महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1887, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेनातिबाध्यमानास्ते दैत्येन्द्रेण बलीयसा । ब्रह्मलोकं सुरा जग्मुः सर्वे शक्रपुरोगमाः ॥ पितामहं समासाद्य खिन्नाः प्राञ्जलयोऽब्रुवन् । महाबली दैत्यराज हिरण्यकशिपुके द्वारा अत्यन्त पीड़ित हो इन्द्र आदि सब देवता ब्रह्मलोकमें गये और ब्रह्माजीके पास पहुँचकर खेदग्रस्त हो हाथ जोड़कर बोले।
देवा ऊचुः
भगवन् भूतभव्येश नस्त्रायस्व इहागतान् । भयं दितिसुताद् घोरं भवत्यद्य दिवानिशम् ॥ देवताओोंने कहा— भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी भगवान् पितामह! हम यहाँ आपकी शरणमें आये हैं! आप हमारी रक्षा कीजिये। अब हमें उस दैत्यसे दिन-रात घोर भयकी प्राप्ति हो रही है।
भगवन् सर्वभूतानां स्वयम्भूरादिकृद् विभुः । स्रष्टा त्वं हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिर्ध्रुवः ॥ भगवन्! आप सम्पूर्ण भूतोंके आदिस्रष्टा, स्वयम्भू, सर्वव्यापी, हव्य-कव्योंके निर्माता, अव्यक्त प्रकृति एवं नित्यस्वरूप हैं।
ब्रह्मोवाच
श्रूयतामापदेवं हि दुर्विज्ञेया मयापि च । नारायणस्तु पुरुषो विश्वरूपो महाद्युतिः ॥ अव्यक्तः सर्वभूतानामचिन्त्यो विभुरव्ययः । ब्रह्माजी बोले—देवताओ! सुनो, ऐसी विपत्तिको समझना मेरे लिये भी अत्यन्त कठिन है। अन्तर्यामी भगवान् नारायण ही हमारी सहायता कर सकते हैं। वे विश्वरूप, महातेजस्वी, अव्यक्तस्वरूप, सर्वव्यापी, अविनाशी तथा सम्पूर्ण भूतोंके लिये अचिन्त्य हैं।
ममापि स तु युष्माकं व्यसने परमा गतिः ॥ नारायणः परोऽव्यक्तादहमव्यक्तसम्भवः । संकटकालमें मेरे और तुम्हारे वे ही परम गति हैं। भगवान् नारायण अव्यक्तसे परे हैं और मेरा आविर्भाव अव्यक्तसे हुआ है।
मत्तो जज्ञुः प्रजा लोकाः सर्वे देवासुराश्च ते ॥ देवा यथाहं युष्माकं तथा नारायणो मम । पितामहोऽहं सर्वस्य स विष्णुः प्रपितामहः ॥ तमिमं विबुधा दैत्यं स विष्णुः संहरिष्यति । तस्य नास्ति ह्यशक्यं च तस्माद् व्रजत मा चिरम् ॥