महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1883, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंरुद्रैर्विश्वसहायैश्च यक्षराक्षसकिन्नरैः ॥ दिशाभिर्विदिशाभिश्च नदीभिः सागरैस्तथा । नक्षत्रैश्च मुहूर्तैश्च खेचरैश्चापरैर्ग्रहैः ॥ देवर्षिभिस्तपोयुक्तैः सिद्धैः सप्तर्षिभिस्तथा । राजर्षिभिः पुण्यतमैर्गन्धर्वैरप्सरोगणैः ॥ उनके साथ आदित्य, वसु, साध्य, मरुद्गण, देवगण, रुद्रगण, विश्वेदेव, यक्ष, राक्षस, किन्नर, दिशा, विदिशा, नदी, समुद्र, नक्षत्र, मुहूर्त, अन्यान्य आकाशचारी ग्रह, तपस्वी देवर्षि, सिद्ध, सप्तर्षि, पुण्यात्मा राजर्षि, गन्धर्व तथा अप्सराएँ भी थीं।
चराचरगुरुः श्रीमान् वृतः सर्वसुरैस्तथा । ब्रह्मा ब्रह्मविदां श्रेष्ठो दैत्यमागम्य चाब्रवीत् ॥ सम्पूर्ण देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ चराचरगुरु श्रीमान् ब्रह्मा उस दैत्यके पास आकर बोले।
ब्रह्मोवाच
प्रीतोऽस्मि तव भक्तस्य तपसानेन सुव्रत । वरं वरय भद्रं ते यथेष्टं काममाप्नुहि ॥ ब्रह्माजीने कहा—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दैत्यराज! तुम मेरे भक्त हो। तुम्हारी इस तपस्यासे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा भला हो। तुम कोई वर माँगो और मनोवांछित वस्तु प्राप्त करो।
हिरण्यकशिपुरुवाच
न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः । न मानुषाः पिशाचाश्च हन्युर्मां देवसत्तम ॥ हिरण्यकशिपु बोला—सुरश्रेष्ठ! मुझे देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच—कोई भी न मार सके।
ऋषयो वा न मां शापैः क्रुद्धा लोकपितामह । शपेयुस्तपसा युक्ता वर एष वृतो मया ॥ लोकपितामह! तपस्वी ऋषि-महर्षि कुपित होकर मुझे शाप भी न दें यही वर मैंने माँगा है।
न शस्त्रेण न चास्त्रेण गिरिणा पादपेन च । न शुष्केण न चार्द्रेण स्यान्न वान्येन मे वधः ॥ न शस्त्रसे, न अस्त्रसे, न पर्वतसे, न वृक्षसे, न सूखेसे, न गीलेसे और न दूसरे ही किसी आयुधसे मेरा वध हो।
नाकाशे वा न भूमौ वा रात्रौ वा दिवसेऽपि वा ।