महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजातशत्रुमासाद्य कुन्ती वचनमब्रवीत् ॥ २९ ॥
विदुर, भीष्मजी तथा नगरनिवासियोंके लौट जानेपर कुन्ती अजातशत्रु युधिष्ठिरके पास जाकर बोली— ॥ २९ ॥
क्षत्ता यदब्रवीद् वाक्यं जनमध्येऽब्रुवन्निव ।
त्वया च स तथेत्युक्तो जानीमो न च तद् वयम् ॥ ३० ॥
‘बेटा! विदुरजीने सब लोगोंके बीचमें जो अस्पष्ट-सी बात कही थी, उसे सुनकर तुमने ‘बहुत अच्छा’ कहकर स्वीकार किया था; परंतु हमलोग वह बात अबतक नहीं समझ पा रहे हैं’ ॥ ३० ॥
यदीदं शक्यमस्माभिर्ज्ञातुं न च सदोषवत् ।
श्रोतुमिच्छामि तत् सर्वं संवादं तव तस्य च ॥ ३१ ॥
‘यदि उसे हम भी समझ सकें और हमारे जाननेसे कोई दोष न आता हो तो तुम्हारी और उनकी सारी बातचीतका रहस्य मैं सुनना चाहती हूँ’ ॥ ३१ ॥
युधिष्ठिर उवाच
गृहादग्निश्च बोद्धव्य इति मां विदुरोऽब्रवीत् ।
पन्थाश्च वो नाविदितः कश्चित् स्यादिति धर्मधीः ॥ ३२ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**माँ! जिनकी बुद्धि सदा धर्ममें ही लगी रहती है, उन विदुरजीने (सांकेतिक भाषामें) मुझसे कहा था, ‘तुम जिस घरमें ठहरोगे, वहाँसे आगका भय है, यह बात अच्छी तरह जान लेनी चाहिये। साथ ही वहाँका कोई भी मार्ग ऐसा न हो, जो तुमसे अपरिचित रहे ॥ ३२ ॥
जितेन्द्रियश्च वसुधां प्राप्स्यतीति च मेऽब्रवीत् ।
विज्ञातमिति तत् सर्वं प्रत्युक्तो विदुरो मया ॥ ३३ ॥
‘यदि तुम अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखोगे तो सारी पृथ्वीका राज्य प्राप्त कर लोगे, यह बात भी उन्होंने मुझसे बतायी थी और इन्हीं बातोंके लिये मैंने विदुरजीको उत्तर दिया था कि ‘मैं सब समझ गया’ ॥ ३३ ॥
वैशम्पायन उवाच
अष्टमेऽहनि रोहिण्यां प्रयाताः फाल्गुनस्य ते ।
वारणावतमासाद्य ददृशुर्नगरं जनम् ॥ ३४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! पाण्डवोंने फाल्गुन शुक्ला अष्टमीके दिन रोहिणी नक्षत्रमें यात्रा की थी। वे यथासमय वारणावत पहुँचकर वहाँके नागरिकोंसे मिले ॥ ३४ ॥