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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

कुरुश्रेष्ठ! मधुसूदन कृष्ण न ऋत्विज् है, न आचार्य है और न राजा ही है; फिर तुमने किस प्रिय कामनासे इसकी पूजा की है? ।। १७ ।। अथ वाभ्यर्चनीयोऽयं युष्माकं मधुसूदनः । किं राजभिरिहानीतैरवमानाय भारत ।। १८ ।। भारत! अथवा यदि यह मधुसूदन ही तुमलोगोंका पूजनीय देवता है, इसलिये इसकी ही पूजा तुम्हें करनी थी तो इन राजाओंको केवल अपमानित करनेके लिये बुलानेकी क्या आवश्यकता थी? ।। १८ ।। वयं तु न भयादस्य कौन्तेयस्य महात्मनः । प्रयच्छामः करान् सर्वे न लोभान्न च सान्त्वनात् ।। १९ ।। राजाओ! हम सब लोग इन महात्मा कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको जो कर दे रहे हैं, वह भय, लोभ अथवा कोई विशेष आश्वासन मिलनेके कारण नहीं ।। १९ ।। अस्य धर्मप्रवृत्तस्य पार्थिवत्वं चिकीर्षतः । करानस्मै प्रयच्छामः सोऽयमस्मान् न मन्यते ।। २० ।। हमने तो यही समझा था कि यह धर्माचरणमें संलग्न रहनेवाला क्षत्रिय सम्राट्का पद पाना चाहता है तो अच्छा ही है। यही सोचकर हम उसे कर देते हैं, परंतु यह राजा युधिष्ठिर हमलोगोंको नहीं मानता है ।। २० ।। किमन्यदवमानाद्धि यदेनं राजसंसदि । अप्राप्तलक्षणं कृष्णमर्घ्येणार्चितवानसि ।। २१ ।। युधिष्ठिर! इससे बढ़कर दूसरा अपमान और क्या हो सकता है कि तुमने राजाओंकी सभामें जिसे राजोचित चिह्न छत्र-चँवर आदि प्राप्त नहीं हुआ है, उस कृष्णकी अर्घ्यके द्वारा पूजा की है ।। २१ ।। अकस्माद् धर्मपुत्रस्य धर्मात्मेति यशो गतम् । को हि धर्मच्युते पूजामेवं युक्तां नियोजयेत् ।। २२ ।। धर्मपुत्र युधिष्ठिरको अकस्मात् ही धर्मात्मा होनेका यश प्राप्त हो गया है, अन्यथा कौन ऐसा धर्मनिष्ठ पुरुष होगा जो किसी धर्मच्युतकी इस प्रकार पूजा करेगा ।। २२ ।। योऽयं वृष्णिकुले जातो राजानं हतवान् पुरा । जरासंधं महात्मानमन्यायेन दुरात्मवान् ।। २३ ।। वृष्णिकुलमें पैदा हुए इस दुरात्माने तो कुछ ही दिन पहले महात्मा राजा जरासंधका अन्यायपूर्वक वध किया है ।। २३ ।। अद्य धर्मात्मता चैव व्यपकृष्टा युधिष्ठिरात् । दर्शितं कृपणत्वं च कृष्णोऽर्घ्यस्य निवेदनात् ।। २४ ।। आज युधिष्ठिरका धर्मात्मापन दूर निकल गया, क्योंकि इन्होंने कृष्णको अर्घ्य निवेदन करके अपनी कायरता ही दिखायी है ।। २४ ।।

यदि भीताश्च कौन्तेयाः कृपणाश्च तपस्विनः ।
ननु त्वयापि बोद्धव्यं यां पूजां माधवार्हसि ॥ २५ ॥
(अब शिशुपालने भगवान् श्रीकृष्णको देखकर कहा—) माधव! कुन्तीके पुत्र डरपोक, कायर और तपस्वी हैं। इन्होंने तुम्हें ठीक-ठीक न जानकर यदि तुम्हारी पूजा कर दी तो तुम्हें तो समझना चाहिये था कि तुम किस पूजाके अधिकारी हो? ॥ २५ ॥

अथ वा कृपणैरेतामुपनीतां जनार्दन ।
पूजामनर्हः कस्मात् त्वमभ्यनुज्ञातवानसि ॥ २६ ॥
अथवा जनार्दन! इन कायरोंद्वारा उपस्थित की हुई इस अग्रपूजाको उसके योग्य न होते हुए भी तुमने क्यों स्वीकार कर लिया? ॥ २६ ॥

अयुक्तामात्मनः पूजां त्वं पुनर्बहु मन्यसे ।
हविषः प्राप्य निष्पन्दं प्राशिता श्वैव निर्जने ॥ २७ ॥
जैसे कुत्ता एकान्तमें चूकर गिरे हुए थोड़े-से हविष्य (घृत)-को चाट ले और अपनेको धन्य धन्य मानने लगे, उसी प्रकार तुम अपने लिये अयोग्य पूजा स्वीकार करके अपने-आपको बहुत बड़ा मान रहे हो ॥ २७ ॥

न त्वयं पार्थिवेन्द्राणामपमानः प्रयुज्यते ।
त्वामेव कुरवो व्यक्तं प्रलम्भन्ते जनार्दन ॥ २८ ॥
कृष्ण! तुम्हारी इस अग्रपूजासे हम राजाधिराजोंका कोई अपमान नहीं होता, परंतु ये कुरुवंशी पाण्डव तुम्हें अर्घ्य देकर वास्तवमें तुम्हींको ठग रहे हैं ॥ २८ ॥

क्लीबे दारक्रिया यादृगन्धे वा रूपदर्शनम् ।
अराज्ञो राजवत् पूजा तथा ते मधुसूदन ॥ २९ ॥
मधुसूदन! जैसे नपुंसकका ब्याह रचाना और अंधेको रूप दिखाना उनका उपहास ही करना है, उसी प्रकार तुम-जैसे राज्यहीनकी यह राजाओंके समान पूजा भी विडम्बनामात्र ही है ॥ २९ ॥

दृष्टो युधिष्ठिरो राजा दृष्टो भीष्मश्च यादृशः ।
वासुदेवोऽप्ययं दृष्टः सर्वमेतद् यथातथम् ॥ ३० ॥
आज मैंने राजा युधिष्ठिरको देख लिया; भीष्म भी जैसे हैं, उनको भी देख लिया और इस वासुदेव कृष्णका भी वास्तविक रूप क्या है, यह भी देख लिया। वास्तवमें ये सब ऐसे ही हैं ॥ ३० ॥

इत्युक्त्वा शिशुपालस्तानुत्थाय परमासनात् ।
निर्ययौ सदसस्तस्मात् सहितो राजभिस्तदा ॥ ३१ ॥
उनसे ऐसा कहकर शिशुपाल अपने उत्तम आसनसे उठकर कुछ राजाओंके साथ उस सभाभवनसे जानेको उद्यत हो गया ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अर्घाभिहरणपर्वणि शिशुपालक्रोधे सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अर्घाभिहरणपर्वमें शिशुपालका क्रोधविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1868)

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अष्टात्रिंशोऽध्यायः

युधिष्ठिरका शिशुपालको समझाना और भीष्मजीका उसके आक्षेपोंका उत्तर देना

वैशम्पायन उवाच

ततो युधिष्ठिरो राजा शिशुपालमुपाद्रवत् ।
उवाच चैनं मधुरं सान्त्वपूर्वमिदं वचः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब राजा युधिष्ठिर शिशुपालके समीप दौड़े गये और उसे शान्तिपूर्वक समझाते हुए मधुर वाणीमें बोले— ॥ १ ॥

नेदं युक्तं महीपाल यादृशं वै त्वमुक्तवान् ।
अधर्मश्च परो राजन् पारुष्यं च निरर्थकम् ॥ २ ॥
‘राजन्! तुमने जैसी बात कह डाली है, वह कदापि उचित नहीं है। किसीके प्रति इस प्रकार व्यर्थ कठोर बातें कहना महान् अधर्म है ॥ २ ॥

न हि धर्मं परं जातु नावबुध्येत पार्थिवः ।
भीष्मः शान्तनवस्त्वेनं मावमंस्थास्त्वमन्यथा ॥ ३ ॥
‘शान्तनुनन्दन भीष्मजी धर्मके तत्त्वको न जानते हों ऐसी बात नहीं है, अतः तुम इनका अनादर न करो ॥ ३ ॥

पश्य चैतान् महीपालांस्त्वत्तो वृद्धतरान् बहून् ।
मृष्यन्ते चार्हणां कृष्णे तद्वत् त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ ४ ॥
‘देखो! ये सभी नरेश, जिनमेंसे कई तो तुम्हारी अपेक्षा बहुत बड़ी अवस्थाके हैं, श्रीकृष्णकी अग्रपूजाको चुपचाप सहन कर रहे हैं, इसी प्रकार तुम्हें भी इस विषयमें कुछ नहीं बोलना चाहिये ॥ ४ ॥

वेद तत्त्वेन कृष्णं हि भीष्मश्चेदिपते भृशम् ।
न ह्येनं त्वं तथा वेत्थ यथैनं वेद कौरवः ॥ ५ ॥
‘चेदिराज! भगवान् श्रीकृष्णको यथार्थरूपसे हमारे पितामह भीष्मजी ही जानते हैं। कुरुनन्दन भीष्मजीको उनके तत्त्वका जैसा ज्ञान है, वैसा तुम्हें नहीं है’ ॥ ५ ॥

भीष्म उवाच

नास्मै देयो ह्यनुनयो नायमर्हति सान्त्वनम् ।
लोकवृद्धतमे कृष्णे योऽर्हणां नाभिमन्यते ॥ ६ ॥
**भीष्मजीने कहा—**धर्मराज! भगवान् श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण जगत्में सबसे बढ़कर हैं। वे ही परम पूजनीय हैं। जो उनकी अग्रपूजा स्वीकार नहीं करता है, उसकी अनुनय-विनय

नहीं करनी चाहिये। वह सान्त्वना देने या समझाने-बुझानेके योग्य भी नहीं है ।। ६ ।।

क्षत्रियः क्षत्रियं जित्वा रणे रणकृतां वरः ।
यो मुञ्चति वशे कृत्वा गुरुर्भवति तस्य सः ।। ७ ।।
जो योद्धाओंमें श्रेष्ठ क्षत्रिय जिसे युद्धमें जीतकर अपने वशमें करके छोड़ देता है, वह उस पराजित क्षत्रियके लिये गुरुतुल्य पूज्य हो जाता है ।। ७ ।।

अस्यां हि समितौ राज्ञामेकमप्यजितं युधि ।
न पश्यामि महीपालं सात्वतीपुत्रतेजसा ।। ८ ।।
राजाओंके इस समुदायमें एक भी भूपाल ऐसा नहीं दिखायी देता, जो युद्धमें देवकीनन्दन श्रीकृष्णके तेजसे परास्त न हो चुका हो ।। ८ ।।

न हि केवलमस्माकमयमर्च्यतमोऽच्युतः ।
त्रयाणामपि लोकानामर्चनीयो महाभुजः ।। ९ ।।
महाबाहु श्रीकृष्ण केवल हमारे लिये ही परम पूजनीय हों, ऐसी बात नहीं है, ये तो तीनों लोकोंके पूजनीय हैं ।। ९ ।।

कृष्णेन हि जिता युद्धे बहवः क्षत्रियर्षभाः ।
जगत् सर्वं च वार्ष्णेये निखिलेन प्रतिष्ठितम् ।। १० ।।
श्रीकृष्णके द्वारा संग्राममें अनेक क्षत्रियशिरोमणि परास्त हुए हैं। यह सम्पूर्ण जगत् वृष्णिकुलभूषण भगवान् श्रीकृष्णमें ही पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित है ।। १० ।।

तस्मात् सत्स्वपि वृद्धेषु कृष्णमर्चाम नेतरान् ।
एवं वक्तुं न चार्हस्त्वं मा ते भूद् बुद्धिरीदृशी ।। ११ ।।
इसीलिये हम दूसरे वृद्ध पुरुषोंके होते हुए भी श्रीकृष्णकी ही पूजा करते हैं, दूसरोंकी नहीं। राजन्! तुम्हें श्रीकृष्णके प्रति वैसी बातें मुँहसे नहीं निकालनी चाहिये थीं। उनके प्रति तुम्हें ऐसी बुद्धि नहीं रखनी चाहिये ।। ११ ।।

ज्ञानवृद्धा मया राजन् बहवः पर्युपासिताः ।
तेषां कथयतां शौरेरहं गुणवतो गुणान् ।। १२ ।।
समागतानामश्रौषं बहून् बहुमतान् सताम् ।
मैंने बहुत-से ज्ञानवृद्ध महात्माओंका संग किया है। अपने यहाँ पधारे हुए उन संतोंके मुखसे अनन्तगुणशाली भगवान् श्रीकृष्णके असंख्य बहुसम्मत गुणोंका वर्णन सुना है ।। १२ १/२ ।।

कर्माण्यपि च यान्यस्य जन्मप्रभृति धीमतः ।। १३ ।।
बहुशः कथ्यमानानि नरैर्भूयः श्रुतानि मे ।
जन्मकालसे लेकर अबतक इन बुद्धिमान् श्रीकृष्णके जो-जो चरित्र बहुधा बहुतेरे मनुष्योंद्वारा कहे गये हैं, उन सबको मैंने बार-बार सुना है ।। १३ १/२ ।।

न केवलं वयं कामाच्चेदिराज जनार्दनम् ।। १४ ।।

न सम्बन्धं पुरस्कृत्य कृतार्थं वा कथंचन । अर्चामहेऽर्चितं सद्भिर्भुवि भूतसुखावहम् ॥ १५ ॥ चेदिराज! हमलोग किसी कामनासे, अपना सम्बन्धी मानकर अथवा इन्होंने हमारा किसी प्रकारका उपकार किया है, इस दृष्टिसे श्रीकृष्णकी पूजा नहीं कर रहे हैं। हमारी दृष्टि तो यह है कि ये इस भूमण्डलके सभी प्राणियोंको सुख पहुँचानेवाले हैं और बड़े-बड़े संत-महात्माओंने इनकी पूजा की है ॥ १४-१५ ॥

यशः शौर्यं जयं चास्य विज्ञायार्चां प्रयुञ्जमहे । न च कश्चिदिहास्माभिः सुबालोऽप्यपरीक्षितः ॥ १६ ॥ हम इनके यश, शौर्य और विजयको भलीभाँति जानकर इनकी पूजा कर रहे हैं। यहाँ बैठे हुए लोगोंमेंसे कोई छोटा-सा बालक भी ऐसा नहीं है, जिसके गुणोंकी हमलोगोंने पूर्णतः परीक्षा न की हो ॥ १६ ॥

गुणैर्वृद्धानतिक्रम्य हरिरर्च्यतमो मतः । ज्ञानवृद्धो द्विजातीनां क्षत्रियाणां बलाधिकः ॥ १७ ॥ श्रीकृष्णके गुणोंको ही दृष्टिमें रखते हुए हमने वयोवृद्ध पुरुषोंका उल्लंघन करके इनको ही परम पूजनीय माना है। ब्राह्मणोंमें वही पूजनीय समझा जाता है, जो ज्ञानमें बड़ा हो तथा क्षत्रियोंमें वही पूजाके योग्य हैं, जो बलमें सबसे अधिक हो ॥ १७ ॥

वैश्यानां धान्यधनवाञ्छूद्राणामेव जन्मतः । पूज्यतायां च गोविन्दे हेतू द्वावपि संस्थितौ ॥ १८ ॥ वैश्योंमें वही सर्वमान्य है, जो धन-धान्यमें बढ़कर हो, केवल शूद्रोंमें ही जन्मकालको ध्यानमें रखकर जो अवस्थामें बड़ा हो, उसको पूजनीय माना जाता है। श्रीकृष्णके परम पूजनीय होनेमें दोनों ही कारण विद्यमान हैं ॥ १८ ॥

वेदवेदाङ्गविज्ञानं बलं चाभ्यधिकं तथा । नृणां लोके हि कोऽन्योऽस्ति विशिष्टः केशवादृते ॥ १९ ॥ इनमें वेद-वेदांगोंका ज्ञान तो है ही, बल भी सबसे अधिक है। श्रीकृष्णके सिवा संसारके मनुष्योंमें दूसरा कौन सबसे बढ़कर है? ॥ १९ ॥

दानं दाक्ष्यं श्रुतं शौर्यं ह्रीः कीर्तिर्बुद्धिरुत्तमा । सन्नतिः श्रीर्धृतिस्तुष्टिः पुष्टिश्च नियताच्युते ॥ २० ॥ दान, दक्षता; शास्त्रज्ञान, शौर्य, लज्जा, कीर्ति, उत्तम बुद्धि, विनय, श्री, धृति, तुष्टि और पुष्टि —ये सभी सद्गुण भगवान् श्रीकृष्णमें नित्य विद्यमान हैं ॥ २० ॥

तमिमं गुणसम्पन्नमार्यं च पितरं गुरुम् । अर्घ्यमर्चितमर्हार्हं सर्वे संक्षन्तुमर्हथ ॥ २१ ॥ जो अर्घ्य पानेके सर्वथा योग्य और पूजनीय है, उन सकलगुणसम्पन्न, श्रेष्ठ, पिता और गुरु भगवान् श्रीकृष्णकी हमलोगोंने पूजा की है, अतः सब राजालोग इसके लिये हमें क्षमा

करें ।। २१ ।। ऋत्विग् गुरुस्तथाऽऽचार्यः स्नातको नृपतिः प्रियः । सर्वमेतद्धृषीकेशस्तस्मादभ्यर्चितोऽच्युतः ।। २२ ।। श्रीकृष्ण हमारे ऋत्विक्, गुरु, आचार्य, स्नातक, राजा और प्रिय मित्र सब कुछ हैं। इसीलिये हमने इनकी अग्रपूजा की है ।। २२ ।। कृष्ण एव हि लोकानामुत्पत्तिरपि चाप्ययः । कृष्णस्य हि कृते विश्वमिदं भूतं चराचरम् ।। २३ ।। भगवान् श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं। यह सारा चराचर विश्व इन्हींके लिये प्रकट हुआ है ।। २३ ।। एष प्रकृतिरव्यक्ता कर्ता चैव सनातनः । परश्च सर्वभूतेभ्यस्तस्मात् पूज्यतमोऽच्युतः ।। २४ ।। ये ही अव्यक्त प्रकृति, सनातन कर्ता तथा सम्पूर्ण भूतोंसे परे हैं; अतः भगवान् अच्युत ही सबसे बढ़कर पूजनीय हैं ।। २४ ।। बुद्धिर्मनो महद् वायुस्तेजोऽम्भः खं मही च या । चतुर्विधं च यद् भूतं सर्वं कृष्णे प्रतिष्ठितम् ।। २५ ।। महत्तत्त्व, अहंकार, मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी तथा जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज—ये चार प्रकारके प्राणी भगवान् श्रीकृष्णमें ही प्रतिष्ठित हैं ।। २५ ।। आदित्यश्चन्द्रमाश्चैव नक्षत्राणि ग्रहाश्च ये । दिशश्च विदिशश्चैव सर्वं कृष्णे प्रतिष्ठितम् ।। २६ ।। अग्निहोत्रमुखा वेदा गायत्री छन्दसां मुखम् । राजा मुखं मनुष्याणां नदीनां सागरो मुखम् ।। २७ ।। नक्षत्राणां मुखं चन्द्र आदित्यस्तेजसां मुखम् । पर्वतानां मुखं मेरुर्गरुडः पततां मुखम् ।। २८ ।। ऊर्ध्वं तिर्यगधश्चैव यावती जगतो गतिः । सदेवकेषु लोकेषु भगवान् केशवो मुखम् ।। २९ ।। सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, ग्रह, दिशा और विदिशा सब उन्हींमें स्थित हैं। जैसे वेदोंमें अग्निहोत्रकर्म, छन्दोंमें गायत्री, मनुष्योंमें राजा, नदियों (जलाशयों)-में समुद्र, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, तेजोमय पदार्थोंमें सूर्य, पर्वतोंमें मेरु और पक्षियोंमें गरुड श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार देवलोकसहित सम्पूर्ण लोकोंमें ऊपर-नीचे, दायें-बायें, जितने भी जगत्‌के आश्रय हैं, उन सबमें भगवान् श्रीकृष्ण ही श्रेष्ठ हैं ।। २६—२९ ।।

[भगवान् नारायणकी महिमा और उनके द्वारा मधु-कैटभका वध]

(वैशम्पायन उवाच)

ततो भीष्मस्य तच्छ्रुत्वा वचः काले युधिष्ठिरः।
उवाच मतिमान् भीष्मं ततः कौरवनन्दनः॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर भीष्मजीका वह समयोचित वचन सुनकर कौरवनन्दन बुद्धिमान् युधिष्ठिरने उनसे इस प्रकार कहा।

युधिष्ठिर उवाच

विस्तरेणास्य देवस्य कर्माणीच्छामि सर्वशः।
श्रोतुं भगवतस्तानि प्रब्रूवीहि पितामह॥
कर्मणामानुपूर्व्यं च प्रादुर्भावांश्च मे विभोः।
यथा च प्रकृतिः कृष्णे तन्मे ब्रूहि पितामह॥
**युधिष्ठिर बोले—**पितामह! मैं इन भगवान् श्रीकृष्णके सम्पूर्ण चरित्रोंको विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। आप उन्हें कृपापूर्वक बतावें। पितामह! भगवान्‌के अवतारों और चरित्रोंका क्रमशः वर्णन कीजिये। साथ ही मुझे यह भी बताइये कि श्रीकृष्णका शील-स्वभाव कैसा है?

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तदा भीष्मः प्रोवाच भरतर्षभम्।
युधिष्ठिरममित्रघ्नं तस्मिन् क्षत्रसमागमे॥
समक्षं वासुदेवस्य देवस्येव शतक्रतोः।
कर्माण्यसुकराण्यर्थैराचचक्षे जनाधिप॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उस समय युधिष्ठिरके इस प्रकार अनुरोध करनेपर भीष्मने राजाओंके उस समुदायमें देवराज इन्द्रके समान सुशोभित होनेवाले भगवान् वासुदेवके सामने ही शत्रुहन्ता भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिरसे भगवान् श्रीकृष्णके अलौकिक कर्मोंका, जिन्हें दूसरा कोई कदापि नहीं कर सकता, वर्णन किया।

शृण्वतां पार्थिवानां च धर्मराजस्य चान्तिके।
इदं मतिमतां श्रेष्ठः कृष्णं प्रति विशाम्पते॥
साम्नैवामन्त्र्य राजेन्द्र चेदिराजमरिंदमम्।
भीमकर्मा ततो भीष्मो भूयः स इदमब्रवीत्॥
कुरूणां चापि राजानं युधिष्ठिरमुवाच ह।
धर्मराजके समीप बैठे हुए सम्पूर्ण नरेश उनकी यह बात सुन रहे थे। राजन्! बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भीमकर्मा भीष्मने शत्रुदमन चेदिराज शिशुपालको सान्त्वनापूर्ण शब्दोंमें ही

समझ़ाकर कुरुराज युधिष्ठिरसे पुनः इस प्रकार कहना आरम्भ किया।

भीष्म उवाच

वर्तमानामतीतां च शृणु राजन् युधिष्ठिर ।
ईश्वरस्योत्तमस्यैनां कर्मणां गहनां गतिम् ॥
**भीष्म बोले—**राजा युधिष्ठिर! पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके दिव्य कर्मोंकी गति बड़ी गहन है। उन्होंने पूर्वकालमें और इस समय भी जो महान् कर्म किये हैं, उन्हें बताता हूँ; सुनो।

अव्यक्तो व्यक्तिलिङ्गस्थो य एष भगवान् प्रभुः ॥
पुरा नारायणो देवः स्वयम्भूः प्रपितामहः ।
ये सर्वशक्तिमान् भगवान् अव्यक्त होते हुए भी व्यक्त स्वरूप धारण करके स्थित हैं। पूर्वकालमें ये भगवान् श्रीकृष्ण ही नारायणरूपमें स्थित थे। ये ही स्वयम्भू एवं सम्पूर्ण जगत्‌के प्रपितामह हैं।

सहस्रशीर्षः पुरुषो ध्रुवोऽव्यक्तः सनातनः ॥
सहस्राक्षः सहस्रास्यः सहस्रचरणो विभुः ।
सहस्रबाहुः साहस्रो देवो नामसहस्रवान् ॥
इनके सहस्रों मस्तक हैं। ये ही पुरुष, ध्रुव, अव्यक्त एवं सनातन परमात्मा हैं। इनके सहस्रों नेत्र, सहस्रों मुख और सहस्रों चरण हैं। ये सर्वव्यापी परमेश्वर सहस्रों भुजाओं, सहस्रों रूपों और सहस्रों नामोंसे युक्त हैं।

सहस्रमुकुटो देवो विश्वरूपो महाद्युतिः ।
अनेकवर्णो देवादिर्व्यक्ताद् वै परे स्थितः ॥
इनके मस्तक सहस्रों मुकुटोंसे मण्डित हैं। ये महान् तेजस्वी देवता हैं। सम्पूर्ण विश्व इन्हींका स्वरूप है। इनके अनेक वर्ण हैं। ये देवताओंके भी आदि कारण हैं और अव्यक्त प्रकृतिसे परे (अपने सच्चिदानन्दघन स्वरूपमें स्थित) हैं।

असृजत् सलिलं पूर्वं स च नारायणः प्रभुः ।
ततस्तु भगवांस्तोये ब्रह्माणमसृजत् स्वयम् ॥
उन्हीं सामर्थ्यवान् भगवान् नारायणने सबसे पहले जलकी सृष्टि की है। फिर उस जलमें उन्होंने स्वयं ही ब्रह्माजीको उत्पन्न किया।

ब्रह्मा चतुर्मुखो लोकान् सर्वांस्तानसृजत् स्वयम् ।
आदिकाले पुरा ह्येवं सर्वलोकस्य चोद्भवः ॥
ब्रह्माजीके चार मुख हैं। उन्होंने स्वयं ही सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि की है। इस प्रकार आदिकालमें समस्त जगत्‌की उत्पत्ति हुई।

पुराथ प्रलये प्राप्ते नष्टे स्थावरजङ्गमे ।

ब्रह्मादिषु प्रलीनेषु नष्टे लोके चराचरे ॥ फिर प्रलयकाल आनेपर, जैसा कि पहले हुआ था, समस्त स्थावर-जंगम सृष्टिका नाश हो जाता है एवं चराचर जगत्का नाश होनेके पश्चात् ब्रह्मा आदि देवता भी अपने कारणतत्त्वमें लीन हो जाते हैं। आभूतसम्प्लवे प्राप्ते प्रलीने प्रकृतौ महान् । एकस्तिष्ठति सर्वात्मा स तु नारायणः प्रभुः ॥ और समस्त भूतोंका प्रवाह प्रकृतिमें विलीन हो जाता है, उस समय एकमात्र सर्वात्मा भगवान् महानारायण शेष रह जाते हैं। नारायणस्य चाङ्गानि सर्वदैवानि भारत । शिरस्तस्य दिवं राजन् नाभिः खं चरणौ मही ॥ भरतनन्दन! भगवान् नारायणके सब अंग सर्वदेवमय हैं। राजन्! द्युलोक उनका मस्तक, आकाश नाभि और पृथ्वी चरण हैं। अश्विनौ घ्राणयोर्देवौ चक्षुषी शशिभास्करौ । इन्द्रवैश्वानरौ देवौ मुखं तस्य महात्मनः ॥ दोनों अश्विनीकुमार उनकी नासिकाके स्थानमें हैं, चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं एवं इन्द्र और अग्निदेवता उन परमात्माके मुख हैं। अन्यानि सर्वदैवानि तस्याङ्गानि महात्मनः । सर्वं व्याप्य हरिस्तस्थौ सूत्रं मणिगणानिव ॥ इसी प्रकार अन्य सब देवता भी उन महात्माके विभिन्न अवयव हैं। जैसे गुँथी हुई मालाकी सभी मणियोंमें एक ही सूत्र व्याप्त रहता है, उसी प्रकार भगवान् श्रीहरि सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके स्थित हैं। आभूतसम्प्लवान्तेऽथ दृष्ट्वा सर्वं तमोऽन्वितम् । नारायणो महायोगी सर्वज्ञः परमात्मवान् ॥ ब्रह्मभूतस्तदाऽऽत्मानं ब्रह्माणमसृजत् स्वयम् । प्रलयकालके अन्तमें सबको अन्धकारसे व्याप्त देख सर्वज्ञ परमात्मा ब्रह्मभूत महायोगी नारायणने स्वयं अपने-आपको ही ब्रह्मारूपमें प्रकट किया। सोऽध्यक्षः सर्वभूतानां प्रभूतः प्रभवोऽच्युतः ॥ सनत्कुमारं रुद्रं च मनुं चैव तपोधनान् । सर्वमेवासृजद् ब्रह्मा ततो लोकान् प्रजास्तथा ॥ इस प्रकार अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले, सबकी उत्पत्तिके कारणभूत और सम्पूर्ण भूतोंके अध्यक्ष श्रीहरिने ब्रह्मारूपसे प्रकट हो सनत्कुमार, रुद्र, मनु तथा तपस्वी ऋषि-मुनियोंको उत्पन्न किया। सबकी सृष्टि उन्होंने ही की। उन्हींसे सम्पूर्ण लोकों और प्रजाओंकी उत्पत्ति हुई।

ते च तद् व्यसृजंस्तत्र प्राप्ते काले युधिष्ठिर ।
तेभ्योऽभवन्महात्मभ्यो बहुधा ब्रह्म शाश्वतम् ॥
युधिष्ठिर! समय आनेपर उन मनु आदिने भी सृष्टिका विस्तार किया। उन सब महात्माओंसे नाना प्रकारकी सृष्टि प्रकट हुई। इस प्रकार एक ही सनातन ब्रह्म अनेक रूपोंमें अभिव्यक्त हो गया।

कल्पानां बहुकोट्यश्च समतीता हि भारत ।
आभूतसम्प्लवाश्चैव बहुकोट्योऽतिचक्रमुः ॥
भरतनन्दन! अबतक कई करोड़ कल्प बीत चुके हैं और कितने ही करोड़ प्रलयकाल भी गत हो चुके हैं।

मन्वन्तरयुगेऽजस्रं सकल्पा भूतसम्प्लवा ।
चक्रवत् परिवर्तन्ते सर्वं विष्णुमयं जगत् ॥
मन्वन्तर, युग, कल्प और प्रलय—ये निरन्तर चक्रकी भाँति घूमते रहते हैं। यह सम्पूर्ण जगत् विष्णुमय है।

सृष्ट्वा चतुर्मुखं देवं देवो नारायणः प्रभुः ।
स लोकानां हितार्थाय क्षीरोदे वसति प्रभुः ॥
देवाधिदेव भगवान् नारायण चतुर्मुख भगवान् ब्रह्माकी सृष्टि करके सम्पूर्ण लोकोंका हित करनेके लिये क्षीरसागरमें निवास करते हैं।

ब्रह्मा च सर्वदेवानां लोकस्य च पितामहः ।
ततो नारायणो देवः सर्वस्य प्रपितामहः ॥
ब्रह्माजी सम्पूर्ण देवताओं तथा लोकोंके पितामह हैं, इसलिये श्रीनारायणदेव सबके प्रपितामह हैं।

अव्यक्तो व्यक्तलिङ्गस्थो य एष भगवान् प्रभुः ।
नारायणो जगच्चक्रे प्रभवाप्ययसंहितः ॥
जो अव्यक्त होते हुए व्यक्त शरीरमें स्थित हैं, सृष्टि और प्रलयकालमें भी जो नित्य विद्यमान रहते हैं, उन्हीं सर्वशक्तिमान् भगवान् नारायणने इस जगत्‌की रचना की है।

एष नारायणो भूत्वा हरिरासीद् युधिष्ठिर ।
ब्रह्माणं शशिसूर्यौ च धर्मं चैवासृजत् स्वयम् ॥
युधिष्ठिर! इन भगवान् श्रीकृष्णने ही नारायणरूपमें स्थित होकर स्वयं ब्रह्मा, सूर्य, चन्द्रमा और धर्मकी सृष्टि की है।

बहुशः सर्वभूतात्मा प्रादुर्भवति कार्यतः ।
प्रादुर्भावांस्तु वक्ष्यामि दिव्यान् देवगणैर्युतान् ॥
ये समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा हैं और कार्यवश अनेक रूपोंमें अवतीर्ण होते रहते हैं। इनके सभी अवतार दिव्य हैं और देवगणोंसे संयुक्त भी हैं। मैं उन सबका वर्णन करता हूँ।

सुप्त्वा युगसहस्रं स प्रादुर्भवति कार्यवान् । पूर्णे युगसहस्रेऽथ देवदेवो जगत्पतिः ॥ ब्रह्माणं कपिलं चैव परमेष्ठिनमेव च । देवान् सप्त ऋषींश्चैव शङ्करं च महायशाः ॥ देवाधिदेव जगदीश्वर महायशस्वी भगवान् श्रीहरि सहस्र युगोंतक शयन करनेके पश्चात् कल्पान्तकी सहस्रयुगात्मक अवधि पूरी होनेपर प्रकट होते और सृष्टिकार्यमें संलग्न हो परमेष्ठी ब्रह्मा, कपिल, देवगणों, सप्तर्षियों तथा शंकरकी उत्पत्ति करते हैं।

सनत्कुमारं भगवान् मनुं चैव प्रजापतिम् । पुरा चक्रेऽथ देवादीन् प्रदीप्ताग्निसमप्रभः ॥ इसी प्रकार भगवान् श्रीहरि सनत्कुमार, मनु एवं प्रजापतिको भी उत्पन्न करते हैं। पूर्वकालमें प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी नारायणदेवने ही देवताओं आदिकी सृष्टि की है।

येन चार्णवमध्यस्थौ नष्टे स्थावरजङ्गमे । नष्टदेवासुरनरे प्रणष्टोरगराक्षसे ॥ योद्धुकामौ सुदुर्धर्षौ भ्रातरौ मधुकैटभौ । हतौ भगवता तेन तयोर्दत्त्वा वृतं वरम् ॥ पहलेकी बात है, प्रलयकालमें समस्त चराचर प्राणी, देवता, असुर, मनुष्य, नाग तथा राक्षस सभी नष्ट हो चुके थे। उस समय एकार्णव (महासागर)-की जलराशिमें दो अत्यन्त दुर्धर्ष दैत्य रहते थे, जिनके नाम थे—मधु और कैटभ। वे दोनों भाई युद्धकी इच्छा रखते थे। उन्हीं भगवान् नारायणने उन्हें मनोवांछित वर देकर उन दोनों दैत्योंका वध किया था।

भूमिं बद्ध्वा कृतौ पूर्वं मृन्मयौ द्वौ महासुरौ । कर्णस्रोतोद्भवौ तौ तु विष्णोस्तस्य महात्मनः ॥ कहते हैं, वे दोनों महान् असुर महात्मा भगवान् विष्णुके कानोंकी मैलसे उत्पन्न हुए थे। पहले भगवान्ने इस पृथ्वीको आबद्ध करके मिट्टीसे ही उनकी आकृति बनायी थी।

महार्णवे प्रस्वपतः शैलराजसमौ स्थितौ । तौ विवेश स्वयं वायुः ब्रह्मणा साधु चोदितः ॥ वे पर्वतराज हिमालयके समान विशाल शरीर लिये महासागरके जलमें सो रहे थे। उस समय ब्रह्माजीकी प्रेरणासे स्वयं वायुदेवने उनके भीतर प्रवेश किया।

तौ दिवं छादयित्वा तु ववृधाते महासुरौ । वायुप्राणौ तु तौ दृष्ट्वा ब्रह्मा पर्यामृशच्छनैः ॥ फिर तो वे दोनों महान् असुर सम्पूर्ण द्युलोकको आच्छादित करके बढ़ने लगे। वायुदेव ही जिनके प्राण थे, उन दोनों असुरोंको देखकर ब्रह्माजीने धीरे-धीरे उनके शरीरपर हाथ फेरा।

एकं मृदुतरं बुद्ध्वा कठिनं बुध्य चापरम् । नामनी तु तयोश्चक्रे स विभुः सलिलोद्भवः ॥ एकका शरीर उन्हें अत्यन्त कोमल प्रतीत हुआ और दूसरेका अत्यन्त कठोर। तब जलसे उत्पन्न होनेवाले भगवान् ब्रह्माने उन दोनोंका नामकरण किया।

मृदुस्त्वयं मधुर्नाम कठिनः कैटभः स्वयम् । तौ दैत्यौ कृतनामानौ चेरतुर्बलगर्वितौ ॥ यह जो मृदुल शरीरवाला असुर है, इसका नाम मधु होगा और जिसका शरीर कठोर है, वह कैटभ कहलायेगा। इस प्रकार नाम निश्चित हो जानेपर वे दोनों दैत्य बलसे उन्मत्त होकर सब ओर विचरने लगे।

तौ पुराथ दिवं सर्वां प्राप्तौ राजन् महासुरौ । प्रच्छाद्याथ दिवं सर्वां चेरतुर्मधुकैटभौ ॥ राजन्! सबसे पहले वे दोनों महादैत्य मधु और कैटभ द्युलोकमें पहुँचे और उस सारे लोकको आच्छादित करके सब ओर विचरने लगे।

सर्वमेकार्णवं लोकं योद्धुकामौ सुनिर्भयौ । तौ गतावासुरौ दृष्ट्वा ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ एकार्णवाम्बुनिचये तत्रैवान्तरधीयत । उस समय सारा लोक जलमय हो रहा था। उसमें युद्धकी कामनासे अत्यन्त निर्भय होकर आये हुए उन दोनों असुरोंको देखकर लोकपितामह ब्रह्माजी वहीं एकार्णवरूप जलराशिमें अन्तर्धान हो गये।

स पद्मे पद्मनाभस्य नाभिदेशात् समुत्थिते ॥ आसीदादौ स्वयंजन्म तत् पङ्कजमपङ्कजम् । पूजयामास वसतिं ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ वे भगवान् पद्मनाभ (विष्णु)-की नाभिसे प्रकट हुए कमलमें जा बैठे। वह कमल वहाँ पहले ही स्वयं प्रकट हुआ था। कहनेको तो वह पंकज था, परंतु पंकसे उसकी उत्पत्ति नहीं हुई थी। लोकपितामह ब्रह्माने अपने निवासके लिये उस कमलको ही पसंद किया और उसकी भूरि-भूरि सराहना की।

तावुभौ जलगर्भस्थौ नारायणचतुर्मुखौ । बहून् वर्षायुतानप्सु शयानौ न चकम्पतुः ॥ अथ दीर्घस्य कालस्य तावुभौ मधुकैटभौ । आजग्मतुस्तौ तं देशं यत्र ब्रह्मा व्यवस्थितः ॥ भगवान् नारायण और ब्रह्मा दोनों ही अनेक सहस्र वर्षोंतक उस जलके भीतर सोते रहे; किंतु कभी तनिक भी कम्पायमान नहीं हुए। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् वे दोनों असुर मधु और कैटभ उसी स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ ब्रह्माजी स्थित थे।

तौ दृष्ट्वा लोकनाथस्तु कोपात् संरक्तलोचनः ।
उत्पपाताथ शयनात् पद्मनाभो महाद्युतिः ॥
तद् युद्धमभवद् घोरं तयोस्तस्य च वै तदा ।
एकार्णवे तदा घोरे त्रैलोक्ये जलतां गते ॥
तदभूत् तुमुलं युद्धं वर्षसङ्घान् सहस्रशः ।
न च तावसुरौ युद्धे तदा श्रममवापतुः ॥
उन दोनोंको आया देख महातेजस्वी लोकनाथ भगवान् पद्मनाभ अपनी शय्यासे खड़े हो गये। क्रोधसे उनकी आँखें लाल हो गयीं। फिर तो उन दोनोंके साथ उनका बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। उस भयानक एकार्णवमें जहाँ त्रिलोकी जलरूप हो गयी थी, सहस्रों वर्षोंतक उनका वह घमासान युद्ध चलता रहा; परंतु उस समय उस युद्धमें उन दोनों दैत्योंको तनिक भी थकावट नहीं होती थी।

अथ दीर्घस्य कालस्य तौ दैत्यौ युद्धदुर्मदौ ।
ऊचतुः प्रीतमनसौ देवं नारायणं प्रभुम् ॥
प्रीतौ स्वस्तव युद्धेन श्लाघ्यस्त्वं मृत्युरावयोः ।
आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता ॥
तत्पश्चात् दीर्घकाल व्यतीत होनेपर वे दोनों रणोन्मत्त दैत्य प्रसन्न होकर सर्वशक्तिमान् भगवान् नारायणसे बोले—'सुरश्रेष्ठ! हम दोनों तुम्हारे युद्ध-कौशलसे बहुत प्रसन्न हैं। तुम हमारे लिये स्पृहणीय मृत्यु हो। हमें ऐसी जगह मारो, जहाँकी भूमि पानीमें डूबी हुई न हो।

हतौ च तव पुत्रत्वं प्राप्नुयाव सुरोत्तम ।
यो ह्यावां युधि निर्जेता तस्यावां विहितौ सुतौ ॥
तयोः स वचनं श्रुत्वा तदा नारायणः प्रभुः ।
तौ प्रगृह्य मृधे दैत्यौ दोर्भ्यां तौ समपीडयत् ॥
ऊरुभ्यां निधनं चक्रे तावुभौ मधुकैटभौ ।
'तथा मरनेके पश्चात् हम दोनों तुम्हारे पुत्र हों। जो हमें युद्धमें जीत ले, हम उसीके पुत्र हों—ऐसी हमारी इच्छा है।' उनकी बात सुनकर भगवान् नारायणने उन दोनों दैत्योंको युद्धमें पकड़कर उन्हें दोनों हाथोंसे दबाया और मधु तथा कैटभ दोनोंको अपनी जाँघोंपर रखकर मार डाला।

तौ हतौ चाप्लुतौ तोये वपुर्भ्यामेकतां गतौ ॥
मेदो मुमुचतुर्दैत्यौ मथ्यमानौ जलोर्मिभिः ।
मेदसा तज्जलं व्याप्तं ताभ्यामन्तर्दधे तदा ॥
नारायणश्च भगवानसृजद् विविधाः प्रजाः ।
दैत्ययोर्मेदसाच्छन्ना सर्वा राजन् वसुन्धरा ॥
तदा प्रभृति कौन्तेय मेदिनीति स्मृता मही ।

प्रभावात् पद्मनाभस्य शाश्वती च कृता नृणाम् ।।

मरनेपर उन दोनोंकी लाशें जलमें डूबकर एक हो गयीं। जलकी लहरोंसे मथित होकर उन दोनों दैत्योंने जो मेद छोड़ा, उससे आच्छादित होकर वहाँका जल अदृश्य हो गया। उसीपर भगवान् नारायणने नाना प्रकारके जीवोंकी सृष्टि की। राजन् कुन्तीकुमार! उन दोनों दैत्योंके मेदसे सारी वसुधा आच्छादित हो गयी, अतः तभीसे यह मही 'मेदिनी' के नामसे प्रसिद्ध हुई। भगवान् पद्मनाभके प्रभावसे यह मनुष्योंके लिये शाश्वत आधार बन गयी।

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

[वराह, नृसिंह, वामन, दत्तात्रेय, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण तथा कल्कि अवतारोंकी संक्षिप्त कथा]

भीष्म उवाच

प्रादुर्भावसहस्राणि समतीतान्यनेकशः ।
यथाशक्ति तु वक्ष्यामि शृणु तान् कुरुनन्दन ॥
भीष्मजी कहते हैं—कुरुनन्दन! भगवान्‌के अब-तक कई सहस्र अवतार हो चुके हैं। मैं यहाँ कुछ अवतारोंका यथाशक्ति वर्णन करूँगा। तुम ध्यान देकर उनका वृत्तान्त सुनो।

पुरा कमलनाभस्य स्वपतः सागराम्भसि ।
पुष्करे यत्र सम्भूता देवा ऋषिगणैः सह ॥
पूर्वकालमें जब भगवान् पद्मनाभ समुद्रके जलमें शयन कर रहे थे, पुष्करमें उनसे अनेक देवताओं और महर्षियोंका प्रादुर्भाव हुआ।

एष पौष्करिको नाम प्रादुर्भावः प्रकीर्तितः ।
पुराणः कथ्यते यत्र वेदश्रुतिसमाहितः ॥
'यह भगवान्‌का 'पौष्करिक' (पुष्करसम्बन्धी) पुरातन अवतार कहा गया है, जो वैदिक श्रुतियोंद्वारा अनुमोदित है।

वाराहस्तु श्रुतिमुखः प्रादुर्भावो महात्मनः ।
यत्र विष्णुः सुरश्रेष्ठो वाराहं रूपमास्थितः ॥
उज्जहार महीं तोयात् सशैलवनकाननाम् ।
महात्मा श्रीहरिका जो वराह नामक अवतार है, उसमें भी प्रधानतः वैदिक श्रुति ही प्रमाण है। उस अवतारके समय भगवान्‌ने वराहरूप धारण करके पर्वतों और वनोंसहित सारी पृथिवीको जलसे बाहर निकाला था।

वेदपादो यूपदंष्ट्रः क्रतुदन्तश्चितीमुखः ॥
अग्निजिह्वो दर्भरोमा ब्रह्मशीर्षो महातपाः ।
चारों वेद ही भगवान् वराहके चार पैर थे। यूप ही उनकी दाढ़ थे। क्रतु (यज्ञ) ही दाँत और 'चिति' (इष्टिकाचयन) ही मुख थे। अग्नि जिह्वा, कुश रोम तथा ब्रह्म मस्तक थे। वे महान् तपसे सम्पन्न थे।

अहोरात्रेक्षणो दिव्यो वेदाङ्गः श्रुतिभूषणः ॥
आज्यनासः स्रुवतुण्डः सामघोषस्वनो महान् ।
दिन और रात ही उनके दो नेत्र थे। उनका स्वरूप दिव्य था। वेदांग ही उनके विभिन्न अंग थे। श्रुतियाँ ही उनके लिये आभूषणका काम देती थीं। घी उनकी नासिका, स्रुवा उनकी थूथन और सामवेदका स्वर ही उनकी भीषण गर्जना थी। उनका शरीर बहुत बड़ा था।

धर्मसत्यमयः श्रीमान् कर्मविक्रमसत्कृतः ॥

प्रायश्चित्तनखो धीरः पशुजानुर्महावृषः ।
धर्म और सत्य उनका स्वरूप था, वे अलौकिक तेजसे सम्पन्न थे। वे विभिन्न कर्मरूपी विक्रमसे सुशोभित हो रहे थे, प्रायश्चित्त उनके नख थे, वे धीर स्वभावसे युक्त थे, पशु उनके घुटनोंके स्थानमें थे और महान् वृषभ (धर्म) ही उनका श्रीविग्रह था।
औद्गात्रहोमलिङ्गोऽसौ फलबीजमहौषधिः ।।
बाह्यान्तरात्मा मन्त्रास्थिविकृतः सौम्यदर्शनः ।
उद्गाताका होमरूप कर्म उनका लिंग था, फल और बीज ही उनके लिये महान् औषध थे, वे बाह्य और आभ्यन्तर जगत्‌के आत्मा थे, वैदिक मन्त्र ही उनके शारीरिक अस्थिविकार थे। देखनेमें उनका स्वरूप बड़ा ही सौम्य था।
वेदिस्कन्धो हविर्गन्धो हव्यकव्यादिवेगवान् ।।
प्राग्वंशकायो द्युतिमान् नानादीक्षाभिराचितः ।
यज्ञकी वेदी ही उनके कंधे, हविष्य सुगन्ध और हव्य-कव्य आदि उनके वेग थे। प्राग्वंश (यजमानगृह एवं पत्नीशाला) उनका शरीर कहा गया है। वे महान् तेजस्वी और अनेक प्रकारकी दीक्षाओंसे व्याप्त थे।
दक्षिणाहृदयो योगी महाशास्त्रमयो महान् ।।
उपाकमाँष्ठरुचकः प्रवर्ग्यावर्तभूषणः ।
दक्षिणा उनके हृदयके स्थानमें थीं, वे महान् योगी और महान् शास्त्रस्वरूप थे। प्रीतिकारक उपाकर्म उनके ओष्ठ और प्रवर्ग्य कर्म ही उनके रत्नोंके आभूषण थे।
छायापत्नीसहायो वै मणिशृङ्ग इवोच्छ्रितः ।।
एवं यज्ञवराहो वै भूत्वा विष्णुः सनातनः ।
महीं सागरपर्यन्तां सशैलवनकाननाम् ।।
एकार्णवजले भ्रष्टामेकार्णवगतः प्रभुः ।
मज्जितां सलिले तस्मिन् स्वदेवीं पृथिवीं तदा ।।
उज्जहार विषाणेन मार्कण्डेयस्य पश्यतः ।
जलमें पड़नेवाली छाया (परछाईं) ही पत्नीकी भाँति उनकी सहायिका थी। वे मणिमय पर्वत-शिखरकी भाँति ऊँचे जान पड़ते थे। इस प्रकार यज्ञमय वराहरूप धारण करके एकार्णवके जलमें प्रविष्ट हो सर्वशक्तिमान् सनातन भगवान् विष्णुने उस जलमें गिरकर डूबी हुई पर्वत, वन और समुद्रोंसहित अपनी महारानी भूदेवीका (दाढ़ या) सींगकी सहायतासे मार्कण्डेय मुनिके देखते-देखते उद्धार किया।
शृङ्गेणेमां समुद्धृत्य लोकानां हितकाम्यया ।।
सहस्रशीर्षो देवो हि निर्ममे जगतीं प्रभुः ।
सहस्रों मस्तकोंसे सुशोभित होनेवाले उन भगवान्‌ने सींग (या दाढ़)-के द्वारा सम्पूर्ण जगत्‌के हितके लिये इस पृथिवीका उद्धार करके उसे जगत्‌का एक सुदृढ़ आश्रय बना दिया।

एवं यज्ञवराहेण भूतभव्यभवात्मना ।।
उद्धृता पृथिवी देवी सागराम्बुधरा पुरा ।
निहता दानवाः सर्वे देवदेवेन विष्णुना ।।
इस प्रकार भूत, भविष्य और वर्तमानस्वरूप भगवान् यज्ञवराहने समुद्रका जल हरण करनेवाली भूदेवीका पूर्वकालमें उद्धार किया था। उस समय उन देवाधिदेव विष्णुने समस्त दानवोंका संहार किया था।

वाराहः कथितो ह्येष नारसिंहमथो शृणु ।
यत्र भूत्वा मृगेन्द्रेण हिरण्यकशिपुर्हतः ।।
यह वराह अवतारका वृत्तान्त बतलाया गया। अब नृसिंहावतारका वर्णन सुनो, जिसमें नरसिंहरूप धारण करके भगवान्ने हिरण्यकशिपु नामक दैत्यका वध किया था।

दैत्येन्द्रो बलवान् राजन् सुरारिर्बलगर्वितः ।
हिरण्यकशिपुर्नाम आसीत् त्रैलोक्यकण्टकः ।।
राजन्! प्राचीन कालमें देवताओंका शत्रु हिरण्यकशिपु समस्त दैत्योंका राजा था। वह बलवान् तो था ही, उसे अपने बलका घमंड भी बहुत था। वह तीनों लोकोंके लिये कण्टकरूप हो रहा था।

दैत्यानामादिपुरुषो वीर्यवान् धृतिमान् बली ।
प्रविश्य स वनं राजंश्चकार तप उत्तमम् ।।
पराक्रमी हिरण्यकशिपु धीर और बलवान् था। दैत्यकुलका आदिपुरुष वही था। राजन्! उसने वनमें जाकर बड़ी भारी तपस्या की।

दशवर्षसहस्राणि शतानि दश पञ्च च ।
जपोपवासैस्तस्यासीत् स्थाणुर्मौनव्रतो दृढः ।।
साढ़े ग्यारह हजार वर्षोंतक पूर्वोक्त तपस्याके हेतुभूत जप और उपवासमें संलग्न रहनेसे वह ठूंठे काठके समान अविचल और दृढ़तापूर्वक मौनव्रतका पालन करनेवाला हो गया।

ततो दमशमाभ्यां च ब्रह्मचर्येण चानघ ।
ब्रह्मा प्रीतमनास्तस्य तपसा नियमेन च ।।
निष्पाप नरेश! उसके इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह, ब्रह्मचर्य, तपस्या तथा शौच-संतोषादि नियमोंके पालनसे ब्रह्माजीके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई।

ततः स्वयम्भूभगवान् स्वयमागम्य भूपते ।
विमानेनार्कवर्णेन हंसयुक्तेन भास्वता ।।
भूपाल! तदनन्तर स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा हंस जुते हुए सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्वारा स्वयं वहाँ पधारे।

आदित्यैर्वसुभिः साध्यैः मरुद्भिर्दैवतैः सह ।

रुद्रैर्विश्वसहायैश्च यक्षराक्षसकिन्नरैः ॥ दिशाभिर्विदिशाभिश्च नदीभिः सागरैस्तथा । नक्षत्रैश्च मुहूर्तैश्च खेचरैश्चापरैर्ग्रहैः ॥ देवर्षिभिस्तपोयुक्तैः सिद्धैः सप्तर्षिभिस्तथा । राजर्षिभिः पुण्यतमैर्गन्धर्वैरप्सरोगणैः ॥ उनके साथ आदित्य, वसु, साध्य, मरुद्गण, देवगण, रुद्रगण, विश्वेदेव, यक्ष, राक्षस, किन्नर, दिशा, विदिशा, नदी, समुद्र, नक्षत्र, मुहूर्त, अन्यान्य आकाशचारी ग्रह, तपस्वी देवर्षि, सिद्ध, सप्तर्षि, पुण्यात्मा राजर्षि, गन्धर्व तथा अप्सराएँ भी थीं।

चराचरगुरुः श्रीमान् वृतः सर्वसुरैस्तथा । ब्रह्मा ब्रह्मविदां श्रेष्ठो दैत्यमागम्य चाब्रवीत् ॥ सम्पूर्ण देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ चराचरगुरु श्रीमान् ब्रह्मा उस दैत्यके पास आकर बोले।

ब्रह्मोवाच

प्रीतोऽस्मि तव भक्तस्य तपसानेन सुव्रत । वरं वरय भद्रं ते यथेष्टं काममाप्नुहि ॥ ब्रह्माजीने कहा—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दैत्यराज! तुम मेरे भक्त हो। तुम्हारी इस तपस्यासे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा भला हो। तुम कोई वर माँगो और मनोवांछित वस्तु प्राप्त करो।

हिरण्यकशिपुरुवाच

न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः । न मानुषाः पिशाचाश्च हन्युर्मां देवसत्तम ॥ हिरण्यकशिपु बोला—सुरश्रेष्ठ! मुझे देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच—कोई भी न मार सके।

ऋषयो वा न मां शापैः क्रुद्धा लोकपितामह । शपेयुस्तपसा युक्ता वर एष वृतो मया ॥ लोकपितामह! तपस्वी ऋषि-महर्षि कुपित होकर मुझे शाप भी न दें यही वर मैंने माँगा है।

न शस्त्रेण न चास्त्रेण गिरिणा पादपेन च । न शुष्केण न चार्द्रेण स्यान्न वान्येन मे वधः ॥ न शस्त्रसे, न अस्त्रसे, न पर्वतसे, न वृक्षसे, न सूखेसे, न गीलेसे और न दूसरे ही किसी आयुधसे मेरा वध हो।

नाकाशे वा न भूमौ वा रात्रौ वा दिवसेऽपि वा ।

नान्तर्वा न बहिर्वापि स्याद् वधो मे पितामह ॥
पितामह! न आकाशमें, न पृथ्वीपर, न रातमें, न दिनमें तथा न बाहर और न भीतर ही मेरा वध हो सके।
पशुभिर्वा मृगैर्न स्यात् पक्षिभिर्वा सरीसृपैः ।
ददासि चेद् वरानैतान् देवदेव वृणोम्यहम् ॥
पशु या मृग, पक्षी अथवा सरीसृप (सर्प-बिच्छू) आदिसे भी मेरी मृत्यु न हो। देवदेव! यदि आप वर दे रहे हैं तो मैं इन्हीं वरोंको लेना चाहता हूँ।

ब्रह्मोवाच

एते देव्या वरास्तात मया दत्तास्तवाद्भुताः ।
सर्वकामान् वरांस्तात प्राप्स्यसे त्वं न संशयः ॥
ब्रह्माजीने कहा— तात! ये दिव्य और अद्भुत वर मैंने तुम्हें दे दिये। वत्स! इसमें संशय नहीं कि सम्पूर्ण कामनाओंसहित इन मनोवांछित वरोंको तुम अवश्य प्राप्त कर लोगे।

भीष्म उवाच

एवमुक्त्वा स भगवानाकाशेन जगाम ह ।
रराज ब्रह्मलोके स ब्रह्मर्षिगणसेवितः ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! ऐसा कहकर भगवान् ब्रह्मा आकाशमार्गसे चले गये और ब्रह्मलोकमें जाकर ब्रह्मर्षिगणोंसे सेवित होकर अत्यन्त शोभा पाने लगे।
ततो देवाश्च नागाश्च गन्धर्वा मुनयस्तथा ।
वरप्रदानं श्रुत्वा ते ब्रह्माणमुपतस्थिरे ॥
तदनन्तर देवता, नाग, गन्धर्व और मुनि उस वरदानका समाचार सुनकर ब्रह्माजीकी सभामें उपस्थित हुए।

देवा ऊचुः

वरेणानेन भगवन् बाधिष्यति स नोऽसुरः ।
तत् प्रसीदस्व भगवत् वधोऽस्य प्रविचिन्त्यताम् ॥
देवता बोले— भगवन्! इस वरके प्रभावसे वह असुर हमलोगोंको बहुत कष्ट देगा, अतः आप प्रसन्न होइये और उसके वधका कोई उपाय सोचिये।
भवान् हि सर्वभूतानां स्वयम्भूरादिकृद् विभुः ।
स्रष्टा च हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिर्ध्रुवः ॥
क्योंकि आप ही सम्पूर्ण भूतोंके आदिस्रष्टा, स्वयम्भू, सर्वव्यापी, हव्य-कव्यके निर्माता तथा अव्यक्त प्रकृति और ध्रुवस्वरूप हैं।

भीष्म उवाच