महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुरुश्रेष्ठ! मधुसूदन कृष्ण न ऋत्विज् है, न आचार्य है और न राजा ही है; फिर तुमने किस प्रिय कामनासे इसकी पूजा की है? ।। १७ ।। अथ वाभ्यर्चनीयोऽयं युष्माकं मधुसूदनः । किं राजभिरिहानीतैरवमानाय भारत ।। १८ ।। भारत! अथवा यदि यह मधुसूदन ही तुमलोगोंका पूजनीय देवता है, इसलिये इसकी ही पूजा तुम्हें करनी थी तो इन राजाओंको केवल अपमानित करनेके लिये बुलानेकी क्या आवश्यकता थी? ।। १८ ।। वयं तु न भयादस्य कौन्तेयस्य महात्मनः । प्रयच्छामः करान् सर्वे न लोभान्न च सान्त्वनात् ।। १९ ।। राजाओ! हम सब लोग इन महात्मा कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको जो कर दे रहे हैं, वह भय, लोभ अथवा कोई विशेष आश्वासन मिलनेके कारण नहीं ।। १९ ।। अस्य धर्मप्रवृत्तस्य पार्थिवत्वं चिकीर्षतः । करानस्मै प्रयच्छामः सोऽयमस्मान् न मन्यते ।। २० ।। हमने तो यही समझा था कि यह धर्माचरणमें संलग्न रहनेवाला क्षत्रिय सम्राट्का पद पाना चाहता है तो अच्छा ही है। यही सोचकर हम उसे कर देते हैं, परंतु यह राजा युधिष्ठिर हमलोगोंको नहीं मानता है ।। २० ।। किमन्यदवमानाद्धि यदेनं राजसंसदि । अप्राप्तलक्षणं कृष्णमर्घ्येणार्चितवानसि ।। २१ ।। युधिष्ठिर! इससे बढ़कर दूसरा अपमान और क्या हो सकता है कि तुमने राजाओंकी सभामें जिसे राजोचित चिह्न छत्र-चँवर आदि प्राप्त नहीं हुआ है, उस कृष्णकी अर्घ्यके द्वारा पूजा की है ।। २१ ।। अकस्माद् धर्मपुत्रस्य धर्मात्मेति यशो गतम् । को हि धर्मच्युते पूजामेवं युक्तां नियोजयेत् ।। २२ ।। धर्मपुत्र युधिष्ठिरको अकस्मात् ही धर्मात्मा होनेका यश प्राप्त हो गया है, अन्यथा कौन ऐसा धर्मनिष्ठ पुरुष होगा जो किसी धर्मच्युतकी इस प्रकार पूजा करेगा ।। २२ ।। योऽयं वृष्णिकुले जातो राजानं हतवान् पुरा । जरासंधं महात्मानमन्यायेन दुरात्मवान् ।। २३ ।। वृष्णिकुलमें पैदा हुए इस दुरात्माने तो कुछ ही दिन पहले महात्मा राजा जरासंधका अन्यायपूर्वक वध किया है ।। २३ ।। अद्य धर्मात्मता चैव व्यपकृष्टा युधिष्ठिरात् । दर्शितं कृपणत्वं च कृष्णोऽर्घ्यस्य निवेदनात् ।। २४ ।। आज युधिष्ठिरका धर्मात्मापन दूर निकल गया, क्योंकि इन्होंने कृष्णको अर्घ्य निवेदन करके अपनी कायरता ही दिखायी है ।। २४ ।।