भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1885

ततो लोकहितं वाक्यं श्रुत्वा देवः प्रजापतिः । प्रोवाच भगवान् वाक्यं सर्वदेवगणांस्तदा ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर देवताओंका यह लोकहितकारी वचन सुनकर दिव्यशक्तिसम्पन्न भगवान् प्रजापतिने उन सब देवगणोंसे इस प्रकार कहा।

ब्रह्मोवाच अवश्यं त्रिदशास्तेन प्राप्तव्यं तपसः फलम् । तपसोऽन्तेऽस्य भगवान् वधं कृष्णः करिष्यति ॥ **ब्रह्माजीने कहा—**देवताओ! उस असुरको अपनी तपस्याका फल अवश्य प्राप्त होगा। फलभोगके द्वारा जब तपस्याकी समाप्ति हो जायगी, तब भगवान् विष्णु स्वयं ही उसका वध करेंगे।

भीष्म उवाच एकच्छ्रुत्वा सुराः सर्वे ब्रह्मणा तस्य वै वधम् । स्वानि स्थानानि दिव्यानि जग्मुस्ते वै मुदान्विताः ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर ब्रह्माजीके द्वारा इस प्रकार उसके वधकी बात सुनकर सब देवता प्रसन्नतापूर्वक अपने दिव्य धामको चले गये। लब्धमात्रे वरे चापि सर्वास्ता बाधते प्रजाः । हिरण्यकशिपुर्दैत्यो वरदानेन दर्पितः ॥ दैत्य हिरण्यकशिपु ब्रह्माजीका वर पाते ही समस्त प्रजाको कष्ट पहुँचाने लगा। वरदानसे उसका घमण्ड बहुत बढ़ गया था। राज्यं चकार दैत्येन्द्रो दैत्यसङ्घैः समावृतः । सप्त दीपान्वशे चक्रे लोकान् लोकान्तरान् बलात् ॥ वह दैत्योंका राजा होकर राज्य भोगने लगा। झुंड-के-झुंड दैत्य उसे घेरे रहते थे। उसने सातों द्वीपों और अनेक लोक-लोकान्तरोंको बलपूर्वक अपने वशमें कर लिया। दिव्यलोकान् समस्तान् वै भोगान् दिव्यांनवाप सः । देवांस्त्रिभुवनस्थांस्तान् पराजित्य महासुरः ॥ उस महान् असुरने तीनों लोकोंमें रहनेवाले समस्त देवताओंको जीतकर सम्पूर्ण दिव्य लोकों और वहाँके दिव्य भोगोंपर अधिकार प्राप्त कर लिया। त्रैलोक्यं वशमानीय स्वर्गे वसति दानवः । यदा वरमदोन्मत्तो न्यवसद् दानवो दिवि ॥ इस प्रकार तीनों लोकोंको अपने अधीन करके वह दैत्य स्वर्गलोकमें निवास करने लगा। वरदानके मदसे उन्मत्त हो दानव हिरण्यकशिपु देवलोकका निवासी बन बैठा। अथ लोकान् समस्तांश्च विजित्य स महासुरः ।