महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1882, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंएवं यज्ञवराहेण भूतभव्यभवात्मना ।।
उद्धृता पृथिवी देवी सागराम्बुधरा पुरा ।
निहता दानवाः सर्वे देवदेवेन विष्णुना ।।
इस प्रकार भूत, भविष्य और वर्तमानस्वरूप भगवान् यज्ञवराहने समुद्रका जल हरण करनेवाली भूदेवीका पूर्वकालमें उद्धार किया था। उस समय उन देवाधिदेव विष्णुने समस्त दानवोंका संहार किया था।
वाराहः कथितो ह्येष नारसिंहमथो शृणु ।
यत्र भूत्वा मृगेन्द्रेण हिरण्यकशिपुर्हतः ।।
यह वराह अवतारका वृत्तान्त बतलाया गया। अब नृसिंहावतारका वर्णन सुनो, जिसमें नरसिंहरूप धारण करके भगवान्ने हिरण्यकशिपु नामक दैत्यका वध किया था।
दैत्येन्द्रो बलवान् राजन् सुरारिर्बलगर्वितः ।
हिरण्यकशिपुर्नाम आसीत् त्रैलोक्यकण्टकः ।।
राजन्! प्राचीन कालमें देवताओंका शत्रु हिरण्यकशिपु समस्त दैत्योंका राजा था। वह बलवान् तो था ही, उसे अपने बलका घमंड भी बहुत था। वह तीनों लोकोंके लिये कण्टकरूप हो रहा था।
दैत्यानामादिपुरुषो वीर्यवान् धृतिमान् बली ।
प्रविश्य स वनं राजंश्चकार तप उत्तमम् ।।
पराक्रमी हिरण्यकशिपु धीर और बलवान् था। दैत्यकुलका आदिपुरुष वही था। राजन्! उसने वनमें जाकर बड़ी भारी तपस्या की।
दशवर्षसहस्राणि शतानि दश पञ्च च ।
जपोपवासैस्तस्यासीत् स्थाणुर्मौनव्रतो दृढः ।।
साढ़े ग्यारह हजार वर्षोंतक पूर्वोक्त तपस्याके हेतुभूत जप और उपवासमें संलग्न रहनेसे वह ठूंठे काठके समान अविचल और दृढ़तापूर्वक मौनव्रतका पालन करनेवाला हो गया।
ततो दमशमाभ्यां च ब्रह्मचर्येण चानघ ।
ब्रह्मा प्रीतमनास्तस्य तपसा नियमेन च ।।
निष्पाप नरेश! उसके इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह, ब्रह्मचर्य, तपस्या तथा शौच-संतोषादि नियमोंके पालनसे ब्रह्माजीके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई।
ततः स्वयम्भूभगवान् स्वयमागम्य भूपते ।
विमानेनार्कवर्णेन हंसयुक्तेन भास्वता ।।
भूपाल! तदनन्तर स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा हंस जुते हुए सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्वारा स्वयं वहाँ पधारे।
आदित्यैर्वसुभिः साध्यैः मरुद्भिर्दैवतैः सह ।