महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1916, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ें[कालियमर्दन एवं धेनुकासुर, अरिष्टासुर और कंस आदिका वध, श्रीकृष्ण और बलरामका विद्याभ्यास तथा गुरुदक्षिणारूपसे गुरुजीको उनके मरे हुए पुत्रको जीवित करके देना]
भीष्म उवाच
ततः कदाचिद् गोविन्दो ज्येष्ठं सङ्कर्षणं विना । चचार तद् वनं रम्यं रम्यरूपो वराननः ॥ भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तदनन्तर एक दिन मनोहर रूप और सुन्दर मुखवाले भगवान् गोविन्द अपने बड़े भाई संकर्षणको साथ लिये बिना ही रमणीय वृन्दावनमें चले गये और वहाँ इधर-उधर भ्रमण करने लगे।
काकपक्षरः श्रीमाञ्छ्यामः पद्मानिभेक्षणः । श्रीवत्सेनोरसा युक्तः शशाङ्क इव लक्ष्मणा ॥ उन्होंने काकपक्ष धारण कर रखा था। वे परम शोभायमान, श्याम-वर्ण तथा कमलके समान सुन्दर नेत्रोंसे सुशोभित थे। जैसे चन्द्रमा कलंकसे युक्त होकर शोभा पाता है, उसी प्रकार श्रीकृष्णका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे शोभा पा रहा था।
रज्जुयज्ञोपवीती स पीताम्बरधरो युवा । श्वेतगन्धेन लिप्ताङ्गो नीलकुञ्चितमूर्धजः ॥ राजता बर्हिपत्रेण मन्दमारुतकम्पिना । क्वचिद् गायन् क्वचित् क्रीडन् क्वचिन्नृत्यन् क्वचिद्धसन् ॥ गोपवेषः स मधुरं गायन् वेणुं च वादयन् । प्रह्लादनार्थं तु गवां क्वचिद् वनगतो युवा ॥ गोकुले मेघकाले तु चचार द्युतिमान् प्रभुः । बहुरम्येषु देशेषु वनस्य वनराजिषु ॥ तासु कृष्णो मुदं लेभे क्रीडया भरतर्षभ । स कदाचिद् वने तस्मिन् गोभिः सह परिव्रजन् ॥ उन्होंने रस्सियोंको यज्ञोपवीतकी भाँति पहन रखा था। उनके श्रीअंगोंपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। विभिन्न अंगोंमें श्वेत चन्दनका अनुलेप किया गया था। उनके मस्तकपर काले-घुँघराले केश सुशोभित थे। सिरपर मोरपंखका मुकुट शोभा पाता था, जो मन्द-मन्द वायुके झोंकोंसे लहरा रहा था। भगवान् कहीं गीत गाते, कहीं क्रीड़ा करते, कहीं नाचते और कहीं हँसते थे। इस प्रकार गोपालोचित वेष धारण किये मधुर गीत गाते और वेणु बजाते हुए तरुण श्रीकृष्ण गौओंको आनन्दित करनेके लिये कभी-कभी वनमें घूमते थे। अत्यन्त कान्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण वर्षाके समय गोकुलमें वहाँके अतिशय रमणीय प्रदेशों तथा