भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1895, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1895

उनके शरीरमें सारा संसार इस प्रकार दिखायी देता था, मानो उसमें लाकर रख दिया गया हो। संसारमें कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो उन परमात्मासे व्याप्त न हो। परमेश्वर भगवान् विष्णुके उस रूपको देखकर उनके तेजसे तिरस्कृत हो देवता, दानव और मानव सभी मोहित हो गये। बलिर्बद्धोऽभिमानी च यज्ञवाटे महात्मना ।। विरोचनकुलं सर्वं पाताले विनिपातितम् ।। अभिमानी राजा बलिको भगवान्ने यज्ञमण्डपमें ही बाँध लिया और विरोचनके समस्त कुलको स्वर्गसे पातालमें भेज दिया। एवंविधानि कर्माणि कृत्वा गरुडवाहनः । न विस्मयमुपागच्छत् पारमेष्ठ्येन तेजसा ।। गरुडवाहन भगवान् विष्णुको अपने पारमेश्वरीय तेजसे उपर्युक्त कर्म करके भी अहंकार नहीं हुआ। स सर्वममरैश्वर्यं सम्प्रदाय शचीपतेः । त्रैलोक्यं च ददौ शके विष्णुर्दानवसूदनः ।। दानवसूदन श्रीविष्णुने शचीपति इन्द्रको समस्त देवताओंका आधिपत्य देकर त्रिलोकीका राज्य भी उन्हें दे दिया। एष ते वामनो नाम प्रादुर्भावो महात्मनः । वेदविद्भिर्द्विजैरेतत् कथ्यते वैष्णवं यशः ।। मानुषेषु यथा विष्णोः प्रादुर्भावं तथा शृणु ।। इस प्रकार परमात्मा श्रीहरिके वामन-अवतारका वृत्तान्त संक्षेपसे तुम्हें बताया गया। वेदवेत्ता ब्राह्मण भगवान् विष्णुके इस सुयशका वर्णन करते हैं। युधिष्ठिर! अब तुम मनुष्योंमें श्रीहरिके जो अवतार हुए हैं, उनका वृत्तान्त सुनो। विष्णोः पुनर्महाराज प्रादुर्भावो महात्मनः । दत्तात्रेय इति ख्यात ऋषिरासीन्महायशाः ।। महाराज! अब मैं पुनः भगवान् विष्णुके दत्तात्रेय नामक अवतारका वर्णन करता हूँ। दत्तात्रेयजी महान् यशस्वी महर्षि थे। तेन नष्टेषु वेदेषु क्रियासु च मखेषु च । चातुर्वर्ण्ये च संकीर्णे धर्मे शिथिलतां गते ।। अभिवर्धति चाधर्मे सत्ये नष्टे स्थितेऽनृते । प्रजासु क्षीयमाणासु धर्मे चाकुलतां गते ।। सयज्ञाः सक्रिया वेदाः प्रत्यानीताश्च तेन वै । चातुर्वर्ण्यमसंकीर्णं कृतं तेन महात्मना ।। स एव वै यदा प्रादाद्धैहयाधिपतेर्वरम् ।