महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1663, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुण्यात्मा, कीर्तिमान् और बहुश्रुत राजर्षि उस सभामें सूर्यपुत्र यमकी उपासना करते हैं ॥ ८—२८ ॥
अगस्त्योऽथ मतङ्गश्च कालो मृत्युस्तथैव च । यज्वानश्चैव सिद्धाश्च ये च योगशरीरिणः ॥ २९ ॥ अग्निष्वात्ताश्च पितरः फेनपाश्चोष्मपाश्च ये । स्वधावन्तो बर्हिषदो मूर्तिमन्तस्तथापरे ॥ ३० ॥ कालचक्रं च साक्षाच्च भगवान् हव्यवाहनः । नरा दुष्कृतकर्माणो दक्षिणायनमृत्यवः ॥ ३१ ॥ कालस्य नयने युक्ता यमस्य पुरुषाश्च ये । तस्यां शिंशपपालाशास्तथा काशकुशादयः । उपासते धर्मराजं मूर्तिमन्तो जनाधिप ॥ ३२ ॥
अगस्त्य, मतंग, काल, मृत्यु, यज्ञकर्ता, सिद्ध, योगशरीरधारी, अग्निष्वात्त पितर, फेनप, ऊष्मप, स्वधावान्, बर्हिषद् तथा दूसरे मूर्तिमान् पितर, साक्षात् कालचक्र (संवत्सर आदि कालविभागके अभिमानी देवता), भगवान् हव्यवाहन (अग्नि), दक्षिणायनमें मरनेवाले तथा सकामभावसे दुष्कर (श्रमसाध्य) कर्म करनेवाले मनुष्य, जनेश्वर कालकी आज्ञामें तत्पर यमदूत, शिंशप एवं पलाश, काश और कुश आदिके अभिमानी देवता मूर्तिमान् होकर उस सभामें धर्मराजकी उपासना करते हैं ॥ २९—३२ ॥
एते चान्ये च बहवः पितृराजसभासदः । न शक्याः परिसंख्यातुं नामभिः कर्मभिस्तथा ॥ ३३ ॥
ये तथा और भी बहुत-से लोग पितृराज यमकी सभाके सदस्य हैं, जिनके नामों और कर्मोंकी गणना नहीं की जा सकती ॥ ३३ ॥
असम्बाधा हि सा पार्थ रम्या कामगमा सभा । दीर्घकालं तपस्तप्त्वा निर्मिता विश्वकर्मणा ॥ ३४ ॥
कुन्तीनन्दन! वह सभा बाधारहित है। वह रमणीय तथा इच्छानुसार गमन करनेवाली है। विश्वकर्माने दीर्घ-कालतक तपस्या करके उसका निर्माण किया है ॥ ३४ ॥
ज्वलन्ती भासमाना च तेजसा स्वेन भारत । तामुग्रतपसो यान्ति सुव्रताः सत्यवादिनः ॥ ३५ ॥ शान्ताः संन्यासिनः शुद्धाः पूताः पुण्येन कर्मणा । सर्वे भास्वरदेहाश्च सर्वे च विरजोऽम्बराः ॥ ३६ ॥
भारत! वह सभा अपने तेजसे प्रज्वलित तथा उद्भासित होती रहती है। कठोर तपस्या और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, सत्यवादी, शान्त, संन्यासी तथा अपने पुण्यकर्मसे शुद्ध एवं पवित्र हुए पुरुष उस सभामें जाते हैं। उन सबके शरीर तेजसे प्रकाशित होते रहते हैं। सभी निर्मल वस्त्र धारण करते हैं ॥ ३५-३६ ॥