भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1884

नान्तर्वा न बहिर्वापि स्याद् वधो मे पितामह ॥
पितामह! न आकाशमें, न पृथ्वीपर, न रातमें, न दिनमें तथा न बाहर और न भीतर ही मेरा वध हो सके।
पशुभिर्वा मृगैर्न स्यात् पक्षिभिर्वा सरीसृपैः ।
ददासि चेद् वरानैतान् देवदेव वृणोम्यहम् ॥
पशु या मृग, पक्षी अथवा सरीसृप (सर्प-बिच्छू) आदिसे भी मेरी मृत्यु न हो। देवदेव! यदि आप वर दे रहे हैं तो मैं इन्हीं वरोंको लेना चाहता हूँ।

ब्रह्मोवाच

एते देव्या वरास्तात मया दत्तास्तवाद्भुताः ।
सर्वकामान् वरांस्तात प्राप्स्यसे त्वं न संशयः ॥
ब्रह्माजीने कहा— तात! ये दिव्य और अद्भुत वर मैंने तुम्हें दे दिये। वत्स! इसमें संशय नहीं कि सम्पूर्ण कामनाओंसहित इन मनोवांछित वरोंको तुम अवश्य प्राप्त कर लोगे।

भीष्म उवाच

एवमुक्त्वा स भगवानाकाशेन जगाम ह ।
रराज ब्रह्मलोके स ब्रह्मर्षिगणसेवितः ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! ऐसा कहकर भगवान् ब्रह्मा आकाशमार्गसे चले गये और ब्रह्मलोकमें जाकर ब्रह्मर्षिगणोंसे सेवित होकर अत्यन्त शोभा पाने लगे।
ततो देवाश्च नागाश्च गन्धर्वा मुनयस्तथा ।
वरप्रदानं श्रुत्वा ते ब्रह्माणमुपतस्थिरे ॥
तदनन्तर देवता, नाग, गन्धर्व और मुनि उस वरदानका समाचार सुनकर ब्रह्माजीकी सभामें उपस्थित हुए।

देवा ऊचुः

वरेणानेन भगवन् बाधिष्यति स नोऽसुरः ।
तत् प्रसीदस्व भगवत् वधोऽस्य प्रविचिन्त्यताम् ॥
देवता बोले— भगवन्! इस वरके प्रभावसे वह असुर हमलोगोंको बहुत कष्ट देगा, अतः आप प्रसन्न होइये और उसके वधका कोई उपाय सोचिये।
भवान् हि सर्वभूतानां स्वयम्भूरादिकृद् विभुः ।
स्रष्टा च हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिर्ध्रुवः ॥
क्योंकि आप ही सम्पूर्ण भूतोंके आदिस्रष्टा, स्वयम्भू, सर्वव्यापी, हव्य-कव्यके निर्माता तथा अव्यक्त प्रकृति और ध्रुवस्वरूप हैं।

भीष्म उवाच