महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
यस्य नासीन्न भविता न चास्ति सदृशः पुमान् ।।
इह वा दिवि वा लोके स मे हन्ता भवेदिति ।।
‘मैं अनेक प्रकारके यज्ञोंद्वारा देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा ब्राह्मण अतिथियोंका
यजन करूँ और जो लोग मेरे शत्रु हैं, उन्हें समरांगणमें तीखे बाणोंद्वारा मारकर यमलोक
पहुँचा दूँ।' भगवन् दत्तात्रेय! मेरे लिये यही तीसरा वर हो। 'जिसके समान इहलोक या
स्वर्गलोकमें कोई पुरुष न था, न है और न होगा ही, वही मेरा वध करनेवाला हो' (यह मेरे
लिये चौथा वर हो)।
सोऽर्जुनः कृतवीर्यस्य वरः पुत्रोऽभवद् युधि ।
स सहस्रं सहस्राणां माहिष्मत्यामवर्धत ।।
वह अर्जुन राजा कृतवीर्यका ज्येष्ठ पुत्र था और युद्धमें महान् शौर्यका परिचय देता था।
उसने माहिष्मती नगरीमें दस लाख वर्षोंतक निरन्तर अभ्युदयशील होकर राज्य किया।
पृथिवीमखिलां जित्वा द्वीपांश्चापि समुद्रिनः ।
नभसीव ज्वलन् सूर्यः पुण्यैः कर्मभिरर्जुनः ।।
जैसे आकाशमें सूर्यदेव सदा प्रकाशमान होते हैं, उसी प्रकार कार्तवीर्य अर्जुन सारी
पृथ्वी और समुद्री द्वीपोंको जीतकर इस भूतलपर अपने पुण्यकर्मोंसे प्रकाशित हो रहा था।
इन्द्रद्वीपं कशेरुं च ताम्रद्वीपं गभस्तिमत् ।
गान्धर्वं वारुणं द्वीपं सौम्याक्षमिति च प्रभुः ।।
पूर्वेरजितपूर्वांश्च द्वीपानजयदर्जुनः ।।
सौवर्णं सर्वमप्यासीद् विमानवरमुत्तमम् ।
चतुर्थाव्यभजद् राष्ट्रं तद् विभज्यान्वपालयत् ।।
शक्तिशाली सहस्रबाहुने इन्द्रद्वीप, कशेरुद्वीप, ताम्रद्वीप, गभस्तिमान् द्वीप, गन्धर्वद्वीप,
वरुणद्वीप और सौम्याक्षद्वीपको, जिन्हें उसके पूर्वजोंने भी नहीं जीता था, जीतकर अपने
अधिकारमें कर लिया। उसका श्रेष्ठ राजभवन बहुत ही सुन्दर और सारा-का-सारा सुवर्णमय
था। उसने अपने राज्यकी आयको चार भागोंमें बाँट रखा था और इस विभाजनके अनुसार
ही वह प्रजाका पालन करता था।
एकांशेनाहरत् सेनामेकांशेनावसद् गृहान् ।
यस्तु तस्य तृतीयांशो राजाऽऽसीज्जनसंग्रहे ।।
आप्तः परमकल्याणस्तेन यज्ञानकल्पयत् ।।
वह उस आयके एक अंशके द्वारा सेनाका संग्रह और संरक्षण करता था, दूसरे अंशके
द्वारा गृहस्थीका खर्च चलाता था तथा उसका जो तीसरा अंश था, उसके द्वारा राजा अर्जुन
प्रजाजनोंकी भलाईके लिये यज्ञोंका अनुष्ठान करता था। वह सबका विश्वासपात्र और परम
कल्याणकारी था।
ये दस्यवो ग्रामचरा अरण्ये च वसन्ति ये ।
चतुर्थेन च सोऽंशेन तान् सर्वान् प्रत्यषेधयत् ॥ सर्वेभ्यश्चान्तवासिभ्यः कार्तवीर्योऽहरद् बलिम् । आहृतं स्वबलैर्यत् तदर्जुनश्चाभिमन्यते ॥ काको वा मूषिको वापि तं तमेव न्यबर्हयत् । द्वाराणि नापिधीयन्ते राष्ट्रेषु नगरेषु च ॥ वह राजकीय आयके चौथे अंशके द्वारा गाँवों और जंगलोंमें डाकुओं और लुटेरोंको शासनपूर्वक रोकता था। कृतवीर्यकुमार अर्जुन उसी धनको अच्छा मानता था, जिसे उसने अपने बल-पराक्रमद्वारा प्राप्त किया हो। काक या मूषकवृत्तिसे जो लोग प्रजाके धनका अपहरण करते थे, उन सबको वह नष्ट कर देता था। उसके राज्यके भीतर गाँवों तथा नगरोंमें घरके दरवाजे बंद नहीं किये जाते थे। स एव राष्ट्रपालोऽभूत् स्त्रीपालोऽभवदर्जुनः । स एवासीदजापालः स गोपालो विशाम्पते ॥ राजन्! कार्तवीर्य अर्जुन ही समूचे राष्ट्रका पोषक, स्त्रियोंका संरक्षक, बकरियोंकी रक्षा करनेवाला तथा गौओंका पालक था। स स्मारण्ये मनुष्याणां राजा क्षेत्राणि रक्षति । इदं तु कार्तवीर्यस्य बभूवासदृशं जनैः ॥ वही जंगलोंमें मनुष्योंके खेतोंकी रक्षा करता था। यह है कार्तवीर्यका अद्भुत कार्य, जिसकी मनुष्योंसे तुलना नहीं हो सकती। न पूर्वे नापरे तस्य गमिष्यन्ति गतिं नृपाः । यदर्णवे प्रयातस्य वस्त्रं न परिषिच्यते ॥ शतं वर्षसहस्राणामनुशिष्यार्जुनो महीम् । दत्तात्रेयप्रसादेन एवं राज्यं चकार सः ॥ न पहलेका कोई राजा कार्तवीर्यकी किसी महत्ताको प्राप्त कर सका और न भविष्यमें ही कोई प्राप्त कर सकेगा। वह जब समुद्रमें चलता था, तब उसका वस्त्र नहीं भीगता था। राजा अर्जुन दत्तात्रेयजीके कृपाप्रसादसे लाखों वर्षतक पृथ्वीपर शासन करते हुए इस प्रकार राज्यका पालन करता रहा। एवं बहूनि कर्माणि चक्रे लोकहिताय सः । दत्तात्रेय इति ख्यातः प्रादुर्भावस्तु वैष्णवः ॥ कथितो भरतश्रेष्ठ शृणु भूयो महात्मनः ॥ यदा भृगुकुले जन्म यदर्थं च महात्मनः । जामदग्न्य इति ख्यातः प्रादुर्भावस्तु वैष्णवः ॥ इस प्रकार उसने लोकहितके लिये बहुत-से कार्य किये। भरतश्रेष्ठ! यह मैंने भगवान् विष्णुके दत्तात्रेय नामक अवतारका वर्णन किया। अब पुनः उन महात्माके अन्य अवतारका
वर्णन सुनो। भगवान्का वह अवतार जामदग्न्य (परशुराम)-के नामसे विख्यात है। उन्होंने
किसलिये और कब भृगुकुलमें अवतार ग्रहण किया, वह प्रसंग बतलाता हूँ; सुनो।
जगदग्निसुतो राजन् रामो नाम स वीर्यवान् ।
हैहयान्तकरो राजन् स रामो बलिनां वरः ॥
कार्तवीर्यो महावीर्यो बलेनाप्रतिमस्तथा ।
रामेण जामदग्न्येन हतो विषममाचरन् ।।
महाराज युधिष्ठिर! महर्षि जमदग्निके पुत्र परशुराम बड़े पराक्रमी हुए हैं। बलवानोंमें
श्रेष्ठ परशुरामजीने ही हैहयवंशका संहार किया था। महापराक्रमी कार्तवीर्य अर्जुन बलमें
अपना सानी नहीं रखता था; किंतु अपने अनुचित बर्तावके कारण जमदग्निनन्दन
परशुरामके द्वारा मारा गया।
तं कार्तवीर्यं राजानं हैहयानामरिंदमम् ।
रथस्थं पार्थिवं रामः पातयित्वावधीद् रणे ।।
शत्रुसूदन हैहयराज कार्तवीर्य अर्जुन रथपर बैठा था, परंतु युद्धमें परशुरामजीने उसे
नीचे गिराकर मार डाला।
जम्भस्य मूर्ध्नि भेत्ता च हन्ता च शतदुन्दुभेः ।
स एष कृष्णो गोविन्दो जातो भृगुषु वीर्यवान् ।।
सहस्रबाहुमुद्धर्तुं सहस्रजितमाहवे ।।
क्षत्रियाणां चतुष्षष्टिमयुतानां महायशाः ।
सरस्वत्यां समेतानि एष वै धनुषाजयत् ।।
ब्रह्मद्विषां वधे तस्मिन् सहस्राणि चतुर्दश ।
पुनर्जग्राह शूराणामन्तं चक्रे नरर्षभः ।।
ततो दशसहस्रस्य हन्ता पूर्वमरिंदमः ।
सहस्रं मुसलेनाहन् सहस्रमुदकृन्तत ।।
ये भगवान् गोविन्द ही पराक्रमी परशुरामरूपसे भृगुवंशमें अवतीर्ण हुए। ये ही
जम्भासुरका मस्तक विदीर्ण करनेवाले तथा शतदुन्दुभिके घातक हैं। इन्होंने सहस्रोंपर
विजय पानेवाले सहस्रबाहु अर्जुनका युद्धमें संहार करनेके लिये ही अवतार लिया था।
महायशस्वी परशुरामने केवल धनुषकी सहायतासे सरस्वती नदीके तटपर एकत्रित हुए छः
लाख चालीस हजार क्षत्रियोंपर विजय पायी थी। वे सभी क्षत्रिय ब्राह्मणोंसे द्वेष करनेवाले
थे। उनका वध करते समय नरश्रेष्ठ परशुरामने और भी चौदह हजार शूरवीरोंका अन्त कर
डाला। तदनन्तर शत्रुदमन रामने दस हजार क्षत्रियोंका और वध किया। इसके बाद उन्होंने
हजारों वीरोंको मूसलसे मारकर यमलोक पहुँचा दिया तथा सहस्रोंको फरसेसे काट डाला।
चतुर्दश सहस्राणि क्षणमात्रमपातयत् ।
शिष्टान् ब्रह्मद्विषश्छित्त्वा ततोऽस्नायत भार्गवः ।।
राम रामेत्यभिक्रुष्टो ब्राह्मणैः क्षत्रियार्दितैः । न्यघ्नद् दशसहस्राणि रामः परशुनाभिभूः ॥ भृगुनन्दन परशुरामने चौदह हजार क्षत्रियोंको क्षणमात्रमें मार गिराया तथा शेष ब्रह्मद्रोहियोंका भी मूलोच्छेद करके स्नान किया। क्षत्रियोंसे पीड़ित होकर ब्राह्मणोंने ‘राम-राम’ कहकर आर्तनाद किया था; इसीलिये सर्वविजयी परशुरामने पुनः फरसेसे दस हजार क्षत्रियोंका अन्त किया।
न हृमृष्यत तां वाचमार्तैर्भृशमुदीरिताम् । भृगो रामाभिधावेति यदाक्रन्दन् द्विजातयः ॥ जिस समय द्विजलोग ‘भृगुनन्दन परशुराम! दौड़ो, बचाओ’ इत्यादि बातें कहकर करुणक्रन्दन करते, उस समय उन पीड़ितोंद्वारा कही हुई वह आर्तवाणी परशुरामजी नहीं सहन कर सके।
काश्मीरान् दरदान् कुन्तीन् क्षुद्रकान् मालवाञ्छकान् । चेदिकाशिकरूषांश्च ऋषिकान् क्रथकैशिकान् ॥ अङ्गान् वङ्गान् कलिङ्गांश्च मागधान् काशिकोसलान् । रात्रायणान् वीतिहोत्रान् किरातान् मार्तिकावतान् ॥ एतानन्यांश्च राजेन्द्रान् देशे देशे सहस्रशः । निकृत्य निशितैर्बाणैः सम्प्रदाय विवस्वते ॥ उन्होंने काश्मीर, दरद, कुन्तिभोज, क्षुद्रक, मालव, शक, चेदि, काशि, करूष, ऋषिक, क्रथ, कैशिक, अंग, वंग, कलिंग, मागध, काशी, कोसल, रात्रायण, वीतिहोत्र, किरात तथा मार्तिकावत—इनको तथा अन्य सहस्रों राजेश्वरोंको प्रत्येक देशमें तीखे बाणोंसे मारकर यमराजके भेंट कर दिया।
कीर्णा क्षत्रियकोटीभिः मेरुमन्दरभूषणा । त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी तेन निःक्षत्रिया कृता ॥ मेरु और मन्दर पर्वत जिसके आभूषण हैं, वह पृथिवी करोड़ों क्षत्रियोंकी लाशोंसे पट गयी। एक-दो बार नहीं, इक्कीस बार परशुरामने यह पृथिवी क्षत्रियोंसे सूनी कर दी।
एवमिष्ट्वा महाबाहुः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । अन्यद् वर्षशतं रामः सौभे शाल्वमयोधयत् ॥ ततः स भृगुशार्दूलस्तं सौभं योधयन् प्रभुः । सुबन्धुरं रथं राजन्नास्थाय भरतर्षभ ॥ नग्निकानां कुमारीणां गायन्तीनामुपाशृणोत् । तदनन्तर महाबाहु परशुरामने प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करके सौ वर्षोंतक सौभ नामक विमानपर बैठे हुए राजा शाल्वके साथ युद्ध किया। भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर!
तदनन्तर सुन्दर रथपर बैठकर सौभ विमानके साथ युद्ध करनेवाले शक्तिशाली वीर भृगुश्रेष्ठ परशुरामने गीत गाती हुई नग्निका* कुमारियोंके मुखसे यह सुना—
राम राम महाबाहो भृगूणां कीर्तिवर्धन ।
त्यज शस्त्राणि सर्वाणि न त्वं सौभं वधिष्यसि ॥
चक्रहस्तो गदापाणिर्भीतानामभयंकरः ।
युधि प्रद्युम्नसाम्बाभ्यां कृष्णः सौभं वधिष्यति ॥
‘राम! राम! महाबाहो! तुम भृगुवंशकी कीर्ति बढ़ानेवाले हो; अपने सारे अस्त्र-शस्त्र नीचे डाल दो। तुम सौभ विमानका नाश नहीं कर सकोगे। भयभीतोंको अभय देनेवाले चक्रधारी गदापाणि भगवान् श्रीविष्णु प्रद्युम्न और साम्बको साथ लेकर युद्धमें सौभ विमानका नाश करेंगे’।
तच्छ्रुत्वा पुरुषव्याघ्रस्तत एव वनं ययौ ।
न्यस्य सर्वाणि शस्त्राणि कालकाङ्क्षी महायशाः ॥
रथं वर्मायुधं चैव शरान् परशुमेव च ।
धनूंष्यप्सु प्रतिष्ठाप्य राजंस्तेपे परं तपः ॥
यह सुनकर पुरुषसिंह परशुराम उसी समय वनको चल दिये। राजन्! वे महायशस्वी मुनि कृष्णावतारके समयकी प्रतीक्षा करते हुए अपने सारे अस्त्र-शस्त्र, रथ, कवच, आयुध बाण, परशु और धनुष जलमें डालकर बड़ी भारी तपस्यामें लग गये।
ह्रियं प्रज्ञां श्रियं कीर्तिं लक्ष्मीं चामित्रकर्शनः ।
पञ्चाधिष्ठाय धर्मात्मा तं रथं विससर्ज ह ॥
शत्रुओंका नाश करनेवाले धर्मात्मा परशुरामने लज्जा, प्रज्ञा, श्री, कीर्ति और लक्ष्मी— इन पाँचोंका आश्रय लेकर अपने पूर्वोक्त रथको त्याग दिया।
आदिकाले प्रवृत्तं हि विभजन् कालमीश्वरः ।
नाहनच्छ्रद्धया सौभं न ह्यशक्तो महायशाः ॥
जामदग्न्य इति ख्यातो यस्त्वसौ भगवानृषिः ।
सोऽस्य भागस्तपस्तेपे भार्गवो लोकविश्रुतः ॥
शृणु राजंस्तथा विष्णोः प्रादुर्भावं महात्मनः ।
चतुर्विंशे युगे चापि विश्वामित्रपुरःसरः ॥
आदिकालमें जिसकी प्रवृत्ति हुई थी, उस कालका विभाग करके भगवान् परशुरामने कुमारियोंकी बातपर श्रद्धा होनेके कारण ही सौभ विमानका नाश नहीं किया, असमर्थताके कारण नहीं। जमदग्निनन्दन परशुरामके नामसे विख्यात वे महर्षि, जो विश्वविदित ऐश्वर्यशाली महर्षि हैं, वे इन्हीं श्रीकृष्णके अंश हैं, जो इस समय तपस्या कर रहे हैं। राजन्! अब महात्मा भगवान् विष्णुके साक्षात् स्वरूप श्रीरामके अवतारका वर्णन सुनो, जो विश्वामित्र मुनिको आगे करके चलनेवाले थे।
तिथौ नावमिके जज्ञे तथा दशरथादपि ।
कृत्वाऽऽत्मानं महाबाहुश्चतुर्धा विष्णुरव्ययः ॥
चैत्रमासके शुक्लपक्षकी नवमी तिथिको अविनाशी भगवान् महाबाहु विष्णुने अपने-आपको चार स्वरूपोंमें विभक्त करके महाराज दशरथके सकाशसे अवतार ग्रहण किया था।
लोके राम इति ख्यातस्तेजसा भास्करोपमः ।
प्रसादनार्थं लोकस्य विष्णुस्तस्य सनातनः ॥
धर्मार्थमेव कौन्तेय जज्ञे तत्र महायशाः ।
वे भगवान् सूर्यके समान तेजस्वी राजकुमार लोकमें श्रीरामके नामसे विख्यात हुए। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! जगत्को प्रसन्न करने तथा धर्मकी स्थापनाके लिये ही महायशस्वी सनातन भगवान् विष्णु वहाँ प्रकट हुए थे।
तमप्याहुर्मनुष्येन्द्रं सर्वभूतपतेस्तनुम् ॥
यज्ञविघ्नं तदा कृत्वा विश्वामित्रस्य भारत ।
सुबाहुर्निहतस्तेन मारीचस्ताडितो भृशम् ॥
मनुष्योंके स्वामी भगवान् श्रीरामको साक्षात् सर्वभूतपति श्रीहरिका ही स्वरूप बतलाया जाता है। भारत! उस समय विश्वामित्रके यज्ञमें विघ्न डालनेके कारण राक्षस सुबाहु श्रीरामचन्द्रजीके हाथों मारा गया और मारीच नामक राक्षसको भी बड़ी चोट पहुँची।
तस्मै दत्तानि शस्त्राणि विश्वामित्रेण धीमता ।
वधार्थं देवशत्रूणां दुर्वारणि सुरैरपि ॥
परम बुद्धिमान् विश्वामित्र मुनिने देवशत्रु राक्षसोंका वध करनेके लिये श्रीरामचन्द्रजीको ऐसे-ऐसे दिव्यास्त्र प्रदान किये थे, जिनका निवारण करना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन था।
वर्तमाने तदा यज्ञे जनकस्य महात्मनः ।
भग्नं माहेश्वरं चापं क्रीडता लीलया परम् ॥
ततो विवाहं सीतायाः कृत्वा स रघुवल्लभः ।
नगरीं पुनरासाद्य मुमुदे तत्र सीतया ॥
उन्हीं दिनों महात्मा जनकके यहाँ धनुषयज्ञ हो रहा था, उसमें श्रीरामने भगवान् शंकरके महान् धनुषको खेल-खेलमें ही तोड़ डाला। तदनन्तर सीताजीके साथ विवाह करके रघुनाथजी अयोध्यापुरीमें लौट आये और वहाँ सीताजीके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे।
कस्यचित् त्वथ कालस्य पित्रा तत्राभिचोदितः ।
कैकेय्याः प्रियमन्विच्छन् वनमभ्यवपद्यत ॥
कुछ कालके पश्चात् पिताकी आज्ञा पाकर वे अपनी विमाता महारानी कैकेयीका प्रिय करनेकी इच्छासे वनमें चले गये।
यः समाः सर्वधर्मज्ञश्चतुर्दश वने वसन् ।
लक्ष्मणानुचरो रामः सर्वभूतहिते रतः ॥
चतुर्दश वने तप्त्वा तपो वर्षाणि भारत ।
रूपिणी यस्य पार्श्वस्था सीतेत्यभिहिता जनैः ॥
वहाँ सब धर्मोंके ज्ञाता और समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणके साथ चौदह वर्षोंतक वनमें निवास किया। भरतवंशी राजन्! चौदह वर्षोंतक उन्होंने वनमें तपस्यापूर्वक जीवन बिताया। उनके साथ उनकी अत्यन्त रूपवती धर्मपत्नी भी थीं, जिन्हें लोग सीता कहते थे।
पूर्वोचितत्वात् सा लक्ष्मीर्भर्तारमनुगच्छति ।
जनस्थाने वसन् कार्यं त्रिदशानां चकार सः ॥
मारीचं दूषणं हत्वा खरं त्रिशिरसं तथा ।
चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां घोरकर्मणाम् ॥
जघान रामो धर्मात्मा प्रजानां हितकाम्यया ।
अवतारके पहले श्रीविष्णुरूपमें रहते समय भगवान्के साथ उनकी जो योग्यतमा भार्या लक्ष्मी रहा करती हैं, उन्होंने ही उपयुक्त होनेके कारण श्रीरामावतारके समय सीताके रूपमें अवतीर्ण हो अपने पतिदेवका अनुसरण किया था। भगवान् श्रीराम जनस्थानमें रहकर देवताओंके कार्य सिद्ध करते थे। धर्मात्मा श्रीरामने प्रजाजनोंके हितकी कामनासे भयानक कर्म करनेवाले चौदह हजार राक्षसोंका वध किया। जिनमें मारीच, खर-दूषण और त्रिशिरा आदि प्रधान थे।
विराधं च कबन्धं च राक्षसौ क्रूरकर्मिणौ ॥
जघान च तदा रामो गन्धर्वौ शापविक्षतौ ॥
उन्हीं दिनों दो शापग्रस्त गन्धर्व क्रूरकर्मा राक्षसोंके रूपमें वहाँ रहते थे, जिनके नाम विराध और कबन्ध थे। श्रीरामने उन दोनोंका भी संहार कर डाला।
स रावणस्य भगिनीनासाच्छेदं चकार ह ।
भार्यावियोगं तं प्राप्य मृगयन् व्यचरद् वनम् ॥
ततस्तमृष्यमूकं स गत्वा पम्पामतीत्य च ।
सुग्रीवं मारुतिं दृष्ट्वा चक्रे मैत्रीं तयोः स वै ॥
उन्होंने रावणकी बहिन शूर्पणखाकी नाक भी लक्ष्मणके द्वारा कटवा दी; इसीके कारण (राक्षसोंके षड्यन्त्रसे) उन्हें पत्नीका वियोग देखना पड़ा। तब वे सीताकी खोज करते हुए वनमें विचरने लगे। तदनन्तर ऋष्यमूक पर्वतपर जा पम्पासरोवरको लाँघकर श्रीरामजी सुग्रीव और हनुमान्जीसे मिले और उन दोनोंके साथ उन्होंने मैत्री स्थापित कर ली।
अथ गत्वा स किष्किन्धां सुग्रीवेण तदा सह ।
निहत्य वालिनं युद्धे वानरेन्द्रं महाबलम् ।।
अभ्यषिञ्चत् तदा रामः सुग्रीवं वानरेश्वरम् ।
ततः स वीर्यवान् राजंस्त्वरयन् वै समुत्सुकः ।
विचित्य वायुपुत्रेण लङ्कादेशं निवेदितम् ।।
तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीने सुग्रीवके साथ किष्किन्धामें जाकर महाबली वानरराज बालीको युद्धमें मारा और सुग्रीवको वानरोंके राजाके पदपर अभिषिक्त कर दिया। राजन्! तदनन्तर पराक्रमी श्रीराम सीताजीके लिये उत्सुक हो बड़ी उतावलीके साथ उनकी खोज कराने लगे। वायुपुत्र हनुमान्जीने पता लगाकर यह बतलाया कि सीताजी लंकामें हैं।
सेतुं बद्ध्वा समुद्रस्य वानरैः सहितस्तदा ।
सीतायाः पदमन्विच्छन् रामो लङ्कां विवेश ह ।।
तब समुद्रपर पुल बाँधकर वानरोंसहित श्रीरामने सीताजीके स्थानका पता लगाते हुए लंकामें प्रवेश किया।
देवोरगगणानां हि यक्षराक्षसपक्षिणाम् ।
तत्रावध्यं राक्षसेन्द्रं रावणं युधि दुर्जयम् ।।
युक्तं राक्षसकोटीभिर्भिन्नाञ्जनचयोपमम् ।
वहाँ देवता, नागगण, यक्ष, राक्षस तथा पक्षियोंके लिये अवध्य और युद्धमें दुर्जय राक्षसराज रावण करोड़ों राक्षसोंके साथ रहता था। वह देखनेमें खानसे खोदकर निकाले हुए कोयलेके ढेरके समान जान पड़ता था।
दुर्निरीक्ष्यं सुरगणैर्वरदानेन दर्पितम् ।
जघान सचिवैः सार्धं सान्वयं रावणं रणे ।
त्रैलोक्यकण्टकं वीरं महाकायं महाबलम् ।।
रावणं सगणं हत्वा रामो भूतपतिः पुरा ।।
लङ्कायां तं महात्मानं राक्षसेन्द्रं विभीषणम् ।
अभिषिच्य च तत्रैव अमरत्वं ददौ तदा ।।
देवताओंके लिये उसकी ओर आँख उठाकर देखना भी कठिन था। ब्रह्माजीसे वरदान मिलनेसे उसका घमंड बहुत बढ़ गया था। श्रीरामने त्रिलोकीके लिये कण्टकरूप महाबली विशालकाय वीर रावणको उसके मन्त्रियों और वंशजोंसहित युद्धमें मार डाला। इस प्रकार सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी श्रीरघुनाथजीने प्राचीन कालमें रावणको सेवकोंसहित मारकर लंकाके राज्यपर राक्षसपति महात्मा विभीषणका अभिषेक करके उन्हें वहीं अमरत्व प्रदान किया।
आरुह्य पुष्पकं रामः सीतामादाय पाण्डव ।
सबलः स्वपुरं गत्वा धर्मराज्यमपालयत् ।।
दानवो लवणो नाम मधोः पुत्रो महाबलः । शत्रुघ्नेन हतो राजंस्ततो रामस्य शासनात् ॥ पाण्डुनन्दन! तत्पश्चात् श्रीरामने पुष्पक विमानपर आरूढ़ हो सीताको साथ ले दलबलसहित अपनी राजधानीमें जाकर धर्मपूर्वक राज्यका पालन किया। राजन्! उन्हीं दिनों मथुरामें मधुका पुत्र लवण नामक दानव राज्य करता था, जिसे रामचन्द्रजीकी आज्ञासे शत्रुघ्नने मार डाला। एवं बहूनि कर्माणि कृत्वा लोकहिताय सः । राज्यं चकार विधिवद् रामो धर्मभृतां वरः ॥ इस प्रकार धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने लोकहितके लिये बहुत-से कार्य करके विधिपूर्वक राज्यका पालन किया। दशाश्वमेधानाजह्रे जारुधिस्थान् निरर्गलान् ॥ नाश्रूयन्ताशुभा वाचो नात्ययः प्राणिनां तदा । न वित्तजं भयं चासीद् रामे राज्यं प्रशासति ॥ प्राणिनां च भयं नासीज्जलानलविधानजम् । पर्यदेवन्न विधवा नानाथाः काश्चनाभवन् ॥ उन्होंने दस अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया और सरयूतटके जारुधिप्रदेशको विघ्न-बाधाओंसे रहित कर दिया। श्रीरामचन्द्रजीके शासनकालमें कभी कोई अमंगल-की बात नहीं सुनी गयी। उस समय प्राणियोंकी अकालमृत्यु नहीं होती थी और किसीको भी धनकी रक्षा आदिके निमित्त भय नहीं प्राप्त होता था। संसारके जीवोंको जल और अग्नि आदिसे भी भय नहीं होता था। विधवाओंका करुण क्रन्दन नहीं सुना जाता था तथा स्त्रियाँ अनाथ नहीं होती थीं। सर्वमासीत् तदा तृप्तं रामे राज्यं प्रशासति । न संकरकरा वर्णा नाकृष्टकरकृज्जनः ॥ श्रीरामचन्द्रजीके राज्यशासनकालमें सम्पूर्ण जगत् संतुष्ट था। किसी भी वर्णके लोग वर्णसंकर संतान नहीं उत्पन्न करते थे। कोई भी मनुष्य ऐसी जमीनके लिये कर नहीं देता था, जो जोतने-बोनेके काममें न आती हो। न च स्म वृद्धा बालानां प्रेतकार्याणि कुर्वते ॥ विशः पर्यचरन् क्षत्रं क्षत्रं नापीडयद् विशः । नरा नात्यचरन् भार्या भार्या नात्यचरन् पतीन् ॥ नासीदल्पकृषिर्लोके रामे राज्यं प्रशासति । आसन् वर्षसहस्राणि तथा पुत्रसहस्रिणः । अरोगाः प्राणिनोऽप्यासन् रामे राज्यं प्रशासति ॥
बूढ़ेलोग बालकोंका अन्त्येष्टि-संस्कार नहीं करते थे (उनके सामने ऐसा अवसर ही नहीं आता था)। वैश्यलोग क्षत्रियोंकी परिचर्या करते थे और क्षत्रियलोग भी वैश्योंको कष्ट नहीं होने देते थे। पुरुष अपनी पत्नियोंकी अवहेलना नहीं करते थे और पत्नियाँ भी पतियोंकी अवहेलना नहीं करती थीं। श्रीरामचन्द्रजीके राज्य-शासन करते समय लोकमें खेतीकी उपज कम नहीं होती थी। लोग सहस्र पुत्रोंसे युक्त होकर सहस्रों वर्षोंतक जीवित रहते थे। श्रीरामके राज्य-शासनकालमें सब प्राणी नीरोग थे।
ऋषीणां देवतानां च मनुष्याणां तथैव च ।
पृथिव्यां सहवासोऽभूद् रामे राज्यं प्रशासति ॥
सर्वे ह्यासंस्तृप्तरूपास्तदा तस्मिन् विशाम्पते ।
धर्मेण पृथिवीं सर्वामनुशासति भूमिपे ॥
श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें इस पृथ्वीपर ऋषि, देवता और मनुष्य साथ-साथ रहते थे। राजन्! भूमिपाल श्रीरघुनाथजी जिन दिनों सारी पृथ्वीका शासन करते थे, उस समय उनके राज्यमें सब लोग पूर्णतः तृप्तिका अनुभव करते थे।
तपस्येवाभवन् सर्वे सर्वे धर्ममनुव्रताः ।
पृथिव्यां धार्मिके तस्मिन् रामे राज्यं प्रशासति ॥
धर्मात्मा राजा रामके राज्यमें पृथ्वीपर सब लोग तपस्यामें ही लगे रहते थे और सब-के-सब धर्मानुरागी थे।
नाधर्मिष्ठो नरः कश्चिद् बभूव प्राणिनां क्वचित् ।
प्राणापानौ समावास्तां रामे राज्यं प्रशासति ॥
श्रीरामके राज्य-शासनकालमें कोई भी मनुष्य अधर्ममें प्रवृत्त नहीं होता था। सबके प्राण और अपान समवृत्तिमें स्थित थे।
गाथामप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जनाः ।
श्यामो युवा लोहिताक्षो मातङ्गानामिवर्षभः ॥
आजानुबाहुः सुमुखः सिंहस्कन्धो महाबलः ।
दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च ॥
राज्यं भोगं च सम्प्राप्य शशास पृथिवीमिमाम् ।
जो पुराणवेत्ता विद्वान् हैं, वे इस विषयमें निम्नांकित गाथा गाया करते हैं—'भगवान् श्रीरामकी अंगकान्ति श्याम है, युवावस्था है, उनके नेत्रोंमें कुछ-कुछ लाली है। वे गजराज-जैसे पराक्रमी हैं। उनकी भुजाएँ घुटनोंतक लंबी हैं। मुख बहुत सुन्दर है। कंधे सिंहके समान हैं और वे महान् बलशाली हैं। उन्होंने राज्य और भोग पाकर ग्यारह हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीका शासन किया।
रामो रामो राम इति प्रजानामभवन् कथाः ॥
रामभूतं जगदिदं रामे राज्यं प्रशासति ।
ऋग्यजुःसामहीनाश्च न तदासन् द्विजातयः ॥
प्रजाजनोंमें 'राम राम राम' इस प्रकार केवल रामकी ही चर्चा होती थी। रामके राज्य-शासनकालमें यह सारा जगत् राममय हो रहा था। उस समयके द्विज ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके ज्ञानसे शून्य नहीं थे।
उषित्वा दण्डके कार्यं त्रिदशानां चकार सः ।
पूर्वापकारिणं संख्ये पौलस्त्यं मनुजर्षभः ॥
देवगन्धर्वनागानामरिं स निजघान ह ।
सत्त्ववान् गुणसम्पन्नो दीप्यमानः स्वतेजसा ॥
एवमेव महाबाहुरिक्ष्वाकुकुलवर्धनः ॥
इस प्रकार मनुष्योंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने दण्डकारण्यमें निवास करके देवताओंका कार्य सिद्ध किया और पहलेके अपराधी पुलस्त्यनन्दन रावणको, जो देवताओं, गन्धर्वों और नागोंका शत्रु था, युद्धमें मार गिराया। इक्ष्वाकुकुलका अभ्युदय करनेवाले महाबाहु श्रीराम महान् पराक्रमी, सर्वगुणसम्पन्न और अपने तेजसे देदीप्यमान थे।
रावणं सगणं हत्वा दिवमाक्रमताभिभूः ।
इति दाशरथेः ख्यातः प्रादुर्भावो महात्मनः ॥
वे इसी प्रकार सेवकोंसहित रावणका वध करके राज्यपालनके पश्चात् साकेतलोकमें पधारे। इस प्रकार परमात्मा दशरथनन्दन श्रीरामके अवतारका वर्णन किया गया।
(कृष्णावतारः)
ततः कृष्णो महाबाहुर्भीतानामभयङ्करः ।
अष्टाविंशे युगे राजन् जज्ञे श्रीवत्सलक्षणः ॥
राजन्! तदनन्तर अब अट्ठाईसवें द्वापरमें भय-भीतोंको अभय देनेवाले श्रीवत्सविभूषित महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णके रूपमें श्रीविष्णुका अवतार हुआ है।
पेशलश्च वदान्यश्च लोके बहुमतो नृषु ।
स्मृतिमान् देशकालज्ञः शङ्खचक्रगदासिधृक् ॥
ये इस लोकमें परम सुन्दर, उदार, मनुष्योंमें अत्यन्त सम्मानित, स्मरणशक्तिसे सम्पन्न, देशकालके ज्ञाता एवं शंख, चक्र, गदा और खड्ग आदि आयुध धारण करनेवाले हैं।
वासुदेव इति ख्यातो लोकानां हितकृत् सदा ।
वृष्णीनां च कुले जातो भूमेः प्रियचिकीर्षया ॥
वासुदेवके नामसे इनकी प्रसिद्धि है। ये सदा सब लोगोंके हितमें संलग्न रहते हैं। भूदेवीका प्रिय कार्य करनेकी इच्छासे इन्होंने वृष्णिवंशमें अवतार ग्रहण किया है।
स नृणामभयं दाता मधुहेति स विश्रुतः ।
शकटार्जुनरामाणां किल स्थानान्यसूदयत् ॥
ये ही मनुष्योंको अभयदान करनेवाले हैं। इन्हींकी मधुसूदन नामसे प्रसिद्धि है। इन्होंने ही शकटासुर, यमलार्जुन और पूतनाके मर्मस्थानोंमें आघात करके उनका संहार किया है।
कंसादीन् निजघानाजौ दैत्यान् मानुषविग्रहान् ।
अयं लोकहितार्थाय प्रादुर्भावो महात्मनः ॥
मनुष्य-शरीरमें प्रकट हुए कंस आदि दैत्योंको युद्धमें मार गिराया। परमात्माका यह अवतार भी लोकहितके लिये ही हुआ है।
(कल्क्यवतारः)
कल्की विष्णुयशा नाम भूयश्चोत्पत्स्यते हरिः ।
कलेर्युगान्ते सम्प्राप्ते धर्मे शिथिलतां गते ।।
पाखण्डिनां गणानां हि वधार्थं भरतर्षभः ।
धर्मस्य च विवृद्ध्यर्थं विप्राणां हितकाम्यया ।।
कलियुगके अन्तमें जब धर्म शिथिल हो जायगा, उस समय भगवान् श्रीहरि पाखण्डियोंके वध तथा धर्मकी वृद्धिके लिये और ब्राह्मणोंके हितकी कामनासे पुनः अवतार लेंगे। उनके उस अवतारका नाम होगा ‘कल्कि विष्णुयशा’।
एते चान्ये च बहवो दिव्या देवगणैर्युताः ।
प्रादुर्भावाः पुराणेषु गीयन्ते ब्रह्मवादिभिः ।।
भगवान्के ये तथा और भी बहुत-से दिव्य अवतार देवगणोंके साथ होते हैं, जिनका ब्रह्मवादी पुरुष पुराणोंमें वर्णन करते हैं।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[श्रीकृष्णका प्राकट्य तथा श्रीकृष्ण-बलरामकी बाललीलाओंका वर्णन]
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तोऽथ कौन्तेयस्ततः पौरवनन्दनः ।
आबभाषे पुनर्भीष्मं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भीष्मजीके इस प्रकार कहनेपर पूरुवंशको आनन्दित करनेवाले कुन्तीकुमार धर्मराज युधिष्ठिरने पुनः उनसे कहा।
युधिष्ठिर उवाच
भूय एव मनुष्येन्द्र उपेन्द्रस्य यशस्विनः ।
जन्म वृष्णिषु विज्ञातुमिच्छामि वदतां वर ॥
**युधिष्ठिर बोले—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ नरेन्द्र! मैं यशस्वी भगवान् विष्णुके वृष्णिवंशमें अवतार ग्रहण करनेका वृत्तान्त पुनः (विस्तारपूर्वक) जानना चाहता हूँ।
यथैव भगवाञ्जातः क्षिताविह जनार्दनः ।
माधवेषु महाबुद्धिस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
पितामह! परम बुद्धिमान् भगवान् जनार्दन इस पृथ्वीपर मधुवंशमें जिस प्रकार उत्पन्न हुए, वह सब प्रसंग मुझसे कहिये।
यदर्थं च महातेजा गास्तु गोवृभेक्षणः ।
ररक्ष कंसस्य वधाल्लोकानामभिरक्षिता ॥
बैलके समान विशाल नेत्रोंवाले लोकरक्षक महा-तेजस्वी श्रीकृष्णने किसलिये कंसका वध करके गौओंकी रक्षा की?
क्रीडता चैव यद् बाल्ये गोविन्देन विचेष्टितम् ।
तदा मतिमतां श्रेष्ठ तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ पितामह! उस समय बाल्यावस्थामें बालकोचित क्रीड़ाएँ करते समय भगवान् गोविन्दने क्या-क्या लीलाएँ कीं? यह सब मुझे बताइये।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्ततो भीष्मः केशवस्य महात्मनः ।
माधवेषु तदा जन्म कथयामास वीर्यवान् ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजा युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर महापराक्रमी भीष्मने मधुवंशमें भगवान् केशवके अवतार लेनेकी कथा कहनी प्रारम्भ की।
भीष्म उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि युधिष्ठिर यथातथम् ।
यतो नारायणस्येह जन्म वृष्णिषु कौरव ॥
**भीष्मजी बोले—**कुरुरत्न युधिष्ठिर! अब मैं वृष्णिवंशमें भगवान् नारायणके अवतार-ग्रहणका यथावत् वृत्तान्त कहूँगा। अजातशत्रो जातस्तु यथैष भुवि भूमिपः । कीर्त्यमानं मया तात निबोध भरतर्षभ ।। भरतकुलभूषण तात अजातशत्रो! वसुधाकी रक्षा करनेवाले ये भगवान् यहाँ किस प्रकार प्रकट हुए? यह मैं बतला रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो। सागराः समकम्पन्त मुदा चेलुश्च पर्वताः । जज्वलुश्चाग्नयः शान्ता जायमाने जनार्दने ।। भगवान्के जन्मके समय आनन्दोद्रेकके कारण समुद्रमें उत्ताल तरंगें उठने लगीं, पर्वत हिलने लगे और बुझी हुई अग्नियाँ भी सहसा प्रज्वलित हो उठीं। शिवाः सम्प्रववुर्वाताः प्रशान्तमभवद् रजः । ज्योतींषि सम्प्रकाशन्ते जायमाने जनार्दने ।। भगवान् जनार्दनके जन्मकालमें शीतल, मन्द एवं सुखद वायु चलने लगी। धरतीकी धूल शान्त हो गयी और नक्षत्र प्रकाशित होने लगे। देवदुन्दुभयश्चापि सस्वनुर्भृशमम्बरे । अभ्यवर्षंस्तदाऽऽगम्य देवताः पुष्पवृष्टिभिः ।। आकाशमें देवलोकके नगाड़े जोर-जोरसे बजने लगे और देवगण आ-आकर वहाँ फूलोंकी वर्षा करने लगे। गीर्भिर्मङ्गलयुक्ताभिरस्तुवन् मधुसूदनम् । उपतस्थुस्तदा प्रीताः प्रादुर्भावे महर्षयः ।। वे मंगलमयी वाणीद्वारा भगवान् मधुसूदनकी स्तुति करने लगे। भगवान्के अवतारका समय जान महर्षिगण भी अत्यन्त प्रसन्न होकर वहाँ आ पहुँचे। ततस्तानभिसम्प्रेक्ष्य नारदप्रमुखानृषीन् । उपानृत्यन्नुपजगुर्गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।। नारद आदि देवर्षियोंको उपस्थित देख गन्धर्व और अप्सराएँ नाचने और गाने लगीं। उपतस्थे च गोविन्दं सहस्राक्षः शचीपतिः । अभ्यभाषत तेजस्वी महर्षीन् पूजयंस्तदा ।। उस समय सहस्र नेत्रोंवाले शचीवल्लभ तेजस्वी इन्द्र भगवान् गोविन्दकी सेवामें उपस्थित हुए और महर्षियोंका आदर करते हुए बोले।
इन्द्र उवाच कृत्यानि देवकार्याणि कृत्वा लोकहिताय च । स्वलोकं लोककृद् देव पुनर्गच्छ स्वतेजसा ।।
**इन्द्रने कहा—**देव! आप सम्पूर्ण जगत्के स्रष्टा हैं। देवताओंके जो कर्तव्य कार्य हैं, उन सबको सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये सिद्ध करके आप अपने तेजसहित पुनः परमधामको पधारिये।
भीष्म उवाच
इत्युक्त्वा मुनिभिः सार्धं जगाम त्रिदिवेश्वरः ।
**भीष्मजी कहते हैं—**ऐसा कहकर स्वर्गलोकके स्वामी इन्द्र देवर्षियोंके साथ अपने लोकको चले गये।
वसुदेवस्ततो जातं बालमादित्यसंनिभम् ।
नन्दगोपकुले राजन् भयात् प्राच्छादयद्धरिम् ।।
राजन्! तदनन्तर वसुदेवजीने कंसके भयसे सूर्यके समान तेजस्वी अपने नवजात बालक श्रीहरिको नन्दगोपके घरमें छिपा दिया।
नन्दगोपकुले कृष्ण उवास बहुलाः समाः ।
ततः कदाचित् सुप्तं तं शकटस्य त्वधः शिशुम् ।।
यशोदा सम्परित्यज्य जगाम यमुनां नदीम् ।
श्रीकृष्ण बहुत वर्षोंतक नन्दगोपके ही घरमें रहे। एक दिन वहाँ शिशु श्रीकृष्ण एक छकड़ेके नीचे सोये थे। माता यशोदा उन्हें वहीं छोड़कर यमुनाजीके तटपर चली गयीं। शिशुलीलां ततः कुर्वन् स्वहस्तचरणौ क्षिपन् ।। रुरोद मधुरं कृष्णः पादावूर्ध्वं प्रसारयन् । पादाङ्गुष्ठेन शकटं धारयन्नथ केशवः ।। तत्राथैकेन पादेन पातयित्वा तथा शिशुः । उस समय श्रीकृष्ण शिशुलीलाका प्रदर्शन करते हुए अपने हाथ-पैर फेंक-फेंककर मधुर स्वरमें रोने लगे। पैरोंको ऊपर फेंकते समय भगवान् केशवने अपने पैरके अंगूठेसे छकड़ेको धक्का दे दिया और इस प्रकार एक ही पाँवसे छकड़ेको उलटकर गिरा दिया। न्युब्जः पयोधराकाङ्क्षी चकार च रुरोद च ।। पातितं शकटं दृष्ट्वा भिन्नभाण्डघटीघटम् । जनास्ते शिशुना तेन विस्मयं परमं ययुः ।। उसके बाद वे स्वयं औंधे मुँह हो गये और माताका स्तन पीनेकी इच्छासे जोर-जोरसे रोने लगे। शिशुके ही पदाघातसे छकड़ा उलटकर गिर गया तथा उसपर रखे हुए सभी मटके और घड़े आदि बर्तन चकनाचूर हो गये। यह देखकर सब लोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ। प्रत्यक्षं शूरसेनानां दृश्यते महदद्भुतम् । पूतना चापि निहता महाकाया महास्तनी ।। पश्यतां सर्वदेवानां वासुदेवेन भारत । भरतनन्दन! शूरसेनदेश (मथुरामण्डल)-के निवासियोंको यह अत्यन्त अद्भुत घटना प्रत्यक्ष दिखायी दी तथा वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने (आकाशमें स्थित) सब देवताओंके देखते-देखते महाकाय एवं विशाल स्तनोंवाली पूतनाको भी पहले मार डाला था। ततः काले महाराज संसक्तौ रामकेशवौ ।। विष्णुः सङ्कर्षणश्चोभौ रिङ्गिणौ समपद्यताम् । महाराज! तदनन्तर संकर्षण और विष्णुके स्वरूप बलराम और श्रीकृष्ण दोनों भाई कुछ कालके अनन्तर एक साथ ही घुटनोंके बल रेंगने लगे। अन्योन्यकिरणग्रस्तौ चन्द्रसूर्याविवाम्बरे ।। विसर्पयेतां सर्वत्र सर्पभोगभुजौ तदा । जैसे चन्द्रमा और सूर्य एक-दूसरेकी किरणोंसे बँधकर आकाशमें एक साथ विचरते हों, उसी प्रकार बलराम और श्रीकृष्ण सर्वत्र एक साथ चलते-फिरते थे। उनकी भुजाएँ सर्पके शरीरकी भाँति सुशोभित होती थीं। रेजतुः पांसुदिग्धाङ्गौ रामकृष्णौ तदा नृप ।। क्वचिच्च जानुभिर्घृष्टौ क्रीडमानौ क्वचिद् वने । पिबन्तौ दधिकुल्याश्च मथ्यमाने च भारत ।।
नरेश्वर! बलराम और श्रीकृष्ण दोनोंके अंग धूलि-धूसरित होकर बड़ी शोभा पाते। भारत! कभी वे दोनों भाई घुटनोंके बल चलते थे, जिससे उनमें घट्टे पड़ गये थे। कभी वे वनमें खेला करते और कभी मथते समय दहीकी घोल लेकर पीया करते थे। ततः स बालो गोविन्दो नवनीतं तदा क्षये । ग्रसमानस्तु तत्रायं गोपीभिर्ददृशेऽथ वै ॥ एक दिन बालक श्रीकृष्ण एकान्त गृहमें छिपकर माखन खा रहे थे। उस समय वहाँ उन्हें कुछ गोपियोंने देख लिया। दाम्नाथोलूखले कृष्णो गोपस्त्रीभिश्च बन्धितः । तदाथ शिशुना तेन राजंस्तावर्जुनावुभौ ॥ समूलविटपौ भग्नौ तदद्भुतमिवाभवत् । तब उन यशोदा आदि गोपांगनाओंने एक रस्सीसे श्रीकृष्णको ऊखलमें बाँध दिया। राजन्! उस समय उन्होंने उस ऊखलको यमलार्जुन वृक्षोंके बीचमें अड़ाकर उन्हें जड़ और शाखाओंसहित तोड़ डाला। वह एक अद्भुत-सी घटना घटित हुई। तत्रासुरौ महाकायौ गतप्राणौ बभूवतुः ॥ उन वृक्षोंपर दो विशालकाय असुर रहा करते थे। वे भी वृक्षोंके टूटनेके साथ ही अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे। ततस्तौ बाल्यमुत्तीर्णौ कृष्णसङ्कर्षणावुभौ । तस्मिन्नेव व्रजस्थाने सप्तवर्षौ बभूवतुः ॥ तदनन्तर वे दोनों भाई श्रीकृष्ण और बलराम बाल्यावस्थाकी सीमाको पार करके उस व्रजमण्डलमें ही सात वर्षकी अवस्थावाले हो गये। नीलपीताम्बरधरौ पतिश्वेतानुलेपनौ । बभूवतुर्वत्सपालौ काकपक्षधरावुभौ ॥ बलराम नीले रंगके और श्रीकृष्ण पीले रंगके वस्त्र धारण करते थे। एकके श्रीअंगोंपर पीले रंगका अंगराग लगता था और दूसरेके श्वेत रंगका। दोनों भाई काकपक्ष (सिरके पिछले भागमें बड़े-बड़े केश) धारण किये बछड़े चराने लगे। पर्णवाद्यं श्रुतिसुखं वादयन्तौ वराननौ । शुशुभाते वनगतावुदीर्णाविव पन्नगौ ॥ उन दोनोंकी मुखच्छवि बड़ी मनोहारिणी थी। वे वनमें जाकर श्रवण-सुखद पर्णवाद्य (पत्तोंके बाजे—पिपिहरी आदि) बजाया करते थे। वहाँ दो तरुण नागकुमारोंकी भाँति उन दोनोंकी बड़ी शोभा होती थी। मयूर्राङ्गकर्णौ तौ पल्लवापीडधारिणौ । वनमालापरिक्षिप्तौ सालपोताविवोद्गतौ ॥
वे अपने कानोंमें मोरके पंख लगा लेते, मस्तकपर पल्लवोंके मुकुट धारण करते और गलेमें वनमाला डाल लेते थे। उस समय शालके नये पौधोंकी भाँति उन दोनोंकी बड़ी शोभा होती थी।
अरविन्दकृतापीड़ौ रज्जुयज्ञोपवीतिनौ । शिक्यतुम्बधरौ वीरौ गोपवेणुप्रवादकौ ॥ वे कभी कमलके फूलोंके शिरोभूषण धारण करते और कभी बछड़ोंकी रस्सियोंको यज्ञोपवीतकी भाँति धारण कर लेते थे। वीरवर श्रीकृष्ण और बलराम छींके और तुम्बी लिये वनमें घूमते और गोपजनोचित वेणु बजाया करते थे।
क्वचिद् वसन्तावन्योन्यं क्रीडमानौ क्वचिद् वने । पर्णशय्यासु संसुप्तौ क्वचिन्निद्रान्तरैषिणौ ॥ वे दोनों भाई कहीं ठहर जाते, कहीं वनमें एक-दूसरेके साथ खेलने लगते और कहीं पत्तोंकी शय्या बिछाकर सो जाते तथा नींद लेने लगते थे।
तौ वत्सान् पालयन्तौ हि शोभयन्तौ महद् वनम् । चञ्चूर्यन्तौ रमन्तौ स्म राजन्नेवं तदा शुभौ ॥ राजन्! इस प्रकार वे मंगलमय बलराम और श्रीकृष्ण बछड़ोंकी रक्षा करते तथा उस महान् वनकी शोभा बढ़ाते हुए सब ओर घूमते और भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करते थे।
ततो वृन्दावनं गत्वा वसुदेवसुतावुभौ । गोव्रजं तत्र कौन्तेय चारयन्तौ विजह्रतुः ॥ कुन्तीनन्दन! तदनन्तर वे दोनों वसुदेवपुत्र वृन्दावनमें जाकर गौएँ चराते हुए लीला-विहार करने लगे।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[कालियमर्दन एवं धेनुकासुर, अरिष्टासुर और कंस आदिका वध, श्रीकृष्ण और बलरामका विद्याभ्यास तथा गुरुदक्षिणारूपसे गुरुजीको उनके मरे हुए पुत्रको जीवित करके देना]
भीष्म उवाच
ततः कदाचिद् गोविन्दो ज्येष्ठं सङ्कर्षणं विना । चचार तद् वनं रम्यं रम्यरूपो वराननः ॥ भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तदनन्तर एक दिन मनोहर रूप और सुन्दर मुखवाले भगवान् गोविन्द अपने बड़े भाई संकर्षणको साथ लिये बिना ही रमणीय वृन्दावनमें चले गये और वहाँ इधर-उधर भ्रमण करने लगे।
काकपक्षरः श्रीमाञ्छ्यामः पद्मानिभेक्षणः । श्रीवत्सेनोरसा युक्तः शशाङ्क इव लक्ष्मणा ॥ उन्होंने काकपक्ष धारण कर रखा था। वे परम शोभायमान, श्याम-वर्ण तथा कमलके समान सुन्दर नेत्रोंसे सुशोभित थे। जैसे चन्द्रमा कलंकसे युक्त होकर शोभा पाता है, उसी प्रकार श्रीकृष्णका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे शोभा पा रहा था।
रज्जुयज्ञोपवीती स पीताम्बरधरो युवा । श्वेतगन्धेन लिप्ताङ्गो नीलकुञ्चितमूर्धजः ॥ राजता बर्हिपत्रेण मन्दमारुतकम्पिना । क्वचिद् गायन् क्वचित् क्रीडन् क्वचिन्नृत्यन् क्वचिद्धसन् ॥ गोपवेषः स मधुरं गायन् वेणुं च वादयन् । प्रह्लादनार्थं तु गवां क्वचिद् वनगतो युवा ॥ गोकुले मेघकाले तु चचार द्युतिमान् प्रभुः । बहुरम्येषु देशेषु वनस्य वनराजिषु ॥ तासु कृष्णो मुदं लेभे क्रीडया भरतर्षभ । स कदाचिद् वने तस्मिन् गोभिः सह परिव्रजन् ॥ उन्होंने रस्सियोंको यज्ञोपवीतकी भाँति पहन रखा था। उनके श्रीअंगोंपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। विभिन्न अंगोंमें श्वेत चन्दनका अनुलेप किया गया था। उनके मस्तकपर काले-घुँघराले केश सुशोभित थे। सिरपर मोरपंखका मुकुट शोभा पाता था, जो मन्द-मन्द वायुके झोंकोंसे लहरा रहा था। भगवान् कहीं गीत गाते, कहीं क्रीड़ा करते, कहीं नाचते और कहीं हँसते थे। इस प्रकार गोपालोचित वेष धारण किये मधुर गीत गाते और वेणु बजाते हुए तरुण श्रीकृष्ण गौओंको आनन्दित करनेके लिये कभी-कभी वनमें घूमते थे। अत्यन्त कान्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण वर्षाके समय गोकुलमें वहाँके अतिशय रमणीय प्रदेशों तथा