भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1676

स तन्मम वचः श्रुत्वा सहस्रांशुर्दिवाकरः । प्रोवाच भरतश्रेष्ठ व्रतं वर्षसहस्रिकम् ।। ८ ।। ब्रह्मव्रतमुपास्स्व त्वं प्रयतेनान्तरात्मना । ततोऽहं हिमवत्पृष्ठे समारब्धो महाव्रतम् ।। ९ ।। भरतश्रेष्ठ! मेरी वह बात सुनकर सहस्रों किरणोंवाले भगवान् दिवाकरने कहा—'तुम एकाग्रचित्त होकर ब्रह्माजीके व्रतका पालन करो। वह श्रेष्ठ व्रत एक हजार वर्षोंमें पूर्ण होगा।' तब मैंने हिमालयके शिखरपर आकर उस महान् व्रतका अनुष्ठान आरम्भ कर दिया ।। ८-९ ।।

ततः स भगवान् सूर्यो मामुपादाय वीर्यवान् । आगच्छत् तां सभां ब्राह्मीं विपाप्मा विगतक्लमः ।। १० ।। तदनन्तर मेरी तपस्या पूर्ण होनेपर पापरहित, क्लेशशून्य और परम शक्तिशाली भगवान् सूर्य मुझे साथ ले ब्रह्माजीकी उस सभामें गये ।। १० ।।

एवंरूपेति सा शक्या न निर्देष्टुं नराधिप । क्षणेन हि बिभर्त्यन्यदनिर्देश्यं वपुस्तथा ।। ११ ।। राजन्! वह सभा 'ऐसी ही है' इस प्रकार नहीं बतायी जा सकती; क्योंकि वह एक-एक क्षणमें दूसरा अनिर्वचनीय स्वरूप धारण कर लेती है ।। ११ ।।

न वेद परिमाणं वा संस्थानं चापि भारत । न च रूपं मया तादृग् दृष्टपूर्वं कदाचन ।। १२ ।। भारत! उसकी लंबाई-चौड़ाई कितनी है अथवा उसकी स्थिति क्या है, यह सब मैं कुछ नहीं जानता। मैंने किसी भी सभाका वैसा स्वरूप पहले कभी नहीं देखा था ।। १२ ।।

सुसुखा सा सदा राजन् न शीता न च घर्मदा । न क्षुत्पिपासे न ग्लानिं प्राप्य तां प्राप्नुवन्त्युत ।। १३ ।। राजन्! वह सदा उत्तम सुख देनेवाली है। वहाँ न सर्दीका अनुभव होता है, न गर्मीका। उस सभामें पहुँच जानेपर लोगोंको भूख, प्यास और ग्लानिका अनुभव नहीं होता। ।। १३ ।।

नानारूपैरिव कृता मणिभिः सा सुभास्वरैः । स्तम्भैर्न च धृता सा तु शाश्वती न च सा क्षरा ।। १४ ।। वह सभा अनेक प्रकारकी अत्यन्त प्रकाशमान मणियोंसे निर्मित हुई है। वह खंभोंके आधारपर नहीं टिकी है और उसमें कभी क्षयरूप विकार न आनेके कारण वह नित्य मानी गयी है* ।। १४ ।।

दिव्यैर्नानाविधैर्भावैर्भासद्भिरमितप्रभैः ।। १५ ।। अति चन्द्रं च सूर्यं च शिखिनं च स्वयम्प्रभा । दीप्यते नाकपृष्ठस्था भर्त्सयन्तीव भास्करम् ।। १६ ।।