भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1913, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1913

श्रीकृष्ण बहुत वर्षोंतक नन्दगोपके ही घरमें रहे। एक दिन वहाँ शिशु श्रीकृष्ण एक छकड़ेके नीचे सोये थे। माता यशोदा उन्हें वहीं छोड़कर यमुनाजीके तटपर चली गयीं। शिशुलीलां ततः कुर्वन् स्वहस्तचरणौ क्षिपन् ।। रुरोद मधुरं कृष्णः पादावूर्ध्वं प्रसारयन् । पादाङ्गुष्ठेन शकटं धारयन्नथ केशवः ।। तत्राथैकेन पादेन पातयित्वा तथा शिशुः । उस समय श्रीकृष्ण शिशुलीलाका प्रदर्शन करते हुए अपने हाथ-पैर फेंक-फेंककर मधुर स्वरमें रोने लगे। पैरोंको ऊपर फेंकते समय भगवान् केशवने अपने पैरके अंगूठेसे छकड़ेको धक्का दे दिया और इस प्रकार एक ही पाँवसे छकड़ेको उलटकर गिरा दिया। न्युब्जः पयोधराकाङ्क्षी चकार च रुरोद च ।। पातितं शकटं दृष्ट्वा भिन्नभाण्डघटीघटम् । जनास्ते शिशुना तेन विस्मयं परमं ययुः ।। उसके बाद वे स्वयं औंधे मुँह हो गये और माताका स्तन पीनेकी इच्छासे जोर-जोरसे रोने लगे। शिशुके ही पदाघातसे छकड़ा उलटकर गिर गया तथा उसपर रखे हुए सभी मटके और घड़े आदि बर्तन चकनाचूर हो गये। यह देखकर सब लोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ। प्रत्यक्षं शूरसेनानां दृश्यते महदद्भुतम् । पूतना चापि निहता महाकाया महास्तनी ।। पश्यतां सर्वदेवानां वासुदेवेन भारत । भरतनन्दन! शूरसेनदेश (मथुरामण्डल)-के निवासियोंको यह अत्यन्त अद्भुत घटना प्रत्यक्ष दिखायी दी तथा वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने (आकाशमें स्थित) सब देवताओंके देखते-देखते महाकाय एवं विशाल स्तनोंवाली पूतनाको भी पहले मार डाला था। ततः काले महाराज संसक्तौ रामकेशवौ ।। विष्णुः सङ्कर्षणश्चोभौ रिङ्गिणौ समपद्यताम् । महाराज! तदनन्तर संकर्षण और विष्णुके स्वरूप बलराम और श्रीकृष्ण दोनों भाई कुछ कालके अनन्तर एक साथ ही घुटनोंके बल रेंगने लगे। अन्योन्यकिरणग्रस्तौ चन्द्रसूर्याविवाम्बरे ।। विसर्पयेतां सर्वत्र सर्पभोगभुजौ तदा । जैसे चन्द्रमा और सूर्य एक-दूसरेकी किरणोंसे बँधकर आकाशमें एक साथ विचरते हों, उसी प्रकार बलराम और श्रीकृष्ण सर्वत्र एक साथ चलते-फिरते थे। उनकी भुजाएँ सर्पके शरीरकी भाँति सुशोभित होती थीं। रेजतुः पांसुदिग्धाङ्गौ रामकृष्णौ तदा नृप ।। क्वचिच्च जानुभिर्घृष्टौ क्रीडमानौ क्वचिद् वने । पिबन्तौ दधिकुल्याश्च मथ्यमाने च भारत ।।