भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1666

आदित्यास्तत्र वरुणं जलेश्वरमुपासते ।। ७ ।। उस सभामें दिव्य हार, दिव्य सुगन्ध तथा दिव्य चन्दनका अंगराग धारण करनेवाले आदित्यगण जलके स्वामी वरुणकी उपासना करते हैं ।। ७ ।। वासुकिस्तक्षकश्चैव नागश्चैरावतस्तथा । कृष्णश्च लोहितश्चैव पद्मश्चित्रश्च वीर्यवान् ।। ८ ।। वासुकि नाग, तक्षक, ऐरावतनाग, कृष्ण, लोहित, पद्म और पराक्रमी चित्र, ।। ८ ।। कम्बलाश्वतरौ नागौ धृतराष्ट्रबलाहकौ । (मणिनागश्च नागश्च मणिः शङ्खनखस्तथा । कौरव्यः स्वस्तिकश्चैव एलापत्रश्च वामनः ।। अपराजितश्च दोषश्च नन्दकः पूरणस्तथा । अभीकः शिभिकः श्वेतो भद्रो भद्रेश्वरस्तथा ।।) मणिमान् कुण्डधारश्च कर्कोटकधनंजयौ ।। ९ ।। कम्बल, अश्वतर, धृतराष्ट्र, बलाहक, मणिनाग, नाग, मणि, शंखनख, कौरव्य, स्वस्तिक, एलापत्र, वामन, अपराजित, दोष, नन्दक, पूरण, अभीक, शिभिक, श्वेत, भद्र, भद्रेश्वर, मणिमान्, कुण्डधार, कर्कोटक, धनंजय, ।। ९ ।। पाणिमान् कुण्डधारश्च बलवान् पृथिवीपते । प्रह्लादो मूषिकादश्च तथैव जनमेजयः ।। १० ।। पताकिनो मण्डलिनः फणावन्तश्च सर्वशः । (अनन्तश्च महानागो यं स दृष्ट्वा जलेश्वरः । अभ्यर्चयति सत्कारैरासनेन च तं विभुम् ।। वासुकिप्रमुखाश्चैव सर्वे प्राञ्जलयः स्थिताः । अनुज्ञाताश्च शेषेण यथार्हमुपविश्य च ।।) एते चान्ये च बहवः सर्पास्तस्यां युधिष्ठिर । उपासते महात्मानं वरुणं विगतक्लमाः ।। ११ ।। पाणिमान्, बलवान् कुण्डधार, प्रह्लाद, मूषिकाद, जनमेजय आदि नाग जो पताका, मण्डल और फणोंसे सुशोभित वहाँ उपस्थित होते हैं, महानाग भगवान् अनन्त भी वहाँ स्थित होते हैं, जिन्हें देखते ही जलके स्वामी वरुण आसन आदि देते और सत्कारपूर्वक उनका पूजन करते हैं। वासुकि आदि सभी नाग हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े होते और भगवान् शेषकी आज्ञा पाकर यथायोग्य आसनोंपर बैठकर वहाँकी शोभा बढ़ाते हैं। युधिष्ठिर! ये तथा और भी बहुतसे नाग उस सभामें क्लेशरहित हो महात्मा वरुणकी उपासना करते हैं ।। १०-११ ।। बलिवैरोचनो राजा नरकः पृथिवींजयः । प्रह्लादो विप्रचित्तिश्च कालखञ्जाश्च दानवाः ।। १२ ।।