महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1824, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वारपालवचः श्रुत्वा राक्षसेन्द्रो विभीषणः ।।
उवाच वाक्यं धर्मात्मा समीपे मे प्रवेश्यताम् ।
वहाँ उसने हाथ जोड़कर दूतकी कही हुई सारी बातें कह सुनायीं। द्वारपालकी बात सुनकर धर्मात्मा राक्षसराज विभीषणने उससे कहा—‘दूतको मेरे समीप ले आओ'।
एवमुक्तस्तु राजेन्द्र धर्मज्ञेन महात्मना ।
अथ निष्क्रम्य सम्भ्रान्तो द्वाःस्थो हैडिम्बमब्रवीत् ।।
राजेन्द्र! धर्मज्ञ महात्मा विभीषणकी ऐसी आज्ञा होनेपर द्वारपाल बड़ी उतावलीके साथ बाहर निकला और घटोत्कचसे बोला—।
एहि दूत नृपं द्रष्टुं क्षिप्रं प्रविश च स्वयम् ।
द्वारपालवचः श्रुत्वा प्रविवेश घटोत्कचः ।।
‘दूत! आओ। महाराजसे मिलनेके लिये राजभवनमें शीघ्र प्रवेश करो।' द्वारपालका कथन सुनकर घटोत्कचने राजभवनमें प्रवेश किया।
स प्रविश्य ददर्शार्थ राक्षसेन्द्रस्य मन्दिरम् ।
ततः कैलाससंकाशं तप्तकाञ्चनतोरणम् ।।
तदनन्तर उसमें प्रवेश करके उसने राक्षसराज विभीषणका महल देखा, जो अपनी उज्ज्वल आभासे कैलासके समान जान पड़ता था। उसका फाटक तपाकर शुद्ध किये हुए सोनेसे तैयार किया गया था।
प्राकारेण परिक्षिप्तं गोपुरैश्चापि शोभितम् ।
हर्म्यप्रासादसम्बाधं नानारत्नसमन्वितम् ।।
चहारदीवारीसे घिरा हुआ वह राजमन्दिर अनेक गोपुरोंसे सुशोभित हो रहा था। उसमें बहुत-सी अट्टालिकाएँ तथा महल बने हुए थे। भाँति-भाँतिके रत्न उस राजभवनकी शोभा बढ़ाते थे।
काञ्चनैस्तापनीयैश्च स्फाटिकै राजतैरपि ।
वज्रवैडूर्यगर्भैश्च स्तम्भैर्दृष्टिमनोहरैः ।
नानाध्वजपताकाभिः सुवर्णाभिश्च चित्रितम् ।
तपाये हुए सुवर्ण, रजत (चाँदी) तथा स्फटिकमणिके बने हुए खम्भे नेत्र और मनको बरबस अपनी ओर खींच लेते थे। उन खम्भोंमें हीरे और वैदूर्य जड़े हुए थे। सुनहरे रंगकी विविध ध्वजा-पताकाओंसे उस भव्य भवनकी विचित्र शोभा हो रही थी।
चित्रमाल्यावृतं रम्यं तप्तकाञ्चनवेदिकम् ।।
तान् दृष्ट्वा तत्र सर्वान् स भैमसेनिर्मनोरमान् ।
प्रविशन्नेव हैडिम्बः शुश्राव मुरजस्वनम् ।।
विचित्र मालाओंसे अलंकृत तथा विशुद्ध स्वर्णमय वेदिकाओंसे विभूषित वह राजभवन बड़ा रमणीय दिखायी दे रहा था। उस महलकी इन सारी मनोरम विशेषताओंको देखकर