महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1896, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतं हैहयानामधिपस्त्वर्जुनोऽभिप्रसादयत् ॥ एक समयकी बात है, सारे वेद नष्ट-से हो गये। वैदिक कर्मों और यज्ञ-यागादिकोंका लोप हो गया। चारों वर्ण एकमें मिल गये और सर्वत्र वर्णसंकरता फैल गयी। धर्म शिथिल हो गया एवं अधर्म दिनोंदिन बढ़ने लगा। सत्य दब गया और सब ओर असत्यने सिक्का जमा लिया। प्रजा क्षीण होने लगी और धर्मको अधर्मद्वारा हर तरहसे पीड़ा (हानि) पहुँचने लगी। ऐसे समयमें महात्मा दत्तात्रेयने यज्ञ और कर्मानुष्ठानकी विधिसहित सम्पूर्ण वेदोंका पुनरुद्धार किया और पुनः चारों वर्णोंको पृथक्- पृथक् अपनी-अपनी मर्यादामें स्थापित किया। इन्होंने ही हैहयराज अर्जुनको वर प्रदान किया था। हैहयराज अर्जुनने अपनी सेवाओंद्वारा दत्तात्रेयजीको प्रसन्न कर लिया था। वने पर्यचरत् सम्यक् शुश्रूषुरनसूयकः । निर्ममो निरहंकारो दीर्घकालमतोषयत् ॥ आराध्य दत्तात्रेयं हि अगृह्णात् स वरानिमान् । आप्तादाप्ततराद् विप्राद् विद्वान् विद्वन्निषेवितात् ॥ ऋतेऽमरत्वं विप्रेण दत्तात्रेयेण धीमता । वरैश्चतुर्भिः प्रवृत्त इमांस्तत्राभ्यनन्दत ॥ वह अच्छी तरह सेवामें संलग्न हो वनमें मुनिवर दत्तात्रेयकी परिचर्यामें लगा रहता था। उसने दूसरोंका दोष देखना छोड़ दिया था। वह ममता और अहंकारसे रहित था। उसने दीर्घकालतक दत्तात्रेयजीकी आराधना करके उन्हें संतुष्ट किया। दत्तात्रेयजी आप्त पुरुषोंसे भी बढ़कर आप्त पुरुष थे। बड़े-बड़े विद्वान् उनकी सेवामें रहते थे। विद्वान् सहस्रबाहु अर्जुनने उन ब्रह्मर्षिसे ये निम्नांकित वर प्राप्त किये। अमरत्व छोड़कर उसके माँगे हुए सभी वर विद्वान् ब्राह्मण दत्तात्रेयजीने दे दिये। उसने चार वरोंके लिये महर्षिसे प्रार्थना की थी और उन चारोंका ही महर्षिने अभिनन्दन किया था। श्रीमान् मनस्वी बलवान् सत्यवागनसूयकः । सहस्रबाहुर्भूयासमेष मे प्रथमो वरः ॥ जरायुजाण्डजं सर्वं सर्वं चैव चराचरम् । प्रशासितुमिच्छे धर्मेण द्वितीयस्त्वेष मे वरः ॥ (वे वर इस प्रकार हैं—हैहयराज बोला—) 'मैं श्रीमान्, मनस्वी, बलवान्, सत्यवादी, अदोषदर्शी तथा सहस्रभुजाओंसे विभूषित होऊँ, यह मेरे लिये पहला वर है। 'मैं जरायुज और अण्डज जीवोंके साथ-साथ समस्त चराचर जगत्का धर्मपूर्वक शासन करना चाहता हूँ'—मेरे लिये दूसरा वर यही हो। पितॄन् देवानृषीन् विप्रान् यजेयं विपुलैर्मखैः । अमित्रान् निशितैर्बाणैर्घातयेयं रणाजिरे ॥ दत्तात्रेयेह भगवंस्तृतीयो वर एष मे ।