भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1893

स शिशुः सदिवं खं च पृथिवीं च विशाम्पते ।। त्रिभिर्विक्रमणैरेतत् सर्वमाक्रमताभिभूः । बलेर्बलवतो यज्ञे बलिना विष्णुना पुरा ।। विक्रमैस्त्रिभिरक्षोभ्याः क्षोभितास्ते महासुराः । बलिसे वह भूमि पाकर भगवान् विष्णु बड़े वेगसे बढ़ने लगे। राजन्! वे पहले तो बालक-जैसे लगते थे; किंतु उन्होंने बढ़कर तीन ही पगोंमें स्वर्ग, आकाश और पृथ्वी—सबको माप लिया। इस प्रकार बलवान् राजा बलिके यज्ञमें जब महाबली भगवान् विष्णुने केवल तीन पगोंद्वारा त्रिलोकीको नाप लिया, तब किसीसे भी क्षुब्ध न किये जा सकनेवाले महान् असुर क्षुब्ध हो उठे। विप्रचित्तिमुखाः क्रुद्धा दैत्यसङ्घा महाबलाः ।। नानावक्त्रा महाकाया नानावेषधरा नृप । राजन्! उनमें विप्रचित्ति आदि दानव प्रधान थे। क्रोधमें भरे हुए उन महाबली दैत्योंके समुदाय अनेक प्रकारके वेष धारण किये वहाँ उपस्थित थे। उनके मुख अनेक प्रकारके दिखायी देते थे। वे सब-के-सब विशालकाय थे। नानाप्रहरणा रौद्रा नानामाल्यानुलेपनाः ।। स्वान्यायुधानि संगृह्य प्रदीप्ता इव तेजसा । क्रममाणं हरिं तत्र उपावर्तन्त भारत ।। उनके हाथोंमें भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र थे। उन्होंने विविध प्रकारकी मालाएँ तथा चन्दन धारण कर रखे थे। वे देखनेमें बड़े भयंकर थे और तेजसे मानो प्रज्वलित हो रहे थे। भरतनन्दन! जब भगवान् विष्णुने तीनों लोकोंको मापना आरम्भ किया, उस समय सभी दैत्य अपने-अपने आयुध लेकर उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये। प्रमथ्य सर्वान् दैतेयान् पादहस्ततलैस्तु तान् । रूपं कृत्वा महाभीमं जहाराशु स मेदिनीम् ।। सम्प्राप्य पादमाकाशमादित्यसदने स्थितः । अत्यरोचत भूतात्मा भास्करं स्वेन तेजसा ।। भगवान्ने महाभयंकर रूप धारण करके उन सब दैत्योंको लातों-थप्पड़ोंसे मारकर भूमण्डलका सारा राज्य उनसे शीघ्र छीन लिया। उनका एक पैर आकाशमें पहुँचकर आदित्य-मण्डलमें स्थित हो गया। भूतात्मा भगवान् श्रीहरि उस समय अपने तेजसे सूर्यकी अपेक्षा बहुत बढ़-चढ़कर प्रकाशित हो रहे थे। प्रकाशयन् दिशः सर्वाः प्रदिशश्च महाबलः । शुशुभे स महाबाहुः सर्वलोकान् प्रकाशयन् ।। तस्य विक्रमतो भूमिं चन्द्रादित्यौ स्तनान्तरे । नभः प्रक्रममाणस्य नाभ्यां किल तदा स्थितौ ।।