महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1811, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंस तमाजौ विनिर्जित्य दक्षिणाभिमुखो ययौ ॥ ८ ॥
भारत! उस जम्भकपुत्रने सहदेवके साथ घोर संग्राम किया; परंतु सहदेव उसे युद्धमें जीतकर दक्षिण दिशाकी ओर बढ़ गये ॥ ८ ॥
सेकानपरसेकांश्च व्यजयत् सुमहाबलः ।
करं तेभ्य उपादाय रत्नानि विविधानि च ॥ ९ ॥
ततस्तेनैव सहितो नर्मदामभितो ययौ ।
वहाँ महाबली माद्रीकुमारने सेक और अपरसेक देशोंपर विजय पायी और उन सबसे नाना प्रकारके रत्न भेंटमें लिये। तत्पश्चात् सेकाधिपतिको साथ ले उन्होंने नर्मदाकी ओर प्रस्थान किया ॥ ९ १/२ ॥
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ सैन्येन महताऽऽवृतौ ।
जिगाय समरे वीरावाश्विनेयः प्रतापवान् ॥ १० ॥
अश्विनीकुमारोंके पुत्र प्रतापी सहदेवने वहाँ युद्धमें विशाल सेनासे घिरे हुए अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्दको परास्त किया ॥ १० ॥
ततो रत्नान्युपादाय पुरं भोजकटं ययौ ।
तत्र युद्धमभूद् राजन् दिवसद्वयमच्युत ॥ ११ ॥
वहाँसे रत्नोंकी भेंट लेकर वे भोजकट नगरमें गये। अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले राजन्! वहाँ दो दिनोंतक युद्ध होता रहा ॥ ११ ॥
स विजित्य दुराधर्षं भीष्मकं माद्रिनन्दनः ।
कोसलाधिपतिं चैव तथा वेणातटाधिपम् ॥ १२ ॥
कान्तारकांश्च समरे तथा प्राक्कोसलान् नृपान् ।
नाटकेयांश्च समरे तथा हेरम्बकान् युधि ॥ १३ ॥
माद्रीनन्दनने उस संग्राममें दुर्धर्ष वीर भीष्मकको परास्त करके कोसलाधिपति, वेणानदीके तटवर्ती प्रदेशोंके स्वामी, कान्तारक तथा पूर्वकोसलके राजाओंको भी समरमें पराजित किया। तत्पश्चात् नाटकेयों और हेरम्बकोंको भी युद्धमें हराया ॥ १२-१३ ॥
मारुधं च विनिर्जित्य रम्यग्राममथो बलात् ।
नाचीनानर्बुकांश्चैव राज्ञश्चैव महाबलः ॥ १४ ॥
तांस्तानाटविकान् सर्वानजयत् पाण्डुनन्दनः ।
वाताधिपं च नृपतिं वशे चक्रे महाबलः ॥ १५ ॥
महाबली पाण्डुनन्दन सहदेवने मारुध तथा रम्यग्रामको बलपूर्वक परास्त करके नाचीन, अर्बुक तथा समस्त वनेचर राजाओंको जीत लिया। तदनन्तर महाबली माद्रीकुमारने राजा वाताधिपको वशमें किया ॥ १४-१५ ॥
पुलिन्दांश्च रणे जित्वा ययौ दक्षिणतः पुरः ।
युयुधे पाण्ड्यराजेन दिवसं नकुलानुजः ॥ १६ ॥