महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1897, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंयस्य नासीन्न भविता न चास्ति सदृशः पुमान् ।।
इह वा दिवि वा लोके स मे हन्ता भवेदिति ।।
‘मैं अनेक प्रकारके यज्ञोंद्वारा देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा ब्राह्मण अतिथियोंका
यजन करूँ और जो लोग मेरे शत्रु हैं, उन्हें समरांगणमें तीखे बाणोंद्वारा मारकर यमलोक
पहुँचा दूँ।' भगवन् दत्तात्रेय! मेरे लिये यही तीसरा वर हो। 'जिसके समान इहलोक या
स्वर्गलोकमें कोई पुरुष न था, न है और न होगा ही, वही मेरा वध करनेवाला हो' (यह मेरे
लिये चौथा वर हो)।
सोऽर्जुनः कृतवीर्यस्य वरः पुत्रोऽभवद् युधि ।
स सहस्रं सहस्राणां माहिष्मत्यामवर्धत ।।
वह अर्जुन राजा कृतवीर्यका ज्येष्ठ पुत्र था और युद्धमें महान् शौर्यका परिचय देता था।
उसने माहिष्मती नगरीमें दस लाख वर्षोंतक निरन्तर अभ्युदयशील होकर राज्य किया।
पृथिवीमखिलां जित्वा द्वीपांश्चापि समुद्रिनः ।
नभसीव ज्वलन् सूर्यः पुण्यैः कर्मभिरर्जुनः ।।
जैसे आकाशमें सूर्यदेव सदा प्रकाशमान होते हैं, उसी प्रकार कार्तवीर्य अर्जुन सारी
पृथ्वी और समुद्री द्वीपोंको जीतकर इस भूतलपर अपने पुण्यकर्मोंसे प्रकाशित हो रहा था।
इन्द्रद्वीपं कशेरुं च ताम्रद्वीपं गभस्तिमत् ।
गान्धर्वं वारुणं द्वीपं सौम्याक्षमिति च प्रभुः ।।
पूर्वेरजितपूर्वांश्च द्वीपानजयदर्जुनः ।।
सौवर्णं सर्वमप्यासीद् विमानवरमुत्तमम् ।
चतुर्थाव्यभजद् राष्ट्रं तद् विभज्यान्वपालयत् ।।
शक्तिशाली सहस्रबाहुने इन्द्रद्वीप, कशेरुद्वीप, ताम्रद्वीप, गभस्तिमान् द्वीप, गन्धर्वद्वीप,
वरुणद्वीप और सौम्याक्षद्वीपको, जिन्हें उसके पूर्वजोंने भी नहीं जीता था, जीतकर अपने
अधिकारमें कर लिया। उसका श्रेष्ठ राजभवन बहुत ही सुन्दर और सारा-का-सारा सुवर्णमय
था। उसने अपने राज्यकी आयको चार भागोंमें बाँट रखा था और इस विभाजनके अनुसार
ही वह प्रजाका पालन करता था।
एकांशेनाहरत् सेनामेकांशेनावसद् गृहान् ।
यस्तु तस्य तृतीयांशो राजाऽऽसीज्जनसंग्रहे ।।
आप्तः परमकल्याणस्तेन यज्ञानकल्पयत् ।।
वह उस आयके एक अंशके द्वारा सेनाका संग्रह और संरक्षण करता था, दूसरे अंशके
द्वारा गृहस्थीका खर्च चलाता था तथा उसका जो तीसरा अंश था, उसके द्वारा राजा अर्जुन
प्रजाजनोंकी भलाईके लिये यज्ञोंका अनुष्ठान करता था। वह सबका विश्वासपात्र और परम
कल्याणकारी था।
ये दस्यवो ग्रामचरा अरण्ये च वसन्ति ये ।