महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1898, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थेन च सोऽंशेन तान् सर्वान् प्रत्यषेधयत् ॥ सर्वेभ्यश्चान्तवासिभ्यः कार्तवीर्योऽहरद् बलिम् । आहृतं स्वबलैर्यत् तदर्जुनश्चाभिमन्यते ॥ काको वा मूषिको वापि तं तमेव न्यबर्हयत् । द्वाराणि नापिधीयन्ते राष्ट्रेषु नगरेषु च ॥ वह राजकीय आयके चौथे अंशके द्वारा गाँवों और जंगलोंमें डाकुओं और लुटेरोंको शासनपूर्वक रोकता था। कृतवीर्यकुमार अर्जुन उसी धनको अच्छा मानता था, जिसे उसने अपने बल-पराक्रमद्वारा प्राप्त किया हो। काक या मूषकवृत्तिसे जो लोग प्रजाके धनका अपहरण करते थे, उन सबको वह नष्ट कर देता था। उसके राज्यके भीतर गाँवों तथा नगरोंमें घरके दरवाजे बंद नहीं किये जाते थे। स एव राष्ट्रपालोऽभूत् स्त्रीपालोऽभवदर्जुनः । स एवासीदजापालः स गोपालो विशाम्पते ॥ राजन्! कार्तवीर्य अर्जुन ही समूचे राष्ट्रका पोषक, स्त्रियोंका संरक्षक, बकरियोंकी रक्षा करनेवाला तथा गौओंका पालक था। स स्मारण्ये मनुष्याणां राजा क्षेत्राणि रक्षति । इदं तु कार्तवीर्यस्य बभूवासदृशं जनैः ॥ वही जंगलोंमें मनुष्योंके खेतोंकी रक्षा करता था। यह है कार्तवीर्यका अद्भुत कार्य, जिसकी मनुष्योंसे तुलना नहीं हो सकती। न पूर्वे नापरे तस्य गमिष्यन्ति गतिं नृपाः । यदर्णवे प्रयातस्य वस्त्रं न परिषिच्यते ॥ शतं वर्षसहस्राणामनुशिष्यार्जुनो महीम् । दत्तात्रेयप्रसादेन एवं राज्यं चकार सः ॥ न पहलेका कोई राजा कार्तवीर्यकी किसी महत्ताको प्राप्त कर सका और न भविष्यमें ही कोई प्राप्त कर सकेगा। वह जब समुद्रमें चलता था, तब उसका वस्त्र नहीं भीगता था। राजा अर्जुन दत्तात्रेयजीके कृपाप्रसादसे लाखों वर्षतक पृथ्वीपर शासन करते हुए इस प्रकार राज्यका पालन करता रहा। एवं बहूनि कर्माणि चक्रे लोकहिताय सः । दत्तात्रेय इति ख्यातः प्रादुर्भावस्तु वैष्णवः ॥ कथितो भरतश्रेष्ठ शृणु भूयो महात्मनः ॥ यदा भृगुकुले जन्म यदर्थं च महात्मनः । जामदग्न्य इति ख्यातः प्रादुर्भावस्तु वैष्णवः ॥ इस प्रकार उसने लोकहितके लिये बहुत-से कार्य किये। भरतश्रेष्ठ! यह मैंने भगवान् विष्णुके दत्तात्रेय नामक अवतारका वर्णन किया। अब पुनः उन महात्माके अन्य अवतारका