महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1857, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिया ।। १३ ।। साक्षात् स विबुधारिघ्नः क्षत्रे नारायणो विभुः । प्रतिज्ञां पालयंश्चेमां जातः परपुरंजयः ।। १४ ।। वे सोचने लगे—'अहो! सर्वव्यापक देवशत्रु-विनाशक वैरिनगरविजयी साक्षात् भगवान् नारायणने ही अपनी इस प्रतिज्ञाको पूर्ण करनेके लिये क्षत्रियकुलमें अवतार ग्रहण किया है ।। १४ ।। संदिदेश पुरायोऽसौ विबुधान् भूतकृत् स्वयम् । अन्योन्यमभिनिघ्नन्तः पुनर्लोकानवाप्स्यथ ।। १५ ।। 'पूर्वकालमें सम्पूर्ण भूतोंके उत्पादक साक्षात् उन्हीं भगवान्ने देवताओंको यह आदेश दिया था कि तुमलोग भूतलपर जन्म ग्रहण करके अपना अभीष्ट साधन करते हुए आपसमें एक-दूसरेको मारकर फिर देवलोकमें आ जाओगे ।। १५ ।। इति नारायणः शम्भुर्भगवान् भूतभावनः । आदित्यविबुधान् सर्वानजायत यदुक्षये ।। १६ ।। 'कल्याणस्वरूप भूतभावन भगवान् नारायणने सब देवताओंको यह आज्ञा देनेके पश्चात् स्वयं भी यदुकुलमें अवतार लिया ।। १६ ।। क्षितावन्धकवृष्णीनां वंशे वंशभृतां वरः । परया शुशुभे लक्ष्म्या नक्षत्राणामिवोडुराट् ।। १७ ।। 'अन्धक और वृष्णियोंके कुलमें वंशधारियोंमें श्रेष्ठ वे ही भगवान् इस पृथ्वीपर प्रकट हो अपनी सर्वोत्तम कान्तिसे उसी प्रकार शोभायमान हैं, जैसे नक्षत्रोंमें चन्द्रमा सुशोभित होते हैं ।। १७ ।। यस्य बाहुबलं सेन्द्राः सुराः सर्व उपासते । सोऽयं मानुषवन्नाम हरिरास्तेऽरिमर्दनः ।। १८ ।। 'इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता जिनके बाहुबलकी उपासना करते हैं, वे ही शत्रुमर्दन श्रीहरि यहाँ मनुष्यके समान बैठे हैं ।। १८ ।। अहो बत महद्भूतं स्वयंभूर्यदिदं स्वयम् । आदास्यति पुनः क्षत्रमेवं बलसमन्वितम् ।। १९ ।। 'अहो! ये स्वयम्भू महाविष्णु ऐसे बलसम्पन्न क्षत्रियसमुदायको पुनः उच्छिन्न करना चाहते हैं' ।। १९ ।। इत्येतां नारदश्चिन्तां चिन्तयामास सर्ववित् । हरिं नारायणं ध्यात्वा यज्ञैरीज्यन्तमीश्वरम् ।। २० ।। तस्मिन् धर्मविदां श्रेष्ठो धर्मराजस्य धीमतः । महाध्वरे महाबुद्धिस्तस्थौ स बहुमानतः ।। २१ ।।