महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डवों और कुन्तीका द्रुपदके घरमें जाकर सम्मानित होना और राजा द्रुपदद्वारा पाण्डवोंके शील-स्वभावकी परीक्षा
दूत उवाच
जन्यार्थमन्नं द्रुपदेन राज्ञा
विवाहहेतोरुपसंस्कृतं च ।
तदाप्नुवध्वं कृतसर्वकार्याः
कृष्णां च तत्रैव चिरं न कार्यम् ॥ १ ॥
दूत बोला— महाराज द्रुपदने विवाहके निमित्त बरातियोंको जिमानेके लिये उत्तम भोजनसामग्री तैयार करायी है। अतः आपलोग सम्पूर्ण दैनिक कार्योंसे निवृत्त हो उसे पायें। राजकुमारी कृष्णाको भी विवाहविधिसे वहीं प्राप्त करें। इसमें विलम्ब नहीं करना चाहिये ॥ १ ॥
इमे रथाः काञ्चनपद्मचित्राः
सदश्वयुक्ता वसुधाधिपार्हाः ।
एतान् समारुह्य समेत सर्वे
पाञ्चालराजस्य निवेशनं तत् ॥ २ ॥
ये सुवर्णमय कमलोंसे सुशोभित तथा राजाओंकी सवारीके योग्य विचित्र रथ खड़े हैं, इनमें उत्तम घोड़े जुते हुए हैं; इनपर सवार हो आप सब लोग महाराज द्रुपदके महलमें पधारें ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः प्रयाताः कुरुपुङ्गवास्ते
पुरोहितं तं परियाप्य सर्वे ।
आस्थाय यानानि महान्ति तानि
कुन्ती च कृष्णा च सहैकयाने ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! वहाँ वे सभी कुरुश्रेष्ठ पाण्डव पुरोहितजीको विदा करके उन विशाल रथोंपर आरूढ़ हो (राजभवनकी ओर) चले। उस समय कुन्ती और कृष्णा एक साथ एक ही सवारीपर बैठी हुई थीं ॥ ३ ॥
श्रुत्वा तु वाक्यानि पुरोहितस्य
यान्युक्तवान् भारत धर्मराजः ।