त सब वर्ण होयँ और पीडा होय तथा उसमें मूत्र और विष्ठाकीसी बास आवे, इनमें कुणप, ग्रंथि, पूय, क्षीणरेतस ये चार कृच्छ्रसाध्य हैं और पुरीष ( विष्ठा ) रेतस असाध्य और बाकीके सब साध्य हैं ॥ आर्त्तवदोषके लक्षण । आर्त्तवमपि त्रिभिर्दोषैः शोणितचतुर्थैः पृथग्द्वन्द्वैः समस्तै- श्चोपसृष्टमबीजं भवति । तदपि दोषवर्णवेदनाभिर्ज्ञेयम् । तेषु कुणपग्रंथिपूतिपूयक्षीणमूत्रपुरीषप्रकाशमसाध्यम् ॥ आर्त्तव अर्थात् स्त्रियोंका रज वातादि पृथक् दोष, रक्त, द्वंद्व और सन्निपात इनकरके दुष्ट होनेसे गर्भ धारणके अयोग्य होय तिन दोषोंकरके वर्ण और वेदना जाननी चाहिये । तिनमें कुणप, पूति, पूय, क्षीण मलमूत्रके समान जो होय सो असाध्य हैं, बाकीके साध्य जानने ॥ विष्टम्भगर्भके लक्षण । गर्भिणीके कुसमय भोजन करनेसे अथवा रूक्षादि पदार्थ खानेसे, वायुसे कुपित होकर गर्भ शुक्र शुष्य करे अर्थात् गर्भको सुखाय देवे, इसीसे उस गर्भका हलना चलना बढना बन्द होय और समय पाकर उसका बादीकी पीडा होकर स्राव होय॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA