भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1677

अनन्त प्रभाववाले नाना प्रकारके प्रकाशमान दिव्य पदार्थोंद्वारा अग्नि, चन्द्रमा और सूर्यसे भी अधिक स्वयं ही प्रकाशित होनेवाली वह सभा अपने तेजसे सूर्यमण्डलको तिरस्कृत करती हुई-सी स्वर्गसे भी ऊपर स्थित हुई प्रकाशित हो रही है ॥ १५-१६ ॥ तस्यां स भगवानास्ते विदधद् देवमायया । स्वयमेकोऽनिशं राजन् सर्वलोकपितामहः ॥ १७ ॥ राजन्! उस सभामें सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजी देवमायाद्वारा समस्त जगत्की स्वयं ही सृष्टि करते हुए सदा अकेले ही विराजमान होते हैं ॥ १७ ॥ उपनिष्ठन्ति चाप्येनं प्रजानां पतयः प्रभुम् । दक्षः प्रचेताः पुलहो मरीचिः कश्यपः प्रभुः ॥ १८ ॥ भारत! वहाँ दक्ष आदि प्रजापतिगण उन भगवान् ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित होते हैं। दक्ष, प्रचेता, पुलह, मरीचि, प्रभावशाली कश्यप, ॥ १८ ॥ भृगुरत्रिवसिष्ठश्च गौतमोऽथ तथाङ्गिराः । पुलस्त्यश्च क्रतुश्चैव प्रह्लादः कर्दमस्तथा ॥ १९ ॥ भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, गौतम, अंगिरा, पुलस्त्य, क्रतु, प्रह्लाद, कर्दम, ॥ १९ ॥ अथर्वाङ्गिरसश्चैव बालखिल्या मरीचिपाः । मनोऽन्तरिक्षं विद्याश्च वायुस्तेजो जलं मही ॥ २० ॥ शब्दस्पर्शौ तथा रूपं रसो गन्धश्च भारत । प्रकृतिश्च विकारश्च यच्चान्यत् कारणं भुवः ॥ २१ ॥ अथर्वांगिरस, सूर्यकिरणोंका पान करनेवाले बालखिल्य, मन, अन्तरिक्ष, विद्या, वायु, तेज, जल, पृथ्वी, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, प्रकृति, विकृति तथा पृथ्वीकी रचनाके जो अन्य कारण हैं, इन सबके अभिमानी देवता, ॥ २०-२१ ॥ अगस्त्यश्च महातेजा मार्कण्डेयश्च वीर्यवान् । जमदग्निर्भरद्वाजः संवर्तश्च्यवनस्तथा ॥ २२ ॥ महातेजस्वी अगस्त्य, शक्तिशाली मार्कण्डेय, जमदग्नि, भरद्वाज, संवर्त, च्यवन, ॥ २२ ॥ दुर्वासाश्च महाभाग ऋष्यशृङ्गश्च धार्मिकः । सनत्कुमारो भगवान् योगाचार्यो महातपाः ॥ २३ ॥ महाभाग दुर्वासा, धर्मात्मा ऋष्यशृंग, महातपस्वी योगाचार्य भगवान् सनत्कुमार, ॥ २३ ॥ असितो देवलश्चैव जैगीषव्यश्च तत्त्ववित् । ऋषभो जितशत्रुश्च महावीर्यस्तथा मणिः ॥ २४ ॥ असित, देवल, तत्त्वज्ञानी जैगीषव्य, शत्रुविजयी ऋषभ, महापराक्रमी मणि ॥ २४ ॥ आयुर्वेदस्तथाष्टाङ्गो देहवांस्तत्र भारत ।