महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'एक ऐसा तीखा शस्त्र है, जो लोहेका बना तो नहीं है, परंतु शरीरको नष्ट कर देता है। जो उसे जानता है, ऐसे उस शस्त्रके आघातसे बचनेका उपाय जाननेवाले पुरुषको शत्रु नहीं मार सकते³। ।। २२ ।। कक्षघ्नः शिशिरघ्नश्च महाकक्षे बिलौकसः । न दहेदिति चात्मानं यो रक्षति स जीवति ।। २३ ।। 'घास-फूस तथा सूखे वृक्षोंवाले जंगलको जलाने और सर्दीको नष्ट कर देनेवाली आग विशाल वनमें फैल जानेपर भी बिलमें रहनेवाले चूहे आदि जन्तुओंको नहीं जला सकती—यों समझकर जो अपनी रक्षाका उपाय करता है, वही जीवित रहता है³। ।। २३ ।। नाचक्षुर्वेत्ति पन्थानं नाचक्षुर्विन्दते दिशः । नाधृतिर्बुद्धिमाप्नोति बुध्यस्वैवं प्रबोधितः ।। २४ ।। 'जिसके आँखें नहीं हैं, वह मार्ग नहीं जान पाता; अंधेको दिशाओंका ज्ञान नहीं होता और जो धैर्य खो देता है, उसे सद्बुद्धि नहीं प्राप्त होती। इस प्रकार मेरे समझानेपर तुम मेरी बातको भलीभाँति समझ लो³। ।। २४ ।। अनाप्तैर्दत्तमदत्ते नरः शस्त्रमलोहजम् । श्वाविच्छरणमासाद्य प्रमुच्येत हुताशनात् ।। २५ ।। 'शत्रुओंके दिये हुए बिना लोहेके बने शस्त्रको जो मनुष्य ग्रहण कर लेता है, वह साहीके बिलमें घुसकर आगसे बच जाता है४। ।। २५ ।। चरन् मार्गान् विजानाति नक्षत्रैर्विन्दते दिशः । आत्मना चात्मनः पञ्च पीडयन् नानुपीड़यते ।। २६ ।। 'मनुष्य घूम-फिरकर रास्तेका पता लगा लेता है, नक्षत्रोंसे दिशाओंको समझ लेता है तथा जो अपनी पाँचों इन्द्रियोंका स्वयं ही दमन करता है, वह शत्रुओंसे पीड़ित नहीं होता'५ ।। २६ ।। एवमुक्तः प्रत्युवाच धर्मराजो युधिष्ठिरः । विदुरं विदुषां श्रेष्ठं ज्ञातमित्येव पाण्डवः ।। २७ ।। इस प्रकार कहे जानेपर पाण्डुनन्दन धर्मराज युधिष्ठिरने विद्वानोंमें श्रेष्ठ विदुरजीसे कहा—'मैंने आपकी बात अच्छी तरह समझ ली' ।। २७ ।। अनुशिक्ष्यानुगम्यैतान् कृत्वा चैव प्रदक्षिणम् । पाण्डवानभ्यनुज्ञाय विदुरः प्रययौ गृहान् ।। २८ ।। इस तरह पाण्डवोंको बारंबार कर्तव्यकी शिक्षा देते हुए कुछ दूरतक उनके पीछे-पीछे जाकर विदुरजी उनको जानेकी आज्ञा दे उन्हें अपने दाहिने करके पुनः अपने घरको लौट गये ।। २८ ।। निवृत्ते विदुरे चापि भीष्मे पौरजने तथा ।