महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तेनातिबाध्यमानास्ते दैत्येन्द्रेण बलीयसा । ब्रह्मलोकं सुरा जग्मुः सर्वे शक्रपुरोगमाः ॥ पितामहं समासाद्य खिन्नाः प्राञ्जलयोऽब्रुवन् । महाबली दैत्यराज हिरण्यकशिपुके द्वारा अत्यन्त पीड़ित हो इन्द्र आदि सब देवता ब्रह्मलोकमें गये और ब्रह्माजीके पास पहुँचकर खेदग्रस्त हो हाथ जोड़कर बोले।
देवा ऊचुः
भगवन् भूतभव्येश नस्त्रायस्व इहागतान् । भयं दितिसुताद् घोरं भवत्यद्य दिवानिशम् ॥ देवताओोंने कहा— भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी भगवान् पितामह! हम यहाँ आपकी शरणमें आये हैं! आप हमारी रक्षा कीजिये। अब हमें उस दैत्यसे दिन-रात घोर भयकी प्राप्ति हो रही है।
भगवन् सर्वभूतानां स्वयम्भूरादिकृद् विभुः । स्रष्टा त्वं हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिर्ध्रुवः ॥ भगवन्! आप सम्पूर्ण भूतोंके आदिस्रष्टा, स्वयम्भू, सर्वव्यापी, हव्य-कव्योंके निर्माता, अव्यक्त प्रकृति एवं नित्यस्वरूप हैं।
ब्रह्मोवाच
श्रूयतामापदेवं हि दुर्विज्ञेया मयापि च । नारायणस्तु पुरुषो विश्वरूपो महाद्युतिः ॥ अव्यक्तः सर्वभूतानामचिन्त्यो विभुरव्ययः । ब्रह्माजी बोले—देवताओ! सुनो, ऐसी विपत्तिको समझना मेरे लिये भी अत्यन्त कठिन है। अन्तर्यामी भगवान् नारायण ही हमारी सहायता कर सकते हैं। वे विश्वरूप, महातेजस्वी, अव्यक्तस्वरूप, सर्वव्यापी, अविनाशी तथा सम्पूर्ण भूतोंके लिये अचिन्त्य हैं।
ममापि स तु युष्माकं व्यसने परमा गतिः ॥ नारायणः परोऽव्यक्तादहमव्यक्तसम्भवः । संकटकालमें मेरे और तुम्हारे वे ही परम गति हैं। भगवान् नारायण अव्यक्तसे परे हैं और मेरा आविर्भाव अव्यक्तसे हुआ है।
मत्तो जज्ञुः प्रजा लोकाः सर्वे देवासुराश्च ते ॥ देवा यथाहं युष्माकं तथा नारायणो मम । पितामहोऽहं सर्वस्य स विष्णुः प्रपितामहः ॥ तमिमं विबुधा दैत्यं स विष्णुः संहरिष्यति । तस्य नास्ति ह्यशक्यं च तस्माद् व्रजत मा चिरम् ॥
देवता बोले—देवेश्वर! आज आप हिरण्यकशिपुका वध करके हमारी रक्षा कीजिये। सुरश्रेष्ठ! आप ही हमारे और ब्रह्मा आदिके भी धारण-पोषण करनेवाले परमेश्वर हैं।
उत्फुल्लपद्मपत्राक्ष शत्रुपक्षभयङ्कर ।
क्षयाय दितिवंशस्य शरण्यस्त्वं भवाद्य नः ॥
खिले हुए कमलदलके समान नेत्रोंवाले नारायण! आप शत्रुपक्षको भय प्रदान करनेवाले हैं। प्रभो! आज आप दैत्योंका विनाश करनेके लिये उद्यत हो हमारे शरणदाता होइये।
भीष्म उवाच
देवानां वचनं श्रुत्वा तदा विष्णुः शुचिश्रवाः ।
अदृश्यः सर्वभूतानां वक्तुमेवोपचक्रमे ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! देवताओंकी यह बात सुनकर पवित्र कीर्तिवाले भगवान् विष्णुने उस समय सम्पूर्ण भूतोंसे अदृश्य रहकर बोलना आरम्भ किया।
श्रीभगवानुवाच
भयं त्यजध्वममरा अभयं वो ददाम्यहम् ।
तदेवं त्रिदिवं देवाः प्रतिपद्यत मा चिरम् ॥
श्रीभगवान् बोले—देवताओ! भय छोड़ दो। मैं तुम्हें अभय देता हूँ। देवगण! तुमलोग अविलम्ब स्वर्गलोकमें जाओ और पहलेकी ही भाँति वहाँ निर्भय होकर रहो।
एषोऽहं सगणं दैत्यं वरदानेन दर्पितम् ।
अवध्यममरेन्द्राणां दानवेन्द्रं निहन्म्यहम् ॥
मैं वरदान पाकर घमंडमें भरे हुए दानवराज हिरण्यकशिपुको, जो देवेश्वरोंके लिये भी अवध्य हो रहा है, सेवकोंसहित अभी मार डालता हूँ।
ब्रह्मोवाच
भगवन् भूतभव्येश खिन्ना ह्येते भृशं सुराः ।
तस्मात् त्वं जहि दैत्येन्द्रं क्षिप्रं कालोऽस्य मा चिरम् ॥
ब्रह्माजीने कहा—भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी नारायण! ये देवता बहुत दुःखी हो गये हैं, अतः आप दैत्यराज हिरण्यकशिपुको शीघ्र मार डालिये। उसकी मृत्युका समय आ गया है, इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये।
श्रीभगवानुवाच
क्षिप्रं देवाः करिष्यामि त्वरया दैत्यनाशनम् ।
तस्मात् त्वं विबुधाश्चैव प्रतिपद्यत वै दिवम् ॥
श्रीभगवान् बोले— ब्रह्मा तथा देवताओ! मैं शीघ्र ही उस दैत्यका नाश करूँगा, अतः तुम सब लोग अपने-अपने दिव्यलोकमें जाओ।
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा स भगवान् विसृज्य त्रिदिवेश्वरान् ।
नरस्यार्धतनुं कृत्वा सिंहस्यार्धतनुं तथा ॥
नारसिंहेन वपुषा पाणिं निष्पिष्य पाणिना ।
भीमरूपो महातेजा व्यादितास्य इवान्तकः ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! ऐसा कहकर भगवान् विष्णुने देवेश्वरोंको विदा करके आधा शरीर मनुष्यका और आधा सिंहका-सा बनाकर नरसिंहविग्रह धारण करके एक हाथसे दूसरे हाथको रगड़ते हुए बड़ा भयंकर रूप बना लिया। वे महातेजस्वी नरसिंह मुँह बाये हुए कालके समान जान पड़ते थे।
हिरण्यकशिपुं राजन् जगाम हरीरीश्वरः ।
दैत्यास्तमागतं दृष्ट्वा नारसिंहं महाबलम् ॥
ववर्षुः शस्त्रवर्षैस्ते सुसंक्रुद्धास्तदा हरिम् ।
राजन्! तदनन्तर भगवान् विष्णु हिरण्यकशिपुके पास गये। नृसिंहरूपधारी महाबली भगवान् श्रीहरिको आया देख दैत्योंने कुपित होकर उनपर अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा आरम्भ की।
तैर्विसृष्टानि शस्त्राणि भक्षयामास वै हरिः ॥
जघान च रणे दैत्यान् सहस्राणि बहून्यपि ।
उनके द्वारा चलाये हुए सभी शस्त्रोंको भगवान् खा गये, साथ ही उन्होंने उस युद्धमें कई हजार दैत्योंका संहार कर डाला।
तान् निहत्य च दैत्येन्द्रान् सर्वान् क्रुद्धान् महाबलान् ॥
अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धो दैत्येन्द्रं बलगर्वितम् ।
क्रोधमें भरे हुए उन सभी महाबलवान् दैत्येश्वरोंका विनाश करके अत्यन्त कुपित हो भगवान्ने बलोन्मत्त दैत्यराज हिरण्यकशिपुपर धावा किया।
जीमूतघनसंकाशो जीमूतघननःस्वनः ॥
जीमूत इव दीप्तौजा जीमूत इव वेगवान् ।
भगवान् नृसिंहकी अंगकान्ति मेघोंकी घटाके समान श्याम थी। वे मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान दहाड़ रहे थे। उनका उद्दीप्त तेज भी मेघोंके ही समान शोभा पाता था और वे मेघोंके ही समान महान् वेगशाली थे।
देवारिर्दितिजो दुष्टो नृसिंहं समुपाद्रवत् ॥
भगवान् नृसिंहको आया देख देवताओंसे द्वेष रखनेवाला दुष्ट दैत्य हिरण्यकशिपु उनकी ओर दौड़ा।
दैत्यं सोऽतिबलं दृष्ट्वा क्रुद्धशार्दूलविक्रमम् । दीप्तैर्दैत्यगणैर्गुप्तं खरैर्नखमुखैरुत ॥ ततः कृत्वा तु युद्धं वै तेन दैत्येन वै हरिः । कुपित सिंहके समान पराक्रमी उस अत्यन्त बलशाली, दर्पयुक्त एवं दैत्यगणोंसे सुरक्षित दैत्यको सामने आया देख महातेजस्वी भगवान् नृसिंहने नखोंके तीखे अग्रभागोंके द्वारा उस दैत्यके साथ घोर युद्ध किया। संध्याकाले महातेजाः प्रघाणे च त्वरान्वितः ॥ ऊरौ निधाय दैत्येन्द्रं निर्बिभेद नखैर्हि तम् । फिर संध्याकाल आनेपर बड़ी उतावलीके साथ उसे पकड़कर वे राजभवनकी देहलीपर बैठ गये। तदनन्तर उन्होंने अपनी जाँघोंपर दैत्यराजको रखकर नखोंसे उसका वक्षःस्थल विदीर्ण कर डाला। महाबलं महावीर्यं वरदानेन दर्पितम् ॥ दैत्यश्रेष्ठं सुरश्रेष्ठो जघान तरसा हरिः । सुरश्रेष्ठ श्रीहरिने वरदानसे घमंडमें भरे हुए महाबली महापराक्रमी दैत्यराजको बड़े वेगसे मार डाला। हिरण्यकशिपुं हत्वा सर्वदैत्यांश्च वै तदा ॥ विबुधानां प्रजानां च हितं कृत्वा महाद्युतिः । प्रमुमोद हरिर्देवः स्थाप्य धर्मं तदा भुवि ॥ इस प्रकार हिरण्यकशिपु तथा उसके अनुयायी सब दैत्योंका संहार करके महातेजस्वी भगवान् श्रीहरिने देवताओं तथा प्रजाजनोंका हितसाधन किया और इस पृथ्वीपर धर्मकी स्थापना करके वे बड़े प्रसन्न हुए। एष ते नारसिंहोऽत्र कथितः पाण्डुनन्दन । शृणु त्वं वामनं नाम प्रादुर्भावं महात्मनः ॥ पाण्डुनन्दन! यह मैंने तुम्हें संक्षेपसे नृसिंहावतारकी कथा सुनायी है। अब तुम परमात्मा श्रीहरिके वामन-अवतारका वृत्तान्त सुनो। पुरा त्रेतायुगे राजन् बलिवैरोचनोऽभवत् । दैत्यानां पार्थिवो वीरो बलेनाप्रतिमो बली ॥ राजन्! प्राचीन त्रेतायुगकी बात है; विरोचनकुमार बलि दैत्योंके राजा थे। बलमें उनके समान दूसरा कोई नहीं था। बलि अत्यन्त बलवान् होनेके साथ ही महान् वीर भी थे। तदा बलिर्महाराज दैत्यसङ्घैः समावृतः । विजित्य तरसा शक्रमिन्द्रस्थानमवाप सः ॥ महाराज! दैत्यसमूहसे घिरे हुए बलिने बड़े वेगसे इन्द्रपर आक्रमण किया और उन्हें जीतकर इन्द्रलोकपर अधिकार प्राप्त कर लिया।
तेन वित्रासिता देवा बलिनाऽऽखण्डलादयः ।
ब्रह्माणं तु पुरस्कृत्य गत्वा क्षीरोदधिं तदा ॥
तुष्टुवुः सहिताः सर्वे देवं नारायणं प्रभुम् ।
राजा बलिके आक्रमणसे अत्यन्त त्रस्त हुए इन्द्र आदि देवता ब्रह्माजीको आगे करके क्षीरसागरके तटपर गये और सबने मिलकर देवाधिदेव भगवान् नारायणका स्तवन किया।
स तेषां दर्शनं चक्रे विबुधानां हरिः स्तुतः ॥
प्रसादजं ह्यस्य विभोरदित्यां जन्म चोच्यते ।
देवताओंके स्तुति करनेपर श्रीहरिने उन्हें दर्शन दिया और कहा जाता है, उनपर कृपाप्रसाद करनेके फलस्वरूप भगवान्का अदितिके गर्भसे प्रादुर्भाव हुआ।
अदितेरपि पुत्रत्वमेत्य यादवनन्दनः ॥
एष विष्णुरिति ख्यात इन्द्रस्यावरजोऽभवत् ।
जो इस समय यदुकुलको आनन्दित कर रहे हैं, ये ही भगवान् श्रीकृष्ण पहले अदितिके पुत्र होकर इन्द्रके छोटे भाई विष्णु (या उपेन्द्र)-के नामसे विख्यात हुए।
तस्मिन्नेव च काले तु दैत्येन्द्रो वीर्यवान् बलिः ॥
अश्वमेधं क्रतुश्रेष्ठमाहर्तुमुपचक्रमे ।
उन्हीं दिनों महापराक्रमी दैत्यराज बलिने क्रतुश्रेष्ठ अश्वमेधके अनुष्ठानकी तैयारी आरम्भ की।
वर्तमाने तदा यज्ञे दैत्येन्द्रस्य युधिष्ठिर ॥
स विष्णुर्वामनो भूत्वा प्रच्छन्नो ब्रह्मवेषधृक् ।
मुण्डो यज्ञोपवीती च कृष्णाजिनधरः शिखी ॥
पलाशदण्डं संगृह्य वामनोऽद्भुतदर्शनः ।
प्रविश्य स बलेर्यज्ञे वर्तमाने तु दक्षिणाम् ॥
देहीत्युवाच दैत्येन्द्रं विक्रमांस्त्रीन् ममैव ह ।
युधिष्ठिर! जब दैत्यराजका यज्ञ आरम्भ हो गया, उस समय भगवान् विष्णु ब्राह्मणवेषधारी वामन ब्रह्मचारीके रूपमें अपनेको छिपाकर सिर मुँड़ाये, यज्ञोपवीत, काला मृगचर्म और शिखा धारण किये, हाथमें पलाशका डंडा लिये उस यज्ञमें गये। उस समय भगवान् वामनकी अद्भुत शोभा दिखायी देती थी। बलिके वर्तमान यज्ञमें प्रवेश करके उन्होंने दैत्यराजसे कहा—'मुझे तीन पग भूमि दक्षिणारूपमें दीजिये।'
दीयतां त्रिपदीमात्रमित्ययाचन्महासुरम् ॥
स तथेति प्रतिश्रुत्य प्रददौ विष्णवे तदा ।
'केवल तीन पग भूमि मुझे दे दीजिये।' ऐसा कहकर उन्होंने महान् असुर बलिसे याचना की। बलिने भी 'तथास्तु' कहकर श्रीविष्णुको भूमि दे दी।
तेन लब्ध्वा हरिर्भूमिं जृम्भयामास वै भृशम् ।
स शिशुः सदिवं खं च पृथिवीं च विशाम्पते ।। त्रिभिर्विक्रमणैरेतत् सर्वमाक्रमताभिभूः । बलेर्बलवतो यज्ञे बलिना विष्णुना पुरा ।। विक्रमैस्त्रिभिरक्षोभ्याः क्षोभितास्ते महासुराः । बलिसे वह भूमि पाकर भगवान् विष्णु बड़े वेगसे बढ़ने लगे। राजन्! वे पहले तो बालक-जैसे लगते थे; किंतु उन्होंने बढ़कर तीन ही पगोंमें स्वर्ग, आकाश और पृथ्वी—सबको माप लिया। इस प्रकार बलवान् राजा बलिके यज्ञमें जब महाबली भगवान् विष्णुने केवल तीन पगोंद्वारा त्रिलोकीको नाप लिया, तब किसीसे भी क्षुब्ध न किये जा सकनेवाले महान् असुर क्षुब्ध हो उठे। विप्रचित्तिमुखाः क्रुद्धा दैत्यसङ्घा महाबलाः ।। नानावक्त्रा महाकाया नानावेषधरा नृप । राजन्! उनमें विप्रचित्ति आदि दानव प्रधान थे। क्रोधमें भरे हुए उन महाबली दैत्योंके समुदाय अनेक प्रकारके वेष धारण किये वहाँ उपस्थित थे। उनके मुख अनेक प्रकारके दिखायी देते थे। वे सब-के-सब विशालकाय थे। नानाप्रहरणा रौद्रा नानामाल्यानुलेपनाः ।। स्वान्यायुधानि संगृह्य प्रदीप्ता इव तेजसा । क्रममाणं हरिं तत्र उपावर्तन्त भारत ।। उनके हाथोंमें भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र थे। उन्होंने विविध प्रकारकी मालाएँ तथा चन्दन धारण कर रखे थे। वे देखनेमें बड़े भयंकर थे और तेजसे मानो प्रज्वलित हो रहे थे। भरतनन्दन! जब भगवान् विष्णुने तीनों लोकोंको मापना आरम्भ किया, उस समय सभी दैत्य अपने-अपने आयुध लेकर उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये। प्रमथ्य सर्वान् दैतेयान् पादहस्ततलैस्तु तान् । रूपं कृत्वा महाभीमं जहाराशु स मेदिनीम् ।। सम्प्राप्य पादमाकाशमादित्यसदने स्थितः । अत्यरोचत भूतात्मा भास्करं स्वेन तेजसा ।। भगवान्ने महाभयंकर रूप धारण करके उन सब दैत्योंको लातों-थप्पड़ोंसे मारकर भूमण्डलका सारा राज्य उनसे शीघ्र छीन लिया। उनका एक पैर आकाशमें पहुँचकर आदित्य-मण्डलमें स्थित हो गया। भूतात्मा भगवान् श्रीहरि उस समय अपने तेजसे सूर्यकी अपेक्षा बहुत बढ़-चढ़कर प्रकाशित हो रहे थे। प्रकाशयन् दिशः सर्वाः प्रदिशश्च महाबलः । शुशुभे स महाबाहुः सर्वलोकान् प्रकाशयन् ।। तस्य विक्रमतो भूमिं चन्द्रादित्यौ स्तनान्तरे । नभः प्रक्रममाणस्य नाभ्यां किल तदा स्थितौ ।।
महाबली महाबाहु भगवान् विष्णु सम्पूर्ण दिशाओं-विदिशाओं तथा समस्त लोकोंको प्रकाशित करते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे। जिस समय वे वसुधाको अपने पैरोंसे माप रहे थे, उस समय वे इतने बढ़े कि चन्द्रमा और सूर्य उनकी छातीके सामने आ गये थे। जब वे आकाशको लाँघने लगे, तब वे ही चन्द्रमा और सूर्य उनके नाभिदेशमें आ गये।
परमाक्रममाणस्य जानुभ्यां तौ व्यवस्थितौ ।।
विष्णोरमितवीर्यस्य वदन्त्येवं द्विजातयः ।
अथासाद्य कपालं स अण्डस्य तु युधिष्ठिर ।।
तच्छिद्रात् स्यन्दिनी तस्य पादाद् भ्रष्टा तु निम्नगा ।
ससार सागरं साऽऽशु पावनी सागरङ्गमा ।।
जब वे आकाश या स्वर्गलोकसे भी ऊपरको पैर बढ़ाने लगे, उस समय उनका रूप इतना विशाल हो गया कि सूर्य और चन्द्रमा उनके घुटनोंमें स्थित दिखायी देने लगे। इस प्रकार ब्राह्मणलोग अमितपराक्रमी भगवान् विष्णुके उस विशाल रूपका वर्णन करते हैं। युधिष्ठिर! भगवान्का पैर ब्रह्माण्डकपालतक पहुँच गया और उसके आघातसे कपालमें छिद्र हो गया, जिससे झर-झर करके एक नदी प्रकट हो गयी, जो शीघ्र ही नीचे उतरकर समुद्रमें जा मिली। सागरमें मिलनेवाली वह पावन सरिता ही गंगा है।
जहार मेदिनीं सर्वां हत्वा दानवपुङ्गवान् ।
आसुरीं श्रियमाहृत्य त्रींल्लोकान् स जनार्दनः ।।
सपुत्रदारानसुरान् पाताले तानपातयत् ।
नमुचिः शम्बरश्चैव प्रह्लादश्च महामनाः ।।
पादपाताभिनिर्धूताः पाताले विनिपातिताः ।
महाभूतानि भूतात्मा स विशेषेण वै हरिः ।।
कालं च सकलं राजन् गात्रभूतान्यदर्शयत् ।
भगवान् श्रीहरिने बड़े-बड़े दानवोंको मारकर सारी पृथ्वी उनके अधिकारसे छीन ली और तीनों लोकोंके साथ सारी आसुरी-सम्पदाका अपहरण करके उन असुरोंको स्त्री-पुत्रोंसहित पातालमें भेज दिया। नमुचि, शम्बर और महामना प्रह्लाद भगवान्के चरणोंके स्पर्शसे पवित्र हो गये। भगवान्ने उनको भी पातालमें भेज दिया। राजन्! भूतात्मा भगवान् श्रीहरिने अपने श्रीअंगोंमें विशेषरूपसे पंचमहाभूतों तथा भूत, भविष्य और वर्तमान—सभी कालोंका दर्शन कराया।
तस्य गात्रे जगत् सर्वमानीतमिव दृश्यते ।।
न किंचिदस्ति लोकेषु यदव्याप्तं महात्मना ।
तद्धि रूपं महेशस्य देवदानवमानवाः ।।
दृष्ट्वा तं मुमुहुः सर्वे विष्णुतेजोऽभिपीडिताः ।
उनके शरीरमें सारा संसार इस प्रकार दिखायी देता था, मानो उसमें लाकर रख दिया गया हो। संसारमें कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो उन परमात्मासे व्याप्त न हो। परमेश्वर भगवान् विष्णुके उस रूपको देखकर उनके तेजसे तिरस्कृत हो देवता, दानव और मानव सभी मोहित हो गये। बलिर्बद्धोऽभिमानी च यज्ञवाटे महात्मना ।। विरोचनकुलं सर्वं पाताले विनिपातितम् ।। अभिमानी राजा बलिको भगवान्ने यज्ञमण्डपमें ही बाँध लिया और विरोचनके समस्त कुलको स्वर्गसे पातालमें भेज दिया। एवंविधानि कर्माणि कृत्वा गरुडवाहनः । न विस्मयमुपागच्छत् पारमेष्ठ्येन तेजसा ।। गरुडवाहन भगवान् विष्णुको अपने पारमेश्वरीय तेजसे उपर्युक्त कर्म करके भी अहंकार नहीं हुआ। स सर्वममरैश्वर्यं सम्प्रदाय शचीपतेः । त्रैलोक्यं च ददौ शके विष्णुर्दानवसूदनः ।। दानवसूदन श्रीविष्णुने शचीपति इन्द्रको समस्त देवताओंका आधिपत्य देकर त्रिलोकीका राज्य भी उन्हें दे दिया। एष ते वामनो नाम प्रादुर्भावो महात्मनः । वेदविद्भिर्द्विजैरेतत् कथ्यते वैष्णवं यशः ।। मानुषेषु यथा विष्णोः प्रादुर्भावं तथा शृणु ।। इस प्रकार परमात्मा श्रीहरिके वामन-अवतारका वृत्तान्त संक्षेपसे तुम्हें बताया गया। वेदवेत्ता ब्राह्मण भगवान् विष्णुके इस सुयशका वर्णन करते हैं। युधिष्ठिर! अब तुम मनुष्योंमें श्रीहरिके जो अवतार हुए हैं, उनका वृत्तान्त सुनो। विष्णोः पुनर्महाराज प्रादुर्भावो महात्मनः । दत्तात्रेय इति ख्यात ऋषिरासीन्महायशाः ।। महाराज! अब मैं पुनः भगवान् विष्णुके दत्तात्रेय नामक अवतारका वर्णन करता हूँ। दत्तात्रेयजी महान् यशस्वी महर्षि थे। तेन नष्टेषु वेदेषु क्रियासु च मखेषु च । चातुर्वर्ण्ये च संकीर्णे धर्मे शिथिलतां गते ।। अभिवर्धति चाधर्मे सत्ये नष्टे स्थितेऽनृते । प्रजासु क्षीयमाणासु धर्मे चाकुलतां गते ।। सयज्ञाः सक्रिया वेदाः प्रत्यानीताश्च तेन वै । चातुर्वर्ण्यमसंकीर्णं कृतं तेन महात्मना ।। स एव वै यदा प्रादाद्धैहयाधिपतेर्वरम् ।
तं हैहयानामधिपस्त्वर्जुनोऽभिप्रसादयत् ॥ एक समयकी बात है, सारे वेद नष्ट-से हो गये। वैदिक कर्मों और यज्ञ-यागादिकोंका लोप हो गया। चारों वर्ण एकमें मिल गये और सर्वत्र वर्णसंकरता फैल गयी। धर्म शिथिल हो गया एवं अधर्म दिनोंदिन बढ़ने लगा। सत्य दब गया और सब ओर असत्यने सिक्का जमा लिया। प्रजा क्षीण होने लगी और धर्मको अधर्मद्वारा हर तरहसे पीड़ा (हानि) पहुँचने लगी। ऐसे समयमें महात्मा दत्तात्रेयने यज्ञ और कर्मानुष्ठानकी विधिसहित सम्पूर्ण वेदोंका पुनरुद्धार किया और पुनः चारों वर्णोंको पृथक्- पृथक् अपनी-अपनी मर्यादामें स्थापित किया। इन्होंने ही हैहयराज अर्जुनको वर प्रदान किया था। हैहयराज अर्जुनने अपनी सेवाओंद्वारा दत्तात्रेयजीको प्रसन्न कर लिया था। वने पर्यचरत् सम्यक् शुश्रूषुरनसूयकः । निर्ममो निरहंकारो दीर्घकालमतोषयत् ॥ आराध्य दत्तात्रेयं हि अगृह्णात् स वरानिमान् । आप्तादाप्ततराद् विप्राद् विद्वान् विद्वन्निषेवितात् ॥ ऋतेऽमरत्वं विप्रेण दत्तात्रेयेण धीमता । वरैश्चतुर्भिः प्रवृत्त इमांस्तत्राभ्यनन्दत ॥ वह अच्छी तरह सेवामें संलग्न हो वनमें मुनिवर दत्तात्रेयकी परिचर्यामें लगा रहता था। उसने दूसरोंका दोष देखना छोड़ दिया था। वह ममता और अहंकारसे रहित था। उसने दीर्घकालतक दत्तात्रेयजीकी आराधना करके उन्हें संतुष्ट किया। दत्तात्रेयजी आप्त पुरुषोंसे भी बढ़कर आप्त पुरुष थे। बड़े-बड़े विद्वान् उनकी सेवामें रहते थे। विद्वान् सहस्रबाहु अर्जुनने उन ब्रह्मर्षिसे ये निम्नांकित वर प्राप्त किये। अमरत्व छोड़कर उसके माँगे हुए सभी वर विद्वान् ब्राह्मण दत्तात्रेयजीने दे दिये। उसने चार वरोंके लिये महर्षिसे प्रार्थना की थी और उन चारोंका ही महर्षिने अभिनन्दन किया था। श्रीमान् मनस्वी बलवान् सत्यवागनसूयकः । सहस्रबाहुर्भूयासमेष मे प्रथमो वरः ॥ जरायुजाण्डजं सर्वं सर्वं चैव चराचरम् । प्रशासितुमिच्छे धर्मेण द्वितीयस्त्वेष मे वरः ॥ (वे वर इस प्रकार हैं—हैहयराज बोला—) 'मैं श्रीमान्, मनस्वी, बलवान्, सत्यवादी, अदोषदर्शी तथा सहस्रभुजाओंसे विभूषित होऊँ, यह मेरे लिये पहला वर है। 'मैं जरायुज और अण्डज जीवोंके साथ-साथ समस्त चराचर जगत्का धर्मपूर्वक शासन करना चाहता हूँ'—मेरे लिये दूसरा वर यही हो। पितॄन् देवानृषीन् विप्रान् यजेयं विपुलैर्मखैः । अमित्रान् निशितैर्बाणैर्घातयेयं रणाजिरे ॥ दत्तात्रेयेह भगवंस्तृतीयो वर एष मे ।
यस्य नासीन्न भविता न चास्ति सदृशः पुमान् ।।
इह वा दिवि वा लोके स मे हन्ता भवेदिति ।।
‘मैं अनेक प्रकारके यज्ञोंद्वारा देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा ब्राह्मण अतिथियोंका
यजन करूँ और जो लोग मेरे शत्रु हैं, उन्हें समरांगणमें तीखे बाणोंद्वारा मारकर यमलोक
पहुँचा दूँ।' भगवन् दत्तात्रेय! मेरे लिये यही तीसरा वर हो। 'जिसके समान इहलोक या
स्वर्गलोकमें कोई पुरुष न था, न है और न होगा ही, वही मेरा वध करनेवाला हो' (यह मेरे
लिये चौथा वर हो)।
सोऽर्जुनः कृतवीर्यस्य वरः पुत्रोऽभवद् युधि ।
स सहस्रं सहस्राणां माहिष्मत्यामवर्धत ।।
वह अर्जुन राजा कृतवीर्यका ज्येष्ठ पुत्र था और युद्धमें महान् शौर्यका परिचय देता था।
उसने माहिष्मती नगरीमें दस लाख वर्षोंतक निरन्तर अभ्युदयशील होकर राज्य किया।
पृथिवीमखिलां जित्वा द्वीपांश्चापि समुद्रिनः ।
नभसीव ज्वलन् सूर्यः पुण्यैः कर्मभिरर्जुनः ।।
जैसे आकाशमें सूर्यदेव सदा प्रकाशमान होते हैं, उसी प्रकार कार्तवीर्य अर्जुन सारी
पृथ्वी और समुद्री द्वीपोंको जीतकर इस भूतलपर अपने पुण्यकर्मोंसे प्रकाशित हो रहा था।
इन्द्रद्वीपं कशेरुं च ताम्रद्वीपं गभस्तिमत् ।
गान्धर्वं वारुणं द्वीपं सौम्याक्षमिति च प्रभुः ।।
पूर्वेरजितपूर्वांश्च द्वीपानजयदर्जुनः ।।
सौवर्णं सर्वमप्यासीद् विमानवरमुत्तमम् ।
चतुर्थाव्यभजद् राष्ट्रं तद् विभज्यान्वपालयत् ।।
शक्तिशाली सहस्रबाहुने इन्द्रद्वीप, कशेरुद्वीप, ताम्रद्वीप, गभस्तिमान् द्वीप, गन्धर्वद्वीप,
वरुणद्वीप और सौम्याक्षद्वीपको, जिन्हें उसके पूर्वजोंने भी नहीं जीता था, जीतकर अपने
अधिकारमें कर लिया। उसका श्रेष्ठ राजभवन बहुत ही सुन्दर और सारा-का-सारा सुवर्णमय
था। उसने अपने राज्यकी आयको चार भागोंमें बाँट रखा था और इस विभाजनके अनुसार
ही वह प्रजाका पालन करता था।
एकांशेनाहरत् सेनामेकांशेनावसद् गृहान् ।
यस्तु तस्य तृतीयांशो राजाऽऽसीज्जनसंग्रहे ।।
आप्तः परमकल्याणस्तेन यज्ञानकल्पयत् ।।
वह उस आयके एक अंशके द्वारा सेनाका संग्रह और संरक्षण करता था, दूसरे अंशके
द्वारा गृहस्थीका खर्च चलाता था तथा उसका जो तीसरा अंश था, उसके द्वारा राजा अर्जुन
प्रजाजनोंकी भलाईके लिये यज्ञोंका अनुष्ठान करता था। वह सबका विश्वासपात्र और परम
कल्याणकारी था।
ये दस्यवो ग्रामचरा अरण्ये च वसन्ति ये ।
चतुर्थेन च सोऽंशेन तान् सर्वान् प्रत्यषेधयत् ॥ सर्वेभ्यश्चान्तवासिभ्यः कार्तवीर्योऽहरद् बलिम् । आहृतं स्वबलैर्यत् तदर्जुनश्चाभिमन्यते ॥ काको वा मूषिको वापि तं तमेव न्यबर्हयत् । द्वाराणि नापिधीयन्ते राष्ट्रेषु नगरेषु च ॥ वह राजकीय आयके चौथे अंशके द्वारा गाँवों और जंगलोंमें डाकुओं और लुटेरोंको शासनपूर्वक रोकता था। कृतवीर्यकुमार अर्जुन उसी धनको अच्छा मानता था, जिसे उसने अपने बल-पराक्रमद्वारा प्राप्त किया हो। काक या मूषकवृत्तिसे जो लोग प्रजाके धनका अपहरण करते थे, उन सबको वह नष्ट कर देता था। उसके राज्यके भीतर गाँवों तथा नगरोंमें घरके दरवाजे बंद नहीं किये जाते थे। स एव राष्ट्रपालोऽभूत् स्त्रीपालोऽभवदर्जुनः । स एवासीदजापालः स गोपालो विशाम्पते ॥ राजन्! कार्तवीर्य अर्जुन ही समूचे राष्ट्रका पोषक, स्त्रियोंका संरक्षक, बकरियोंकी रक्षा करनेवाला तथा गौओंका पालक था। स स्मारण्ये मनुष्याणां राजा क्षेत्राणि रक्षति । इदं तु कार्तवीर्यस्य बभूवासदृशं जनैः ॥ वही जंगलोंमें मनुष्योंके खेतोंकी रक्षा करता था। यह है कार्तवीर्यका अद्भुत कार्य, जिसकी मनुष्योंसे तुलना नहीं हो सकती। न पूर्वे नापरे तस्य गमिष्यन्ति गतिं नृपाः । यदर्णवे प्रयातस्य वस्त्रं न परिषिच्यते ॥ शतं वर्षसहस्राणामनुशिष्यार्जुनो महीम् । दत्तात्रेयप्रसादेन एवं राज्यं चकार सः ॥ न पहलेका कोई राजा कार्तवीर्यकी किसी महत्ताको प्राप्त कर सका और न भविष्यमें ही कोई प्राप्त कर सकेगा। वह जब समुद्रमें चलता था, तब उसका वस्त्र नहीं भीगता था। राजा अर्जुन दत्तात्रेयजीके कृपाप्रसादसे लाखों वर्षतक पृथ्वीपर शासन करते हुए इस प्रकार राज्यका पालन करता रहा। एवं बहूनि कर्माणि चक्रे लोकहिताय सः । दत्तात्रेय इति ख्यातः प्रादुर्भावस्तु वैष्णवः ॥ कथितो भरतश्रेष्ठ शृणु भूयो महात्मनः ॥ यदा भृगुकुले जन्म यदर्थं च महात्मनः । जामदग्न्य इति ख्यातः प्रादुर्भावस्तु वैष्णवः ॥ इस प्रकार उसने लोकहितके लिये बहुत-से कार्य किये। भरतश्रेष्ठ! यह मैंने भगवान् विष्णुके दत्तात्रेय नामक अवतारका वर्णन किया। अब पुनः उन महात्माके अन्य अवतारका
वर्णन सुनो। भगवान्का वह अवतार जामदग्न्य (परशुराम)-के नामसे विख्यात है। उन्होंने
किसलिये और कब भृगुकुलमें अवतार ग्रहण किया, वह प्रसंग बतलाता हूँ; सुनो।
जगदग्निसुतो राजन् रामो नाम स वीर्यवान् ।
हैहयान्तकरो राजन् स रामो बलिनां वरः ॥
कार्तवीर्यो महावीर्यो बलेनाप्रतिमस्तथा ।
रामेण जामदग्न्येन हतो विषममाचरन् ।।
महाराज युधिष्ठिर! महर्षि जमदग्निके पुत्र परशुराम बड़े पराक्रमी हुए हैं। बलवानोंमें
श्रेष्ठ परशुरामजीने ही हैहयवंशका संहार किया था। महापराक्रमी कार्तवीर्य अर्जुन बलमें
अपना सानी नहीं रखता था; किंतु अपने अनुचित बर्तावके कारण जमदग्निनन्दन
परशुरामके द्वारा मारा गया।
तं कार्तवीर्यं राजानं हैहयानामरिंदमम् ।
रथस्थं पार्थिवं रामः पातयित्वावधीद् रणे ।।
शत्रुसूदन हैहयराज कार्तवीर्य अर्जुन रथपर बैठा था, परंतु युद्धमें परशुरामजीने उसे
नीचे गिराकर मार डाला।
जम्भस्य मूर्ध्नि भेत्ता च हन्ता च शतदुन्दुभेः ।
स एष कृष्णो गोविन्दो जातो भृगुषु वीर्यवान् ।।
सहस्रबाहुमुद्धर्तुं सहस्रजितमाहवे ।।
क्षत्रियाणां चतुष्षष्टिमयुतानां महायशाः ।
सरस्वत्यां समेतानि एष वै धनुषाजयत् ।।
ब्रह्मद्विषां वधे तस्मिन् सहस्राणि चतुर्दश ।
पुनर्जग्राह शूराणामन्तं चक्रे नरर्षभः ।।
ततो दशसहस्रस्य हन्ता पूर्वमरिंदमः ।
सहस्रं मुसलेनाहन् सहस्रमुदकृन्तत ।।
ये भगवान् गोविन्द ही पराक्रमी परशुरामरूपसे भृगुवंशमें अवतीर्ण हुए। ये ही
जम्भासुरका मस्तक विदीर्ण करनेवाले तथा शतदुन्दुभिके घातक हैं। इन्होंने सहस्रोंपर
विजय पानेवाले सहस्रबाहु अर्जुनका युद्धमें संहार करनेके लिये ही अवतार लिया था।
महायशस्वी परशुरामने केवल धनुषकी सहायतासे सरस्वती नदीके तटपर एकत्रित हुए छः
लाख चालीस हजार क्षत्रियोंपर विजय पायी थी। वे सभी क्षत्रिय ब्राह्मणोंसे द्वेष करनेवाले
थे। उनका वध करते समय नरश्रेष्ठ परशुरामने और भी चौदह हजार शूरवीरोंका अन्त कर
डाला। तदनन्तर शत्रुदमन रामने दस हजार क्षत्रियोंका और वध किया। इसके बाद उन्होंने
हजारों वीरोंको मूसलसे मारकर यमलोक पहुँचा दिया तथा सहस्रोंको फरसेसे काट डाला।
चतुर्दश सहस्राणि क्षणमात्रमपातयत् ।
शिष्टान् ब्रह्मद्विषश्छित्त्वा ततोऽस्नायत भार्गवः ।।
राम रामेत्यभिक्रुष्टो ब्राह्मणैः क्षत्रियार्दितैः । न्यघ्नद् दशसहस्राणि रामः परशुनाभिभूः ॥ भृगुनन्दन परशुरामने चौदह हजार क्षत्रियोंको क्षणमात्रमें मार गिराया तथा शेष ब्रह्मद्रोहियोंका भी मूलोच्छेद करके स्नान किया। क्षत्रियोंसे पीड़ित होकर ब्राह्मणोंने ‘राम-राम’ कहकर आर्तनाद किया था; इसीलिये सर्वविजयी परशुरामने पुनः फरसेसे दस हजार क्षत्रियोंका अन्त किया।
न हृमृष्यत तां वाचमार्तैर्भृशमुदीरिताम् । भृगो रामाभिधावेति यदाक्रन्दन् द्विजातयः ॥ जिस समय द्विजलोग ‘भृगुनन्दन परशुराम! दौड़ो, बचाओ’ इत्यादि बातें कहकर करुणक्रन्दन करते, उस समय उन पीड़ितोंद्वारा कही हुई वह आर्तवाणी परशुरामजी नहीं सहन कर सके।
काश्मीरान् दरदान् कुन्तीन् क्षुद्रकान् मालवाञ्छकान् । चेदिकाशिकरूषांश्च ऋषिकान् क्रथकैशिकान् ॥ अङ्गान् वङ्गान् कलिङ्गांश्च मागधान् काशिकोसलान् । रात्रायणान् वीतिहोत्रान् किरातान् मार्तिकावतान् ॥ एतानन्यांश्च राजेन्द्रान् देशे देशे सहस्रशः । निकृत्य निशितैर्बाणैः सम्प्रदाय विवस्वते ॥ उन्होंने काश्मीर, दरद, कुन्तिभोज, क्षुद्रक, मालव, शक, चेदि, काशि, करूष, ऋषिक, क्रथ, कैशिक, अंग, वंग, कलिंग, मागध, काशी, कोसल, रात्रायण, वीतिहोत्र, किरात तथा मार्तिकावत—इनको तथा अन्य सहस्रों राजेश्वरोंको प्रत्येक देशमें तीखे बाणोंसे मारकर यमराजके भेंट कर दिया।
कीर्णा क्षत्रियकोटीभिः मेरुमन्दरभूषणा । त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी तेन निःक्षत्रिया कृता ॥ मेरु और मन्दर पर्वत जिसके आभूषण हैं, वह पृथिवी करोड़ों क्षत्रियोंकी लाशोंसे पट गयी। एक-दो बार नहीं, इक्कीस बार परशुरामने यह पृथिवी क्षत्रियोंसे सूनी कर दी।
एवमिष्ट्वा महाबाहुः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । अन्यद् वर्षशतं रामः सौभे शाल्वमयोधयत् ॥ ततः स भृगुशार्दूलस्तं सौभं योधयन् प्रभुः । सुबन्धुरं रथं राजन्नास्थाय भरतर्षभ ॥ नग्निकानां कुमारीणां गायन्तीनामुपाशृणोत् । तदनन्तर महाबाहु परशुरामने प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करके सौ वर्षोंतक सौभ नामक विमानपर बैठे हुए राजा शाल्वके साथ युद्ध किया। भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर!
तदनन्तर सुन्दर रथपर बैठकर सौभ विमानके साथ युद्ध करनेवाले शक्तिशाली वीर भृगुश्रेष्ठ परशुरामने गीत गाती हुई नग्निका* कुमारियोंके मुखसे यह सुना—
राम राम महाबाहो भृगूणां कीर्तिवर्धन ।
त्यज शस्त्राणि सर्वाणि न त्वं सौभं वधिष्यसि ॥
चक्रहस्तो गदापाणिर्भीतानामभयंकरः ।
युधि प्रद्युम्नसाम्बाभ्यां कृष्णः सौभं वधिष्यति ॥
‘राम! राम! महाबाहो! तुम भृगुवंशकी कीर्ति बढ़ानेवाले हो; अपने सारे अस्त्र-शस्त्र नीचे डाल दो। तुम सौभ विमानका नाश नहीं कर सकोगे। भयभीतोंको अभय देनेवाले चक्रधारी गदापाणि भगवान् श्रीविष्णु प्रद्युम्न और साम्बको साथ लेकर युद्धमें सौभ विमानका नाश करेंगे’।
तच्छ्रुत्वा पुरुषव्याघ्रस्तत एव वनं ययौ ।
न्यस्य सर्वाणि शस्त्राणि कालकाङ्क्षी महायशाः ॥
रथं वर्मायुधं चैव शरान् परशुमेव च ।
धनूंष्यप्सु प्रतिष्ठाप्य राजंस्तेपे परं तपः ॥
यह सुनकर पुरुषसिंह परशुराम उसी समय वनको चल दिये। राजन्! वे महायशस्वी मुनि कृष्णावतारके समयकी प्रतीक्षा करते हुए अपने सारे अस्त्र-शस्त्र, रथ, कवच, आयुध बाण, परशु और धनुष जलमें डालकर बड़ी भारी तपस्यामें लग गये।
ह्रियं प्रज्ञां श्रियं कीर्तिं लक्ष्मीं चामित्रकर्शनः ।
पञ्चाधिष्ठाय धर्मात्मा तं रथं विससर्ज ह ॥
शत्रुओंका नाश करनेवाले धर्मात्मा परशुरामने लज्जा, प्रज्ञा, श्री, कीर्ति और लक्ष्मी— इन पाँचोंका आश्रय लेकर अपने पूर्वोक्त रथको त्याग दिया।
आदिकाले प्रवृत्तं हि विभजन् कालमीश्वरः ।
नाहनच्छ्रद्धया सौभं न ह्यशक्तो महायशाः ॥
जामदग्न्य इति ख्यातो यस्त्वसौ भगवानृषिः ।
सोऽस्य भागस्तपस्तेपे भार्गवो लोकविश्रुतः ॥
शृणु राजंस्तथा विष्णोः प्रादुर्भावं महात्मनः ।
चतुर्विंशे युगे चापि विश्वामित्रपुरःसरः ॥
आदिकालमें जिसकी प्रवृत्ति हुई थी, उस कालका विभाग करके भगवान् परशुरामने कुमारियोंकी बातपर श्रद्धा होनेके कारण ही सौभ विमानका नाश नहीं किया, असमर्थताके कारण नहीं। जमदग्निनन्दन परशुरामके नामसे विख्यात वे महर्षि, जो विश्वविदित ऐश्वर्यशाली महर्षि हैं, वे इन्हीं श्रीकृष्णके अंश हैं, जो इस समय तपस्या कर रहे हैं। राजन्! अब महात्मा भगवान् विष्णुके साक्षात् स्वरूप श्रीरामके अवतारका वर्णन सुनो, जो विश्वामित्र मुनिको आगे करके चलनेवाले थे।
तिथौ नावमिके जज्ञे तथा दशरथादपि ।
कृत्वाऽऽत्मानं महाबाहुश्चतुर्धा विष्णुरव्ययः ॥
चैत्रमासके शुक्लपक्षकी नवमी तिथिको अविनाशी भगवान् महाबाहु विष्णुने अपने-आपको चार स्वरूपोंमें विभक्त करके महाराज दशरथके सकाशसे अवतार ग्रहण किया था।
लोके राम इति ख्यातस्तेजसा भास्करोपमः ।
प्रसादनार्थं लोकस्य विष्णुस्तस्य सनातनः ॥
धर्मार्थमेव कौन्तेय जज्ञे तत्र महायशाः ।
वे भगवान् सूर्यके समान तेजस्वी राजकुमार लोकमें श्रीरामके नामसे विख्यात हुए। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! जगत्को प्रसन्न करने तथा धर्मकी स्थापनाके लिये ही महायशस्वी सनातन भगवान् विष्णु वहाँ प्रकट हुए थे।
तमप्याहुर्मनुष्येन्द्रं सर्वभूतपतेस्तनुम् ॥
यज्ञविघ्नं तदा कृत्वा विश्वामित्रस्य भारत ।
सुबाहुर्निहतस्तेन मारीचस्ताडितो भृशम् ॥
मनुष्योंके स्वामी भगवान् श्रीरामको साक्षात् सर्वभूतपति श्रीहरिका ही स्वरूप बतलाया जाता है। भारत! उस समय विश्वामित्रके यज्ञमें विघ्न डालनेके कारण राक्षस सुबाहु श्रीरामचन्द्रजीके हाथों मारा गया और मारीच नामक राक्षसको भी बड़ी चोट पहुँची।
तस्मै दत्तानि शस्त्राणि विश्वामित्रेण धीमता ।
वधार्थं देवशत्रूणां दुर्वारणि सुरैरपि ॥
परम बुद्धिमान् विश्वामित्र मुनिने देवशत्रु राक्षसोंका वध करनेके लिये श्रीरामचन्द्रजीको ऐसे-ऐसे दिव्यास्त्र प्रदान किये थे, जिनका निवारण करना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन था।
वर्तमाने तदा यज्ञे जनकस्य महात्मनः ।
भग्नं माहेश्वरं चापं क्रीडता लीलया परम् ॥
ततो विवाहं सीतायाः कृत्वा स रघुवल्लभः ।
नगरीं पुनरासाद्य मुमुदे तत्र सीतया ॥
उन्हीं दिनों महात्मा जनकके यहाँ धनुषयज्ञ हो रहा था, उसमें श्रीरामने भगवान् शंकरके महान् धनुषको खेल-खेलमें ही तोड़ डाला। तदनन्तर सीताजीके साथ विवाह करके रघुनाथजी अयोध्यापुरीमें लौट आये और वहाँ सीताजीके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे।
कस्यचित् त्वथ कालस्य पित्रा तत्राभिचोदितः ।
कैकेय्याः प्रियमन्विच्छन् वनमभ्यवपद्यत ॥
कुछ कालके पश्चात् पिताकी आज्ञा पाकर वे अपनी विमाता महारानी कैकेयीका प्रिय करनेकी इच्छासे वनमें चले गये।
यः समाः सर्वधर्मज्ञश्चतुर्दश वने वसन् ।
लक्ष्मणानुचरो रामः सर्वभूतहिते रतः ॥
चतुर्दश वने तप्त्वा तपो वर्षाणि भारत ।
रूपिणी यस्य पार्श्वस्था सीतेत्यभिहिता जनैः ॥
वहाँ सब धर्मोंके ज्ञाता और समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणके साथ चौदह वर्षोंतक वनमें निवास किया। भरतवंशी राजन्! चौदह वर्षोंतक उन्होंने वनमें तपस्यापूर्वक जीवन बिताया। उनके साथ उनकी अत्यन्त रूपवती धर्मपत्नी भी थीं, जिन्हें लोग सीता कहते थे।
पूर्वोचितत्वात् सा लक्ष्मीर्भर्तारमनुगच्छति ।
जनस्थाने वसन् कार्यं त्रिदशानां चकार सः ॥
मारीचं दूषणं हत्वा खरं त्रिशिरसं तथा ।
चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां घोरकर्मणाम् ॥
जघान रामो धर्मात्मा प्रजानां हितकाम्यया ।
अवतारके पहले श्रीविष्णुरूपमें रहते समय भगवान्के साथ उनकी जो योग्यतमा भार्या लक्ष्मी रहा करती हैं, उन्होंने ही उपयुक्त होनेके कारण श्रीरामावतारके समय सीताके रूपमें अवतीर्ण हो अपने पतिदेवका अनुसरण किया था। भगवान् श्रीराम जनस्थानमें रहकर देवताओंके कार्य सिद्ध करते थे। धर्मात्मा श्रीरामने प्रजाजनोंके हितकी कामनासे भयानक कर्म करनेवाले चौदह हजार राक्षसोंका वध किया। जिनमें मारीच, खर-दूषण और त्रिशिरा आदि प्रधान थे।
विराधं च कबन्धं च राक्षसौ क्रूरकर्मिणौ ॥
जघान च तदा रामो गन्धर्वौ शापविक्षतौ ॥
उन्हीं दिनों दो शापग्रस्त गन्धर्व क्रूरकर्मा राक्षसोंके रूपमें वहाँ रहते थे, जिनके नाम विराध और कबन्ध थे। श्रीरामने उन दोनोंका भी संहार कर डाला।
स रावणस्य भगिनीनासाच्छेदं चकार ह ।
भार्यावियोगं तं प्राप्य मृगयन् व्यचरद् वनम् ॥
ततस्तमृष्यमूकं स गत्वा पम्पामतीत्य च ।
सुग्रीवं मारुतिं दृष्ट्वा चक्रे मैत्रीं तयोः स वै ॥
उन्होंने रावणकी बहिन शूर्पणखाकी नाक भी लक्ष्मणके द्वारा कटवा दी; इसीके कारण (राक्षसोंके षड्यन्त्रसे) उन्हें पत्नीका वियोग देखना पड़ा। तब वे सीताकी खोज करते हुए वनमें विचरने लगे। तदनन्तर ऋष्यमूक पर्वतपर जा पम्पासरोवरको लाँघकर श्रीरामजी सुग्रीव और हनुमान्जीसे मिले और उन दोनोंके साथ उन्होंने मैत्री स्थापित कर ली।
अथ गत्वा स किष्किन्धां सुग्रीवेण तदा सह ।
निहत्य वालिनं युद्धे वानरेन्द्रं महाबलम् ।।
अभ्यषिञ्चत् तदा रामः सुग्रीवं वानरेश्वरम् ।
ततः स वीर्यवान् राजंस्त्वरयन् वै समुत्सुकः ।
विचित्य वायुपुत्रेण लङ्कादेशं निवेदितम् ।।
तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीने सुग्रीवके साथ किष्किन्धामें जाकर महाबली वानरराज बालीको युद्धमें मारा और सुग्रीवको वानरोंके राजाके पदपर अभिषिक्त कर दिया। राजन्! तदनन्तर पराक्रमी श्रीराम सीताजीके लिये उत्सुक हो बड़ी उतावलीके साथ उनकी खोज कराने लगे। वायुपुत्र हनुमान्जीने पता लगाकर यह बतलाया कि सीताजी लंकामें हैं।
सेतुं बद्ध्वा समुद्रस्य वानरैः सहितस्तदा ।
सीतायाः पदमन्विच्छन् रामो लङ्कां विवेश ह ।।
तब समुद्रपर पुल बाँधकर वानरोंसहित श्रीरामने सीताजीके स्थानका पता लगाते हुए लंकामें प्रवेश किया।
देवोरगगणानां हि यक्षराक्षसपक्षिणाम् ।
तत्रावध्यं राक्षसेन्द्रं रावणं युधि दुर्जयम् ।।
युक्तं राक्षसकोटीभिर्भिन्नाञ्जनचयोपमम् ।
वहाँ देवता, नागगण, यक्ष, राक्षस तथा पक्षियोंके लिये अवध्य और युद्धमें दुर्जय राक्षसराज रावण करोड़ों राक्षसोंके साथ रहता था। वह देखनेमें खानसे खोदकर निकाले हुए कोयलेके ढेरके समान जान पड़ता था।
दुर्निरीक्ष्यं सुरगणैर्वरदानेन दर्पितम् ।
जघान सचिवैः सार्धं सान्वयं रावणं रणे ।
त्रैलोक्यकण्टकं वीरं महाकायं महाबलम् ।।
रावणं सगणं हत्वा रामो भूतपतिः पुरा ।।
लङ्कायां तं महात्मानं राक्षसेन्द्रं विभीषणम् ।
अभिषिच्य च तत्रैव अमरत्वं ददौ तदा ।।
देवताओंके लिये उसकी ओर आँख उठाकर देखना भी कठिन था। ब्रह्माजीसे वरदान मिलनेसे उसका घमंड बहुत बढ़ गया था। श्रीरामने त्रिलोकीके लिये कण्टकरूप महाबली विशालकाय वीर रावणको उसके मन्त्रियों और वंशजोंसहित युद्धमें मार डाला। इस प्रकार सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी श्रीरघुनाथजीने प्राचीन कालमें रावणको सेवकोंसहित मारकर लंकाके राज्यपर राक्षसपति महात्मा विभीषणका अभिषेक करके उन्हें वहीं अमरत्व प्रदान किया।
आरुह्य पुष्पकं रामः सीतामादाय पाण्डव ।
सबलः स्वपुरं गत्वा धर्मराज्यमपालयत् ।।
दानवो लवणो नाम मधोः पुत्रो महाबलः । शत्रुघ्नेन हतो राजंस्ततो रामस्य शासनात् ॥ पाण्डुनन्दन! तत्पश्चात् श्रीरामने पुष्पक विमानपर आरूढ़ हो सीताको साथ ले दलबलसहित अपनी राजधानीमें जाकर धर्मपूर्वक राज्यका पालन किया। राजन्! उन्हीं दिनों मथुरामें मधुका पुत्र लवण नामक दानव राज्य करता था, जिसे रामचन्द्रजीकी आज्ञासे शत्रुघ्नने मार डाला। एवं बहूनि कर्माणि कृत्वा लोकहिताय सः । राज्यं चकार विधिवद् रामो धर्मभृतां वरः ॥ इस प्रकार धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने लोकहितके लिये बहुत-से कार्य करके विधिपूर्वक राज्यका पालन किया। दशाश्वमेधानाजह्रे जारुधिस्थान् निरर्गलान् ॥ नाश्रूयन्ताशुभा वाचो नात्ययः प्राणिनां तदा । न वित्तजं भयं चासीद् रामे राज्यं प्रशासति ॥ प्राणिनां च भयं नासीज्जलानलविधानजम् । पर्यदेवन्न विधवा नानाथाः काश्चनाभवन् ॥ उन्होंने दस अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया और सरयूतटके जारुधिप्रदेशको विघ्न-बाधाओंसे रहित कर दिया। श्रीरामचन्द्रजीके शासनकालमें कभी कोई अमंगल-की बात नहीं सुनी गयी। उस समय प्राणियोंकी अकालमृत्यु नहीं होती थी और किसीको भी धनकी रक्षा आदिके निमित्त भय नहीं प्राप्त होता था। संसारके जीवोंको जल और अग्नि आदिसे भी भय नहीं होता था। विधवाओंका करुण क्रन्दन नहीं सुना जाता था तथा स्त्रियाँ अनाथ नहीं होती थीं। सर्वमासीत् तदा तृप्तं रामे राज्यं प्रशासति । न संकरकरा वर्णा नाकृष्टकरकृज्जनः ॥ श्रीरामचन्द्रजीके राज्यशासनकालमें सम्पूर्ण जगत् संतुष्ट था। किसी भी वर्णके लोग वर्णसंकर संतान नहीं उत्पन्न करते थे। कोई भी मनुष्य ऐसी जमीनके लिये कर नहीं देता था, जो जोतने-बोनेके काममें न आती हो। न च स्म वृद्धा बालानां प्रेतकार्याणि कुर्वते ॥ विशः पर्यचरन् क्षत्रं क्षत्रं नापीडयद् विशः । नरा नात्यचरन् भार्या भार्या नात्यचरन् पतीन् ॥ नासीदल्पकृषिर्लोके रामे राज्यं प्रशासति । आसन् वर्षसहस्राणि तथा पुत्रसहस्रिणः । अरोगाः प्राणिनोऽप्यासन् रामे राज्यं प्रशासति ॥
बूढ़ेलोग बालकोंका अन्त्येष्टि-संस्कार नहीं करते थे (उनके सामने ऐसा अवसर ही नहीं आता था)। वैश्यलोग क्षत्रियोंकी परिचर्या करते थे और क्षत्रियलोग भी वैश्योंको कष्ट नहीं होने देते थे। पुरुष अपनी पत्नियोंकी अवहेलना नहीं करते थे और पत्नियाँ भी पतियोंकी अवहेलना नहीं करती थीं। श्रीरामचन्द्रजीके राज्य-शासन करते समय लोकमें खेतीकी उपज कम नहीं होती थी। लोग सहस्र पुत्रोंसे युक्त होकर सहस्रों वर्षोंतक जीवित रहते थे। श्रीरामके राज्य-शासनकालमें सब प्राणी नीरोग थे।
ऋषीणां देवतानां च मनुष्याणां तथैव च ।
पृथिव्यां सहवासोऽभूद् रामे राज्यं प्रशासति ॥
सर्वे ह्यासंस्तृप्तरूपास्तदा तस्मिन् विशाम्पते ।
धर्मेण पृथिवीं सर्वामनुशासति भूमिपे ॥
श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें इस पृथ्वीपर ऋषि, देवता और मनुष्य साथ-साथ रहते थे। राजन्! भूमिपाल श्रीरघुनाथजी जिन दिनों सारी पृथ्वीका शासन करते थे, उस समय उनके राज्यमें सब लोग पूर्णतः तृप्तिका अनुभव करते थे।
तपस्येवाभवन् सर्वे सर्वे धर्ममनुव्रताः ।
पृथिव्यां धार्मिके तस्मिन् रामे राज्यं प्रशासति ॥
धर्मात्मा राजा रामके राज्यमें पृथ्वीपर सब लोग तपस्यामें ही लगे रहते थे और सब-के-सब धर्मानुरागी थे।
नाधर्मिष्ठो नरः कश्चिद् बभूव प्राणिनां क्वचित् ।
प्राणापानौ समावास्तां रामे राज्यं प्रशासति ॥
श्रीरामके राज्य-शासनकालमें कोई भी मनुष्य अधर्ममें प्रवृत्त नहीं होता था। सबके प्राण और अपान समवृत्तिमें स्थित थे।
गाथामप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जनाः ।
श्यामो युवा लोहिताक्षो मातङ्गानामिवर्षभः ॥
आजानुबाहुः सुमुखः सिंहस्कन्धो महाबलः ।
दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च ॥
राज्यं भोगं च सम्प्राप्य शशास पृथिवीमिमाम् ।
जो पुराणवेत्ता विद्वान् हैं, वे इस विषयमें निम्नांकित गाथा गाया करते हैं—'भगवान् श्रीरामकी अंगकान्ति श्याम है, युवावस्था है, उनके नेत्रोंमें कुछ-कुछ लाली है। वे गजराज-जैसे पराक्रमी हैं। उनकी भुजाएँ घुटनोंतक लंबी हैं। मुख बहुत सुन्दर है। कंधे सिंहके समान हैं और वे महान् बलशाली हैं। उन्होंने राज्य और भोग पाकर ग्यारह हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीका शासन किया।
रामो रामो राम इति प्रजानामभवन् कथाः ॥
रामभूतं जगदिदं रामे राज्यं प्रशासति ।