महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1674, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंभगवान् नन्दीश्वर, महाकाल तथा शंकुकर्ण आदि भगवान् शिवके सभी दिव्य-पार्षद काष्ठ, कुटीमुख, दन्ती, तपस्वी विजय तथा गर्जनशील महाबली श्वेत वृषभ वहाँ उपस्थित रहते हैं ।। ३४-३५ ।।
धनदं राक्षसाश्चान्ये पिशाचाश्च उपासत । पारिषदैः परिवृतमुपायान्तं महेश्वरम् ।। ३६ ।। सदा हि देवदेवेशं शिवं त्रैलोक्यभावनम् । प्रणम्य मूर्ध्ना पौलस्त्यो बहुरूपमुमापतिम् ।। ३७ ।। ततोऽभ्यनुज्ञां सम्प्राप्य महादेवाद् धनेश्वरः । आस्ते कदाचित् भगवान् भवो धनपतेः सखा ।। ३८ ।। दूसरे-दूसरे राक्षस और पिशाच भी धनदाता कुबेरकी उपासना करते हैं। पार्षदोंसे घिरे हुए देवदेवेश्वर, त्रिभुवनभावन, बहुरूपधारी, कल्याणस्वरूप, उमावल्लभ भगवान् महेश्वर जब उस सभामें पधारते हैं, तब पुलस्त्यनन्दन धनाध्यक्ष कुबेर उनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करते और उनकी आज्ञा ले उन्हींके पास बैठ जाते हैं। उनका सदाका यही नियम है। कुबेरके सखा भगवान् शंकर कभी-कभी उस सभामें पदार्पण किया करते हैं ।। ३६—३८ ।।
निधिप्रवरमुख्यौ च शङ्खपद्मौ धनेश्वरौ । सर्वान् निधीन् प्रगृह्याथ उपासाते धनेश्वरम् ।। ३९ ।। श्रेष्ठ निधियोंमें प्रमुख और धनके अधीश्वर शंख तथा पद्म—ये दोनों (मूर्तिमान् हो) अन्य सब निधियोंको साथ ले धनाध्यक्ष कुबेरकी उपासना करते हैं ।। ३९ ।।
सा सभा तादृशी रम्या मया दृष्टान्तरिक्षगा । पितामहसभां राजन् कीर्तयिष्ये निबोध ताम् ।। ४० ।। राजन्! कुबेरकी वैसी रमणीय सभा जो आकाशमें विचरनेवाली है, मैंने अपनी आँखों देखी है। अब मैं ब्रह्माजीकी सभाका वर्णन करूँगा, उसे सुनो ।। ४० ।।
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि धनदसभावर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ।। १० ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमें कुबेरसभा-वर्णन नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १० ।।