महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1053, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंअशङ्कमानैस्तत् कार्यमस्माभिरिति नो व्रतम् ॥ १५ ॥
‘बन्धुओ! राजा धृतराष्ट्र मेरे माननीय पिता, गुरु एवं श्रेष्ठ पुरुष हैं। वे जो आज्ञा दें, उसका हमें निःशंक होकर पालन करना चाहिये; यही हमारा व्रत है ॥ १५ ॥
भवन्तः सुहृदोऽस्माकमस्मान् कृत्या प्रदक्षिणम् ।
प्रतिनन्द्य तथाशीर्भिर्निवर्तध्वं यथा गृहम् ॥ १६ ॥
यदा तु कार्यमस्माकं भवद्भिरुपपत्स्यते ।
तदा करिष्यथास्माकं प्रियाणि च हितानि च ॥ १७ ॥
‘आपलोग हमारे हितचिन्तक हैं, अतः हमें अपने आशीर्वादसे संतुष्ट करें और हमें दाहिने करते हुए जैसे आये थे, वैसे ही अपने घरको लौट जायँ। जब आपलोगोंके द्वारा हमारा कोई कार्य सिद्ध होनेवाला होगा, उस समय आप हमारे प्रिय और हितकारी कार्य कीजियेगा’ ॥
एवमुक्तास्तदा पौराः कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ।
आशीर्भिश्वाभिनन्द्यैताञ्जग्मुर्नगरमेव हि ॥ १८ ॥
उनके यों कहनेपर पुरवासी उन्हें आशीर्वादसे प्रसन्न करते हुए दाहिने करके नगरको ही लौट गये ॥ १८ ॥
पौरेषु विनिवृत्तेषु विदुरः सत्यधर्मवित् ।
बोधयन् पाण्डवश्रेष्ठमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १९ ॥
पुरवासियोंके लौट जानेपर सत्यधर्मके ज्ञाता विदुरजी पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिरको दुर्योधनके कपटका बोध कराते हुए इस प्रकार बोले ॥ १९ ॥
प्राज्ञः प्राज्ञप्रलापज्ञः प्रलापज्ञमिदं वचः ।
प्राज्ञं प्राज्ञः प्रलापज्ञः प्रलापज्ञं वचोऽब्रवीत् ॥ २० ॥
विदुरजी बुद्धिमान् तथा मूढ़ म्लेच्छोंकी निरर्थक-सी प्रतीत होनेवाली भाषाके भी ज्ञाता थे। इसी प्रकार युधिष्ठिर भी उस म्लेच्छभाषाको समझ लेनेवाले तथा बुद्धिमान् थे। अतः उन्होंने युधिष्ठिरसे ऐसी कहनेयोग्य बात कही, जो म्लेच्छभाषाके जानकार एवं बुद्धिमान् पुरुषको उस भाषामें कहे हुए रहस्यका ज्ञान करा देनेवाली थी, किंतु जो उस भाषाके अनभिज्ञ पुरुषको वास्तविक अर्थका बोध नहीं कराती थी ॥ २० ॥
यो जानाति परप्रज्ञां नीतिशास्त्रानुसारिणीम् ।
विज्ञायेह तथा कुर्यादापदं निस्तरेद् यथा ॥ २१ ॥
‘जो शत्रु की नीति-शास्त्रका अनुसरण करनेवाली बुद्धिको समझ लेता है, वह उसे समझ लेनेपर कोई ऐसा उपाय करे, जिससे वह यहाँ शत्रुजनित संकटसे बच सके ॥
अलोहं निशितं शस्त्रं शरीरपरिकर्तनम् ।
यो वेत्ति न तु तं घ्नन्ति प्रतिघातविदं द्विषः ॥ २२ ॥