महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीभगवान् बोले— ब्रह्मा तथा देवताओ! मैं शीघ्र ही उस दैत्यका नाश करूँगा, अतः तुम सब लोग अपने-अपने दिव्यलोकमें जाओ।
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा स भगवान् विसृज्य त्रिदिवेश्वरान् ।
नरस्यार्धतनुं कृत्वा सिंहस्यार्धतनुं तथा ॥
नारसिंहेन वपुषा पाणिं निष्पिष्य पाणिना ।
भीमरूपो महातेजा व्यादितास्य इवान्तकः ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! ऐसा कहकर भगवान् विष्णुने देवेश्वरोंको विदा करके आधा शरीर मनुष्यका और आधा सिंहका-सा बनाकर नरसिंहविग्रह धारण करके एक हाथसे दूसरे हाथको रगड़ते हुए बड़ा भयंकर रूप बना लिया। वे महातेजस्वी नरसिंह मुँह बाये हुए कालके समान जान पड़ते थे।
हिरण्यकशिपुं राजन् जगाम हरीरीश्वरः ।
दैत्यास्तमागतं दृष्ट्वा नारसिंहं महाबलम् ॥
ववर्षुः शस्त्रवर्षैस्ते सुसंक्रुद्धास्तदा हरिम् ।
राजन्! तदनन्तर भगवान् विष्णु हिरण्यकशिपुके पास गये। नृसिंहरूपधारी महाबली भगवान् श्रीहरिको आया देख दैत्योंने कुपित होकर उनपर अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा आरम्भ की।
तैर्विसृष्टानि शस्त्राणि भक्षयामास वै हरिः ॥
जघान च रणे दैत्यान् सहस्राणि बहून्यपि ।
उनके द्वारा चलाये हुए सभी शस्त्रोंको भगवान् खा गये, साथ ही उन्होंने उस युद्धमें कई हजार दैत्योंका संहार कर डाला।
तान् निहत्य च दैत्येन्द्रान् सर्वान् क्रुद्धान् महाबलान् ॥
अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धो दैत्येन्द्रं बलगर्वितम् ।
क्रोधमें भरे हुए उन सभी महाबलवान् दैत्येश्वरोंका विनाश करके अत्यन्त कुपित हो भगवान्ने बलोन्मत्त दैत्यराज हिरण्यकशिपुपर धावा किया।
जीमूतघनसंकाशो जीमूतघननःस्वनः ॥
जीमूत इव दीप्तौजा जीमूत इव वेगवान् ।
भगवान् नृसिंहकी अंगकान्ति मेघोंकी घटाके समान श्याम थी। वे मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान दहाड़ रहे थे। उनका उद्दीप्त तेज भी मेघोंके ही समान शोभा पाता था और वे मेघोंके ही समान महान् वेगशाली थे।
देवारिर्दितिजो दुष्टो नृसिंहं समुपाद्रवत् ॥
भगवान् नृसिंहको आया देख देवताओंसे द्वेष रखनेवाला दुष्ट दैत्य हिरण्यकशिपु उनकी ओर दौड़ा।