भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1915

वे अपने कानोंमें मोरके पंख लगा लेते, मस्तकपर पल्लवोंके मुकुट धारण करते और गलेमें वनमाला डाल लेते थे। उस समय शालके नये पौधोंकी भाँति उन दोनोंकी बड़ी शोभा होती थी।

अरविन्दकृतापीड़ौ रज्जुयज्ञोपवीतिनौ । शिक्यतुम्बधरौ वीरौ गोपवेणुप्रवादकौ ॥ वे कभी कमलके फूलोंके शिरोभूषण धारण करते और कभी बछड़ोंकी रस्सियोंको यज्ञोपवीतकी भाँति धारण कर लेते थे। वीरवर श्रीकृष्ण और बलराम छींके और तुम्बी लिये वनमें घूमते और गोपजनोचित वेणु बजाया करते थे।

क्वचिद् वसन्तावन्योन्यं क्रीडमानौ क्वचिद् वने । पर्णशय्यासु संसुप्तौ क्वचिन्निद्रान्तरैषिणौ ॥ वे दोनों भाई कहीं ठहर जाते, कहीं वनमें एक-दूसरेके साथ खेलने लगते और कहीं पत्तोंकी शय्या बिछाकर सो जाते तथा नींद लेने लगते थे।

तौ वत्सान् पालयन्तौ हि शोभयन्तौ महद् वनम् । चञ्चूर्यन्तौ रमन्तौ स्म राजन्नेवं तदा शुभौ ॥ राजन्! इस प्रकार वे मंगलमय बलराम और श्रीकृष्ण बछड़ोंकी रक्षा करते तथा उस महान् वनकी शोभा बढ़ाते हुए सब ओर घूमते और भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करते थे।

ततो वृन्दावनं गत्वा वसुदेवसुतावुभौ । गोव्रजं तत्र कौन्तेय चारयन्तौ विजह्रतुः ॥ कुन्तीनन्दन! तदनन्तर वे दोनों वसुदेवपुत्र वृन्दावनमें जाकर गौएँ चराते हुए लीला-विहार करने लगे।

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)