भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1892

तेन वित्रासिता देवा बलिनाऽऽखण्डलादयः ।
ब्रह्माणं तु पुरस्कृत्य गत्वा क्षीरोदधिं तदा ॥
तुष्टुवुः सहिताः सर्वे देवं नारायणं प्रभुम् ।
राजा बलिके आक्रमणसे अत्यन्त त्रस्त हुए इन्द्र आदि देवता ब्रह्माजीको आगे करके क्षीरसागरके तटपर गये और सबने मिलकर देवाधिदेव भगवान् नारायणका स्तवन किया।
स तेषां दर्शनं चक्रे विबुधानां हरिः स्तुतः ॥
प्रसादजं ह्यस्य विभोरदित्यां जन्म चोच्यते ।
देवताओंके स्तुति करनेपर श्रीहरिने उन्हें दर्शन दिया और कहा जाता है, उनपर कृपाप्रसाद करनेके फलस्वरूप भगवान्‌का अदितिके गर्भसे प्रादुर्भाव हुआ।
अदितेरपि पुत्रत्वमेत्य यादवनन्दनः ॥
एष विष्णुरिति ख्यात इन्द्रस्यावरजोऽभवत् ।
जो इस समय यदुकुलको आनन्दित कर रहे हैं, ये ही भगवान् श्रीकृष्ण पहले अदितिके पुत्र होकर इन्द्रके छोटे भाई विष्णु (या उपेन्द्र)-के नामसे विख्यात हुए।
तस्मिन्नेव च काले तु दैत्येन्द्रो वीर्यवान् बलिः ॥
अश्वमेधं क्रतुश्रेष्ठमाहर्तुमुपचक्रमे ।
उन्हीं दिनों महापराक्रमी दैत्यराज बलिने क्रतुश्रेष्ठ अश्वमेधके अनुष्ठानकी तैयारी आरम्भ की।
वर्तमाने तदा यज्ञे दैत्येन्द्रस्य युधिष्ठिर ॥
स विष्णुर्वामनो भूत्वा प्रच्छन्नो ब्रह्मवेषधृक् ।
मुण्डो यज्ञोपवीती च कृष्णाजिनधरः शिखी ॥
पलाशदण्डं संगृह्य वामनोऽद्भुतदर्शनः ।
प्रविश्य स बलेर्यज्ञे वर्तमाने तु दक्षिणाम् ॥
देहीत्युवाच दैत्येन्द्रं विक्रमांस्त्रीन् ममैव ह ।
युधिष्ठिर! जब दैत्यराजका यज्ञ आरम्भ हो गया, उस समय भगवान् विष्णु ब्राह्मणवेषधारी वामन ब्रह्मचारीके रूपमें अपनेको छिपाकर सिर मुँड़ाये, यज्ञोपवीत, काला मृगचर्म और शिखा धारण किये, हाथमें पलाशका डंडा लिये उस यज्ञमें गये। उस समय भगवान् वामनकी अद्भुत शोभा दिखायी देती थी। बलिके वर्तमान यज्ञमें प्रवेश करके उन्होंने दैत्यराजसे कहा—'मुझे तीन पग भूमि दक्षिणारूपमें दीजिये।'
दीयतां त्रिपदीमात्रमित्ययाचन्महासुरम् ॥
स तथेति प्रतिश्रुत्य प्रददौ विष्णवे तदा ।
'केवल तीन पग भूमि मुझे दे दीजिये।' ऐसा कहकर उन्होंने महान् असुर बलिसे याचना की। बलिने भी 'तथास्तु' कहकर श्रीविष्णुको भूमि दे दी।
तेन लब्ध्वा हरिर्भूमिं जृम्भयामास वै भृशम् ।