महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवनश्रेणियोंमें विचरण करते थे। भरतश्रेष्ठ! उन वनश्रेणियोंमें भाँति-भाँतिके खेल करके श्यामसुन्दर बड़े प्रसन्न होते थे। एक दिन वे गौओंके साथ वनमें घूम रहे थे। भाण्डीरं नाम दृष्ट्वाथ न्यग्रोधं केशवो महान्। तच्छायायां निवासाय मतिं चक्रे तदा प्रभुः॥ घूमते-घूमते महात्मा भगवान् केशवने भाण्डीर नामक वटवृक्ष देखा और उसकी छायामें बैठनेका विचार किया। स तत्र वयसा तुल्यैः वत्सपालैः सहानघ। रेमे स दिवसान् कृष्णः पुरा स्वर्गपुरे तथा॥ निष्पाप युधिष्ठिर! वहाँ श्रीकृष्ण समान अवस्थावाले दूसरे गोपबालकोंके साथ बछड़े चराते थे, दिनभर खेल-कूद करते थे और पहले दिव्य धाममें जिस प्रकार वे आनन्दित होते थे, उसी प्रकार वनमें आनन्दपूर्वक दिन बिताते थे। तं क्रीडमानं गोपालाः कृष्णं भाण्डीरवासिनः। रमयन्ति स्म बहवो मान्यैः क्रीडनकैस्तदा॥ अन्ये स्म परिगायन्ति गोपा मुदितमानसाः। गोपालाः कृष्णमेवान्ये गायन्ति स्म वनप्रियाः॥ भाण्डीरवनमें निवास करनेवाले बहुत-से ग्वाले वहाँ क्रीड़ा करते हुए श्रीकृष्णको अच्छे-अच्छे खिलौनोंद्वारा प्रसन्न रखते थे। दूसरे प्रसन्नचित्त रहनेवाले गोप, जिन्हें वनमें घूमना प्रिय था, सदा श्रीकृष्णकी महिमाका गान किया करते थे। तेषां संगायतामेव वादयामास केशवः। पर्णवाद्यान्तरे वेणुं तुम्बं वीणां च तत्र वै॥ एवं क्रीडान्तरैः कृष्णो गोपालैर्विजहार सः। जब वे गीत गाते, उस समय भगवान् श्रीकृष्ण पत्तोंके बाजोंके बीच-बीचमें वेणु, तुम्बी और वीणा बजाया करते थे। इस प्रकार विभिन्न लीलाओंद्वारा श्रीकृष्ण गोपबालकोंके साथ खेलते थे। तेन बालेन कौन्तेय कृतं लोकहितं तदा॥ पश्यतां सर्वभूतानां वासुदेवेन भारत। भरतनन्दन! उस समय बालक श्रीकृष्णने सम्पूर्ण भूतोंके देखते-देखते लोकहितके अनेक कार्य किये। ह्रदे नीपवने तत्र क्रीडितं नागमूर्धनि॥ कालियं शासयित्वा तु सर्वलोकस्य पश्यतः। विजहार ततः कृष्णो बलदेवसहायवान्॥ वृन्दावनमें कदम्बवनके पास जो ह्रद (कुण्ड) था, उसमें प्रवेश करके उन्होंने कालियनागके मस्तक-पर नृत्यक्रीड़ा की थी। फिर सब लोगोंके सामने ही कालियनागको