भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1891

दैत्यं सोऽतिबलं दृष्ट्वा क्रुद्धशार्दूलविक्रमम् । दीप्तैर्दैत्यगणैर्गुप्तं खरैर्नखमुखैरुत ॥ ततः कृत्वा तु युद्धं वै तेन दैत्येन वै हरिः । कुपित सिंहके समान पराक्रमी उस अत्यन्त बलशाली, दर्पयुक्त एवं दैत्यगणोंसे सुरक्षित दैत्यको सामने आया देख महातेजस्वी भगवान् नृसिंहने नखोंके तीखे अग्रभागोंके द्वारा उस दैत्यके साथ घोर युद्ध किया। संध्याकाले महातेजाः प्रघाणे च त्वरान्वितः ॥ ऊरौ निधाय दैत्येन्द्रं निर्बिभेद नखैर्हि तम् । फिर संध्याकाल आनेपर बड़ी उतावलीके साथ उसे पकड़कर वे राजभवनकी देहलीपर बैठ गये। तदनन्तर उन्होंने अपनी जाँघोंपर दैत्यराजको रखकर नखोंसे उसका वक्षःस्थल विदीर्ण कर डाला। महाबलं महावीर्यं वरदानेन दर्पितम् ॥ दैत्यश्रेष्ठं सुरश्रेष्ठो जघान तरसा हरिः । सुरश्रेष्ठ श्रीहरिने वरदानसे घमंडमें भरे हुए महाबली महापराक्रमी दैत्यराजको बड़े वेगसे मार डाला। हिरण्यकशिपुं हत्वा सर्वदैत्यांश्च वै तदा ॥ विबुधानां प्रजानां च हितं कृत्वा महाद्युतिः । प्रमुमोद हरिर्देवः स्थाप्य धर्मं तदा भुवि ॥ इस प्रकार हिरण्यकशिपु तथा उसके अनुयायी सब दैत्योंका संहार करके महातेजस्वी भगवान् श्रीहरिने देवताओं तथा प्रजाजनोंका हितसाधन किया और इस पृथ्वीपर धर्मकी स्थापना करके वे बड़े प्रसन्न हुए। एष ते नारसिंहोऽत्र कथितः पाण्डुनन्दन । शृणु त्वं वामनं नाम प्रादुर्भावं महात्मनः ॥ पाण्डुनन्दन! यह मैंने तुम्हें संक्षेपसे नृसिंहावतारकी कथा सुनायी है। अब तुम परमात्मा श्रीहरिके वामन-अवतारका वृत्तान्त सुनो। पुरा त्रेतायुगे राजन् बलिवैरोचनोऽभवत् । दैत्यानां पार्थिवो वीरो बलेनाप्रतिमो बली ॥ राजन्! प्राचीन त्रेतायुगकी बात है; विरोचनकुमार बलि दैत्योंके राजा थे। बलमें उनके समान दूसरा कोई नहीं था। बलि अत्यन्त बलवान् होनेके साथ ही महान् वीर भी थे। तदा बलिर्महाराज दैत्यसङ्घैः समावृतः । विजित्य तरसा शक्रमिन्द्रस्थानमवाप सः ॥ महाराज! दैत्यसमूहसे घिरे हुए बलिने बड़े वेगसे इन्द्रपर आक्रमण किया और उन्हें जीतकर इन्द्रलोकपर अधिकार प्राप्त कर लिया।