भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1886

भवेयमहमेवेन्द्रः सोमोऽग्निर्मारुतो रविः ॥ सलिलं चान्तरिक्षं च नक्षत्राणि दिशो दश । अहं क्रोधश्च कामश्च वरुणो वसवोऽर्यमा ॥ धनदश्च धनाध्यक्षो यक्षः किम्पुरुषाधिपः । एते भवेयमित्युक्त्वा स्वयं भूत्वा बलात् स च ॥ तदनन्तर वह महान् असुर अन्य समस्त लोकोंको जीतकर यह सोचने लगा कि मैं ही इन्द्र हो जाऊँ, चन्द्रमा, अग्नि, वायु, सूर्य, जल, आकाश, नक्षत्र, दसों दिशाएँ, क्रोध, काम, वरुण, वसुगण, अर्यमा, धन देनेवाले धनाध्यक्ष, यक्ष और किम्पुरुषोंका स्वामी—ये सब मैं ही हो जाऊँ। ऐसा सोचकर उसने स्वयं ही बलपूर्वक उन-उन पदोंपर अधिकार जमा लिया।

तेषां गृहीत्वा स्थानानि तेषां कार्याण्यवाप सः । इज्यश्चासीन्मखवरैः स तैर्देवर्षिसत्तमैः ॥ नरकस्थान् समानीय स्वर्गस्थांस्तांश्चकार सः । एवमादीनि कर्माणि कृत्वा दैत्यपतिर्बली ॥ आश्रमेषु महाभागान् मुनीन् वै संशितव्रतान् । सत्यधर्मपरान् दान्तान् पुरा धर्षितवांश्च सः ॥ उनके स्थान ग्रहण करके उन सबके कार्य वह स्वयं देखने लगा। उत्तम देवर्षिगण श्रेष्ठ यज्ञोंद्वारा जिन देवताओंका यजन करते थे, उन सबके स्थानपर वह स्वयं ही यज्ञभागका अधिकारी बन बैठा। नरकमें पड़े हुए सब जीवोंको वहाँसे निकालकर उसने स्वर्गका निवासी बना दिया। बलवान् दैत्यराजने ये सब कार्य करके मुनियोंके आश्रमोंपर धावा किया और कठोर व्रतका पालन करनेवाले सत्यधर्मपरायण एवं जितेन्द्रिय महाभाग मुनियोंको सताना आरम्भ किया।

यज्ञीयान् कृतवान् दैत्यानयज्ञीयांश्च देवताः । यत्र यत्र सुरा जग्मुस्तत्र तत्र व्रजत्युत ॥ स्थानानि देवतानां तु हृत्वा राज्यमपालयत् । उसने दैत्योंको यज्ञका अधिकारी बनाया और देवताओंको उस अधिकारसे वंचित कर दिया। जहाँ-जहाँ देवता जाते थे, वहाँ-वहाँ वह उनका पीछा करता था। देवताओंके सारे स्थान हड़पकर वह स्वयं ही त्रिलोकीके राज्यका पालन करने लगा।

पञ्च कोट्यश्च वर्षाणि नियुतान्येकषष्टि च ॥ षष्टिश्चैव सहस्राणां जग्मुस्तस्य दुरात्मनः । एतद् वर्षं स दैत्येन्द्रो भोगैश्वर्यमवाप सः ॥ उस दुरात्माके राज्य करते पाँच करोड़ इकठ लाख साठ हजार वर्ष व्यतीत हो गये। इतने वर्षोंतक दैत्यराज हिरण्यकशिपुने दिव्य भोगों और ऐश्वर्यका उपभोग किया।