महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1675, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकादशोऽध्यायः
ब्रह्माजीकी सभाका वर्णन
नारद उवाच
पितामहसभां तात कथ्यमानां निबोध मे ।
शक्यते या न निर्दिष्टुमेवंरूपेति भारत ॥ १ ॥
**नारदजी कहते हैं—**तात भारत! अब तुम मेरे मुखसे कही हुई पितामह ब्रह्माजीकी सभाका वर्णन सुनो! वह सभा ऐसी है, इस रूपसे नहीं बतलायी जा सकती ॥ १ ॥
पुरा देवयुगे राजन्नादित्यो भगवान् दिवः ।
आगच्छन्मानुषं लोकं दिदृक्षुर्विगतक्लमः ॥ २ ॥
चरन् मानुषरूपेण सभां दृष्ट्वा स्वयम्भुवः ।
स तामकथयन्मह्यं ब्राह्मीं तत्त्वेन पाण्डव ॥ ३ ॥
राजन्! पहले सत्ययुगकी बात है, भगवान् सूर्य ब्रह्माजीकी सभा देखकर फिर मनुष्यलोकको देखनेके लिये बिना परिश्रमके ही द्युलोकसे उतरकर इस लोकमें आये और मनुष्यरूपसे इधर-उधर विचरने लगे। पाण्डुनन्दन! सूर्यदेवने मुझसे उस ब्राह्मी सभाका यथार्थतः वर्णन किया ॥ २-३ ॥
अप्रमेयां सभां दिव्यां मानसीं भरतर्षभ ।
अनिर्देश्यां प्रभावेण सर्वभूतमनोरमाम् ॥ ४ ॥
भरतश्रेष्ठ! वह सभा अप्रमेय, दिव्य, ब्रह्माजीके मानसिक संकल्पसे प्रकट हुई तथा समस्त प्राणियोंके मनको मोह लेनेवाली है। उसका प्रभाव अवर्णनीय है ॥ ४ ॥
श्रुत्वा गुणानहं तस्याः सभायाः पाण्डवर्षभ ।
दर्शनेप्सुस्तथा राजन्नादित्यमिदमब्रुवम् ॥ ५ ॥
पाण्डुकुलभूषण युधिष्ठिर! उस सभाके अलौकिक गुण सुनकर मेरे मनमें उसके दर्शनकी इच्छा जाग उठी और मैंने सूर्यदेवसे कहा— ॥ ५ ॥
भगवन् द्रष्टुमिच्छामि पितामहसभां शुभाम् ।
येन वा तपसा शक्या कर्मणा वापि गोपते ॥ ६ ॥
औषधैर्वा तथा युक्तैरुत्तमा पापनाशिनी ।
तन्ममाचक्ष्व भगवन् पश्येयं तां सभां यथा ॥ ७ ॥
‘भगवन्! मैं भी ब्रह्माजीकी कल्याणमयी सभाका दर्शन करना चाहता हूँ। किरणोंके स्वामी सूर्यदेव! जिस तपस्यासे, सत्कर्मसे अथवा उपयुक्त ओषधियोंके प्रभावसे उस पापनाशिनी उत्तम सभाका दर्शन हो सके, वह मुझे बताइये। भगवन्! मैं जैसे भी उस सभाको देख सकूँ, उस उपायका वर्णन कीजिये’ ॥ ६-७ ॥