भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1914

नरेश्वर! बलराम और श्रीकृष्ण दोनोंके अंग धूलि-धूसरित होकर बड़ी शोभा पाते। भारत! कभी वे दोनों भाई घुटनोंके बल चलते थे, जिससे उनमें घट्टे पड़ गये थे। कभी वे वनमें खेला करते और कभी मथते समय दहीकी घोल लेकर पीया करते थे। ततः स बालो गोविन्दो नवनीतं तदा क्षये । ग्रसमानस्तु तत्रायं गोपीभिर्ददृशेऽथ वै ॥ एक दिन बालक श्रीकृष्ण एकान्त गृहमें छिपकर माखन खा रहे थे। उस समय वहाँ उन्हें कुछ गोपियोंने देख लिया। दाम्नाथोलूखले कृष्णो गोपस्त्रीभिश्च बन्धितः । तदाथ शिशुना तेन राजंस्तावर्जुनावुभौ ॥ समूलविटपौ भग्नौ तदद्भुतमिवाभवत् । तब उन यशोदा आदि गोपांगनाओंने एक रस्सीसे श्रीकृष्णको ऊखलमें बाँध दिया। राजन्! उस समय उन्होंने उस ऊखलको यमलार्जुन वृक्षोंके बीचमें अड़ाकर उन्हें जड़ और शाखाओंसहित तोड़ डाला। वह एक अद्भुत-सी घटना घटित हुई। तत्रासुरौ महाकायौ गतप्राणौ बभूवतुः ॥ उन वृक्षोंपर दो विशालकाय असुर रहा करते थे। वे भी वृक्षोंके टूटनेके साथ ही अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे। ततस्तौ बाल्यमुत्तीर्णौ कृष्णसङ्कर्षणावुभौ । तस्मिन्नेव व्रजस्थाने सप्तवर्षौ बभूवतुः ॥ तदनन्तर वे दोनों भाई श्रीकृष्ण और बलराम बाल्यावस्थाकी सीमाको पार करके उस व्रजमण्डलमें ही सात वर्षकी अवस्थावाले हो गये। नीलपीताम्बरधरौ पतिश्वेतानुलेपनौ । बभूवतुर्वत्सपालौ काकपक्षधरावुभौ ॥ बलराम नीले रंगके और श्रीकृष्ण पीले रंगके वस्त्र धारण करते थे। एकके श्रीअंगोंपर पीले रंगका अंगराग लगता था और दूसरेके श्वेत रंगका। दोनों भाई काकपक्ष (सिरके पिछले भागमें बड़े-बड़े केश) धारण किये बछड़े चराने लगे। पर्णवाद्यं श्रुतिसुखं वादयन्तौ वराननौ । शुशुभाते वनगतावुदीर्णाविव पन्नगौ ॥ उन दोनोंकी मुखच्छवि बड़ी मनोहारिणी थी। वे वनमें जाकर श्रवण-सुखद पर्णवाद्य (पत्तोंके बाजे—पिपिहरी आदि) बजाया करते थे। वहाँ दो तरुण नागकुमारोंकी भाँति उन दोनोंकी बड़ी शोभा होती थी। मयूर्राङ्गकर्णौ तौ पल्लवापीडधारिणौ । वनमालापरिक्षिप्तौ सालपोताविवोद्गतौ ॥