भारतकोश
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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

वे अपने कानोंमें मोरके पंख लगा लेते, मस्तकपर पल्लवोंके मुकुट धारण करते और गलेमें वनमाला डाल लेते थे। उस समय शालके नये पौधोंकी भाँति उन दोनोंकी बड़ी शोभा होती थी।

अरविन्दकृतापीड़ौ रज्जुयज्ञोपवीतिनौ । शिक्यतुम्बधरौ वीरौ गोपवेणुप्रवादकौ ॥ वे कभी कमलके फूलोंके शिरोभूषण धारण करते और कभी बछड़ोंकी रस्सियोंको यज्ञोपवीतकी भाँति धारण कर लेते थे। वीरवर श्रीकृष्ण और बलराम छींके और तुम्बी लिये वनमें घूमते और गोपजनोचित वेणु बजाया करते थे।

क्वचिद् वसन्तावन्योन्यं क्रीडमानौ क्वचिद् वने । पर्णशय्यासु संसुप्तौ क्वचिन्निद्रान्तरैषिणौ ॥ वे दोनों भाई कहीं ठहर जाते, कहीं वनमें एक-दूसरेके साथ खेलने लगते और कहीं पत्तोंकी शय्या बिछाकर सो जाते तथा नींद लेने लगते थे।

तौ वत्सान् पालयन्तौ हि शोभयन्तौ महद् वनम् । चञ्चूर्यन्तौ रमन्तौ स्म राजन्नेवं तदा शुभौ ॥ राजन्! इस प्रकार वे मंगलमय बलराम और श्रीकृष्ण बछड़ोंकी रक्षा करते तथा उस महान् वनकी शोभा बढ़ाते हुए सब ओर घूमते और भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करते थे।

ततो वृन्दावनं गत्वा वसुदेवसुतावुभौ । गोव्रजं तत्र कौन्तेय चारयन्तौ विजह्रतुः ॥ कुन्तीनन्दन! तदनन्तर वे दोनों वसुदेवपुत्र वृन्दावनमें जाकर गौएँ चराते हुए लीला-विहार करने लगे।

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

[कालियमर्दन एवं धेनुकासुर, अरिष्टासुर और कंस आदिका वध, श्रीकृष्ण और बलरामका विद्याभ्यास तथा गुरुदक्षिणारूपसे गुरुजीको उनके मरे हुए पुत्रको जीवित करके देना]

भीष्म उवाच

ततः कदाचिद् गोविन्दो ज्येष्ठं सङ्कर्षणं विना । चचार तद् वनं रम्यं रम्यरूपो वराननः ॥ भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तदनन्तर एक दिन मनोहर रूप और सुन्दर मुखवाले भगवान् गोविन्द अपने बड़े भाई संकर्षणको साथ लिये बिना ही रमणीय वृन्दावनमें चले गये और वहाँ इधर-उधर भ्रमण करने लगे।

काकपक्षरः श्रीमाञ्छ्यामः पद्मानिभेक्षणः । श्रीवत्सेनोरसा युक्तः शशाङ्क इव लक्ष्मणा ॥ उन्होंने काकपक्ष धारण कर रखा था। वे परम शोभायमान, श्याम-वर्ण तथा कमलके समान सुन्दर नेत्रोंसे सुशोभित थे। जैसे चन्द्रमा कलंकसे युक्त होकर शोभा पाता है, उसी प्रकार श्रीकृष्णका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे शोभा पा रहा था।

रज्जुयज्ञोपवीती स पीताम्बरधरो युवा । श्वेतगन्धेन लिप्ताङ्गो नीलकुञ्चितमूर्धजः ॥ राजता बर्हिपत्रेण मन्दमारुतकम्पिना । क्वचिद् गायन् क्वचित् क्रीडन् क्वचिन्नृत्यन् क्वचिद्धसन् ॥ गोपवेषः स मधुरं गायन् वेणुं च वादयन् । प्रह्लादनार्थं तु गवां क्वचिद् वनगतो युवा ॥ गोकुले मेघकाले तु चचार द्युतिमान् प्रभुः । बहुरम्येषु देशेषु वनस्य वनराजिषु ॥ तासु कृष्णो मुदं लेभे क्रीडया भरतर्षभ । स कदाचिद् वने तस्मिन् गोभिः सह परिव्रजन् ॥ उन्होंने रस्सियोंको यज्ञोपवीतकी भाँति पहन रखा था। उनके श्रीअंगोंपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। विभिन्न अंगोंमें श्वेत चन्दनका अनुलेप किया गया था। उनके मस्तकपर काले-घुँघराले केश सुशोभित थे। सिरपर मोरपंखका मुकुट शोभा पाता था, जो मन्द-मन्द वायुके झोंकोंसे लहरा रहा था। भगवान् कहीं गीत गाते, कहीं क्रीड़ा करते, कहीं नाचते और कहीं हँसते थे। इस प्रकार गोपालोचित वेष धारण किये मधुर गीत गाते और वेणु बजाते हुए तरुण श्रीकृष्ण गौओंको आनन्दित करनेके लिये कभी-कभी वनमें घूमते थे। अत्यन्त कान्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण वर्षाके समय गोकुलमें वहाँके अतिशय रमणीय प्रदेशों तथा

वनश्रेणियोंमें विचरण करते थे। भरतश्रेष्ठ! उन वनश्रेणियोंमें भाँति-भाँतिके खेल करके श्यामसुन्दर बड़े प्रसन्न होते थे। एक दिन वे गौओंके साथ वनमें घूम रहे थे। भाण्डीरं नाम दृष्ट्वाथ न्यग्रोधं केशवो महान्। तच्छायायां निवासाय मतिं चक्रे तदा प्रभुः॥ घूमते-घूमते महात्मा भगवान् केशवने भाण्डीर नामक वटवृक्ष देखा और उसकी छायामें बैठनेका विचार किया। स तत्र वयसा तुल्यैः वत्सपालैः सहानघ। रेमे स दिवसान् कृष्णः पुरा स्वर्गपुरे तथा॥ निष्पाप युधिष्ठिर! वहाँ श्रीकृष्ण समान अवस्थावाले दूसरे गोपबालकोंके साथ बछड़े चराते थे, दिनभर खेल-कूद करते थे और पहले दिव्य धाममें जिस प्रकार वे आनन्दित होते थे, उसी प्रकार वनमें आनन्दपूर्वक दिन बिताते थे। तं क्रीडमानं गोपालाः कृष्णं भाण्डीरवासिनः। रमयन्ति स्म बहवो मान्यैः क्रीडनकैस्तदा॥ अन्ये स्म परिगायन्ति गोपा मुदितमानसाः। गोपालाः कृष्णमेवान्ये गायन्ति स्म वनप्रियाः॥ भाण्डीरवनमें निवास करनेवाले बहुत-से ग्वाले वहाँ क्रीड़ा करते हुए श्रीकृष्णको अच्छे-अच्छे खिलौनोंद्वारा प्रसन्न रखते थे। दूसरे प्रसन्नचित्त रहनेवाले गोप, जिन्हें वनमें घूमना प्रिय था, सदा श्रीकृष्णकी महिमाका गान किया करते थे। तेषां संगायतामेव वादयामास केशवः। पर्णवाद्यान्तरे वेणुं तुम्बं वीणां च तत्र वै॥ एवं क्रीडान्तरैः कृष्णो गोपालैर्विजहार सः। जब वे गीत गाते, उस समय भगवान् श्रीकृष्ण पत्तोंके बाजोंके बीच-बीचमें वेणु, तुम्बी और वीणा बजाया करते थे। इस प्रकार विभिन्न लीलाओंद्वारा श्रीकृष्ण गोपबालकोंके साथ खेलते थे। तेन बालेन कौन्तेय कृतं लोकहितं तदा॥ पश्यतां सर्वभूतानां वासुदेवेन भारत। भरतनन्दन! उस समय बालक श्रीकृष्णने सम्पूर्ण भूतोंके देखते-देखते लोकहितके अनेक कार्य किये। ह्रदे नीपवने तत्र क्रीडितं नागमूर्धनि॥ कालियं शासयित्वा तु सर्वलोकस्य पश्यतः। विजहार ततः कृष्णो बलदेवसहायवान्॥ वृन्दावनमें कदम्बवनके पास जो ह्रद (कुण्ड) था, उसमें प्रवेश करके उन्होंने कालियनागके मस्तक-पर नृत्यक्रीड़ा की थी। फिर सब लोगोंके सामने ही कालियनागको

अन्यत्र जानेका आदेश देकर वे बलदेवजीके साथ वनमें इधर-उधर विचरण करने लगे।

धेनुको दारुणो दैत्यो राजन् रासभविग्रहः ।
तदा तालवने राजन् बलदेवेन वै हतः ।।
राजन्! तालवनमें धेनुक नामक भयंकर दैत्य निवास करता था, जो गधेका रूप धारण करके रहता था। उस समय वह बलदेवजीके हाथसे मारा गया।
ततः कदाचित् कौन्तेय रामकृष्णौ वनं गतौ ।
चारयन्तौ प्रवृद्धानि गोधनानि शुभाननौ ।।
कुन्तीनन्दन! तदनन्तर किसी समय सुन्दर मुखवाले बलराम और श्रीकृष्ण अपने बढ़े हुए गोधनको चरानेके लिये वनमें गये।
विहरन्तौ मुदा युक्तौ वीक्षमाणौ वनानि वै ।
क्ष्वेलयन्तौ प्रगायन्तौ विचिन्वन्तौ च पादपान् ।।
वहाँ वनकी शोभा निहारते हुए वे दोनों भाई घूमते, खेलते, गीत गाते और विभिन्न वृक्षोंकी खोज करते हुए बड़े प्रसन्न होते थे।
नामभिर्व्याहरन्तौ च वत्सान् गाश्च परंतपौ ।
चेरतुर्लोकसिद्धाभिः क्रीडाभिरपराजितौ ।।
शत्रुओंको संताप देनेवाले वे दोनों अजेय वीर वहाँ गौओं और बछड़ोंको नाम ले-लेकर बुलाते और लोकप्रचलित बालोचित क्रीड़ाएँ करते रहते थे।
तौ देवौ मानुषीं दीक्षां वहन्तौ सुरपूजितौ ।

तज्जातिगुणयुक्ताभिः क्रीडाभिश्चेरतुर्वनम् ॥ वे दोनों देववन्दित देवता थे तो भी मानवी दीक्षा ग्रहण करनेके कारण मानव-जातिके अनुरूप गुणोंवाली क्रीड़ाएँ करते हुए वनमें विचरते थे।

ततः कृष्णो महातेजास्तदा गत्वा तु गोव्रजम् । गिरियज्ञं तमैवैष प्रकृतं गोपदारकैः ॥ बुभुजे पायसं शौरिरीश्वरः सर्वभूतकृत् । तत्पश्चात् महातेजस्वी श्रीकृष्ण गौओंके व्रजमें जाकर गोपबालकोंद्वारा किये जानेवाले गिरियज्ञमें सम्मिलित हो वहाँ सर्वभूतस्रष्टा ईश्वरके रूपमें अपनेको प्रकट करके (गिरिराजके लिये समर्पित) खीरको स्वयं ही खाने लगे।

तं दृष्ट्वा गोपकाः सर्वे कृष्णमेव समर्चयन् ॥ पूज्यमानस्ततो गोपैर्दिव्यं वपुर्धारयत् । उन्हें देखकर सब गोप भगवद्बुद्धिसे श्रीकृष्णके उस स्वरूपकी ही पूजा करने लगे। गोपालोंद्वारा पूजित श्रीकृष्णने दिव्य रूप धारण कर लिया।

धृतो गोवर्धनो नाम सप्ताहं पर्वतस्तदा ॥ शिशुना वासुदेवेन गवार्थमरिमर्दन । शत्रुमर्दन युधिष्ठिर! (जब इन्द्र वर्षा कर रहे थे, उस समय) बालक वासुदेवने गौओंकी रक्षाके लिये एक सप्ताहतक गोवर्धन पर्वतको अपने हाथपर उठा रखा था।

क्रीडमानस्तदा कृष्णः कृतवान् कर्म दुष्करम् ॥ तदद्भुतमिवात्रासीत् सर्वलोकस्य भारत । भरतनन्दन! उस समय श्रीकृष्णने खेल-खेलमें ही अत्यन्त दुष्कर कर्म कर डाला, जो सब लोगोंके लिये अत्यन्त अद्भुत-सा था।

देवदेवः क्षितिं गत्वा कृष्णं दृष्ट्वा मुदान्वितः ॥ गोविन्द इति तं ह्युक्त्वा ह्यभ्यषिञ्चत् पुरंदरः । इत्युक्त्वाऽऽश्लिष्य गोविन्दं पुरुहूतोऽभ्ययाद् दिवम् । देवाधिदेव इन्द्रने भूतलपर जाकर जब श्रीकृष्णको (गोवर्धन धारण किये) देखा, तब उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने श्रीकृष्णको 'गोविन्द' नाम देकर उनका ('गवेन्द्र' पदपर) अभिषेक किया। देवराज इन्द्र गोविन्दको हृदयसे लगाकर उनकी अनुमति ले स्वर्गलोकको चले गये।

अथारिष्ट इति ख्यातं दैत्यं वृषभविग्रहम् । जघान तरसा कृष्णः पशूनां हितकाम्यया ॥ तदनन्तर श्रीकृष्णने पशुओंके हितकी कामनासे वृषभरूपधारी अरिष्ट नामक दैत्यको वेगपूर्वक मार गिराया।

केशिनं नाम दैतेयं राजन् वै हयविग्रहम् ।

तथा वनगतं पार्थ गजायुतबलं हयम् ॥
प्रहितं भोजपुत्रेण जघान पुरुषोत्तमः ।
राजन्! व्रजमें केशी नामका एक दैत्य रहता था, जिसका शरीर घोड़ेके समान था। उसमें दस हजार हाथियोंका बल था। कुन्तीनन्दन! उस अश्वरूपधारी दैत्यको भोजकुलोत्पन्न कंसने भेजा था। वृन्दावनमें आनेपर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने उसे भी अरिष्टासुरकी भाँति मार दिया।
आन्ध्रं मल्लं च चाणूरं निजघान महासुरम् ॥
कंसके दरबारमें एक आन्ध्रदेशीय मल्ल था, जिसका नाम था चाणूर। वह एक महान् असुर था। श्रीकृष्णने उसे भी मार डाला।
सुनामानममित्रघ्नं सर्वसैन्यपुरस्कृतम् ।
बालरूपेण गोविन्दो निजघान च भारत ॥
भरतनन्दन! (कंसका भाई) शत्रुनाशक सुनामा कंसकी सारी सेनाका अगुआ—सेनापति था। गोविन्द अभी बालक थे, तो भी उन्होंने सुनामाको मार दिया।
बलदेवेन चायत्तः समाजे मुष्टिको हतः ।
भारत! (दंगल देखनेके लिये जुटे हुए) जनसमाजमें युद्धके लिये तैयार खड़े हुए मुष्टिक नामक पहलवानको बलरामजीने अखाड़ेमें ही मार दिया।
त्रासितश्च तदा कंसः स हि कृष्णेन भारत ॥
युधिष्ठिर! उस समय श्रीकृष्णने कंसके मनमें भारी भय उत्पन्न कर दिया।
ऐरावतं युयुत्सन्तं मातङ्गानामिवर्षभम् ।
कृष्णः कुवलयापीडं हतवांस्तस्य पश्यतः ॥
हाथियोंमें श्रेष्ठ कुवलयापीडको, जो ऐरावतकुलमें उत्पन्न हुआ था और श्रीकृष्णको कुचल देना चाहता था, श्रीकृष्णने कंसके देखते-देखते ही मार गिराया।

हत्वा कंसममित्रघ्नः सर्वेषां पश्यतां तदा ।
अभिषिच्योग्रसेनं तं पित्रोः पादमवन्दत ॥

फिर शत्रुनाशन श्रीकृष्णने सब लोगोंके सामने ही कंसको मारकर उग्रसेनको राजपदपर अभिषिक्त कर दिया और अपने माता-पिता देवकी-वसुदेवके चरणोंमें प्रणाम किया।
एवमादीनि कर्माणि कृतवान् वै जनार्दनः ।
उवास कतिचित् तत्र दिनानि सहलायुधः ॥

इस प्रकार जनार्दनने कितने ही अद्भुत कार्य किये और कुछ दिनोंतक बलरामजीके साथ वे मथुरामें ही रहे।
ततस्तौ जग्मतुस्तात गुरुं सान्दीपनिं पुनः ।
गुरुशुश्रूषया युक्तौ धर्मज्ञौ धर्मचारिणौ ॥

तात युधिष्ठिर! तदनन्तर वे दोनों धर्मज्ञ भाई गुरु सान्दीपतिके यहाँ (उज्जयिनीपुरीमें) विद्याध्ययनके लिये गये। वहाँ वे गुरुसेवा-परायण हो सदा धर्मके ही अनुष्ठानमें लगे रहे।
व्रतमुग्रं महात्मानौ विचरन्तावतिष्ठताम् ।
अहोरात्रचतुष्षष्ट्या षडङ्गं वेदमवापतुः ॥

वे दोनों महात्मा कठोर व्रतका पालन करते हुए वहाँ रहते थे। उन्होंने चौंसठ दिन-रातमें ही छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान प्राप्त कर लिया।
लेख्यं च गणितं चोभौ प्राप्तुतां यदुनन्दनौ ।
गान्धर्ववेदं वैद्यं च सकलं समवापतुः ॥

इतना ही नहीं, उन यदुकुलकुमारोंने लेख्य (चित्रकला), गणित, गान्धर्ववेद तथा सारे वेदको भी उतने ही समयके भीतर जान लिया। हस्तिशिक्षामश्वशिक्षां द्वादशाहेन चापतुः । तावुभौ जग्मतुर्वीरौ गुरुं सान्दीपनिं पुनः ।। धनुर्वेदचिकीर्षार्थं धर्मज्ञौ धर्मचारिणौ । गजशिक्षा तथा अश्वशिक्षाको तो उन्होंने कुल बारह दिनोंमें ही प्राप्त कर लिया। इसके बाद वे दोनों धर्मज्ञ एवं धर्मपरायण वीर धनुर्वेद सीखनेके लिये पुनः सान्दीपनि मुनिके पास गये। ताविष्वास्त्रवराचार्यमभिगम्य प्रणम्य च ।। तेन तौ सत्कृतौ राजन् विचरन्ताववन्तिषु । राजन्! धनुर्वेदके श्रेष्ठ आचार्य सान्दीपतिके पास जाकर उन दोनोंने प्रणाम किया। सान्दीपनिने उन्हें सत्कारपूर्वक अपनाया एवं वे फिर अवन्तीमें विचरते हुए वहाँ रहने लगे। पञ्चाशद्भिरहोरात्रैर्दशाङ्गं सुप्रतिष्ठितम् ।। सरहस्यं धनुर्वेदं सकलं ताववापतुः । पचास दिन-रातमें ही उन दोनोंने दस अंगोंसे युक्त, सुप्रतिष्ठित एवं रहस्यसहित सम्पूर्ण धनुर्वेदका ज्ञान प्राप्त कर लिया। दृष्ट्वा कृतास्त्रौ विप्रेन्द्रो गुर्वर्थे तावचोदयत् ।। अयाचतार्थं गोविन्दं ततः सान्दीपनिर्विभुः । उन दोनों भाइयोंको अस्त्र-विद्यामें निपुण देखकर विप्रवर सान्दीपनिने उन्हें गुरुदक्षिणा देनेकी आज्ञा दी। सान्दीपनिजी सब विषयोंमें विद्वान् थे। उन्होंने श्रीकृष्णसे अपने अभीष्ट मनोरथकी याचना इस प्रकार की।

सान्दीपनिरुवाच

मम पुत्रः समुद्रेऽस्मिंस्तिमिना चापवाहितः ।। पुत्रमानय भद्रं ते भक्षितं तिमिना मम । **सान्दीपनिजी बोले—**मेरा पुत्र इस समुद्रमें नहा रहा था, उस समय 'तिमि' नामक जलजन्तु उसे पकड़कर भीतर ले गया और उसके शरीरको खा गया। तुम दोनोंका भला हो। मेरे उस मरे हुए पुत्रको जीवित करके यहाँ ला दो।

भीष्म उवाच

आर्ताय गुरवे तत्र प्रतिशुश्राव दुष्करम् ।। अशक्यं त्रिषु लोकेषु कर्तुमन्येन केनचित् । **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! इतना कहते-कहते गुरु सान्दीपनि पुत्रशोकसे आर्त हो गये। यद्यपि उनकी माँग बहुत कठिन थी, तीनों लोकोंमें दूसरे किसी पुरुषके लिये इस

कार्यका साधन करना असम्भव था, तो भी श्रीकृष्णने उसे पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली।
यश्च सान्दीपनेः पुत्रं जघान भरतर्षभ ।।
सोऽसुरः समरे ताभ्यां समुद्रे विनिपातितः ।
भरतश्रेष्ठ! जिसने सान्दीपानिके पुत्रको मारा था, उस असुरको उन दोनों भाइयोंने युद्ध करके समुद्रमें मार गिराया।
ततः सान्दीपनेः पुत्रः प्रसादादमितौजसः ।।
दीर्घकालं गतः प्रेतं पुनरासीच्छरीरवान् ।
तदनन्तर अमिततेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णके कृपाप्रसादसे सान्दीपानिका पुत्र, जो दीर्घकालसे यमलोकमें जा चुका था, पुनः पूर्ववत् शरीर धारण करके जी उठा।
तदशक्यमचिन्त्यं च दृष्ट्वा सुमहदद्भुतम् ।।
सर्वेषामेव भूतानां विस्मयः समजायत ।
वह अशक्य, अचिन्त्य और अत्यन्त अद्भुत कार्य देखकर सभी प्राणियोंको बड़ा आश्चर्य हुआ।
ऐश्वर्याणि च सर्वाणि गवाश्वं च धनानि च ।।
सर्वं तदुपजह्राते गुरवे रामकेशवौ ।
ततस्तं पुत्रमादाय ददौ च गुरवे प्रभुः ।।
बलराम और श्रीकृष्णने अपने गुरुको सब प्रकारके ऐश्वर्य, गाय, घोड़े और प्रचुर धन सब कुछ दिये। तत्पश्चात् गुरुपुत्रको लेकर भगवान्ने गुरुजीको सौंप दिया।
तं दृष्ट्वा पुत्रमायान्तं सान्दीपनिपुरे जनाः ।
अशक्यमेतत् सर्वेषामचिन्त्यमिति मेनिरे ।।
कश्च नारायणादन्यश्चिन्तयेदिदमद्भुतम् ।
उस पुत्रको आया देख सान्दीपानिके नगरके लोग यह मान गये कि श्रीकृष्णके द्वारा यह ऐसा कार्य सम्पन्न हुआ है, जो अन्य सब लोगोंके लिये असम्भव और अचिन्त्य है। भगवान् नारायणके सिवा दूसरा कौन ऐसा पुरुष है, जो इस अद्भुत कार्यको सोच भी सके (करना तो दूरकी बात है)।
गदापरिघयुद्धेषु सर्वास्त्रेषु च केशवः ।।
परमां मुख्यतां प्राप्तः सर्वलोकेषु विश्रुतः ।
भगवान् श्रीकृष्णने गदा और परिघके युद्धमें तथा सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञानमें सबसे श्रेष्ठ स्थान प्राप्त कर लिया। वे समस्त लोकोंमें विख्यात हो गये।
भोजराजतनूजोऽपि कंसस्तात युधिष्ठिर ।।
अस्त्रज्ञाने बले वीर्ये कार्तवीर्यसमोऽभवत् ।
तात युधिष्ठिर! भोजराजकुमार कंस भी अस्त्रज्ञान, बल और पराक्रममें कार्तवीर्य अर्जुनकी समानता करता था।

तस्य भोजपतेः पुत्राद् भोजराज्यविवर्धनात् ।। उद्विजन्ते स्म राजानः सुपर्णादिव पन्नगाः । भोजवंशके राज्यकी वृद्धि करनेवाले भोजराजकुमार कंससे भूमण्डलके सब राजा उसी प्रकार उद्विग्न रहते थे, जैसे गरुड़से सर्प। चित्रकार्मुकनिस्त्रिंशविमलप्रासयोधिनः ।। शतं शतसहस्राणि पादातास्तस्य भारत । भरतनन्दन! उसके यहाँ धनुष, खड्ग और चमचमाते हुए भाले लेकर विचित्र प्रकारसे युद्ध करनेवाले एक करोड़ पैदल सैनिक थे। अष्टौ शतसहस्राणि शूराणामनिवर्तिनाम् ।। अभवन् भोजराजस्य जाम्बूनदमयध्वजाः । भोजराजके रथी सैनिक, जिनके रथोंपर सुवर्णमय ध्वज फहराते रहते थे तथा जो शूरवीर होनेके साथ ही युद्धमें कभी पीठ दिखलानेवाले नहीं थे, आठ लाखकी संख्यामें थे। स्फुरत्काञ्चनकक्ष्यास्तु गजास्तस्य युधिष्ठिर ।। तावन्त्येव सहस्राणि गजानामनिवर्तिनाम् । युधिष्ठिर! कंसके यहाँ युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले हाथीसवार भी आठ ही लाख थे। उनके हाथियोंकी पीठपर सुवर्णके चमकीले हौदे कसे होते थे। ते च पर्वतसङ्काशाश्चित्रध्वजपताकिनः ।। बभूवुर्भोजराजस्य नित्यं प्रमुदिता गजाः । भोजराजके वे पर्वताकार गजराज विचित्र ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित होते थे और सदा संतुष्ट रहते थे। स्वलङ्कृतानां शीघ्राणां करेणूनां युधिष्ठिर । अभवद् भोजराजस्य द्विस्तावद्धि महद् बलम् ।। युधिष्ठिर! भोजराज कंसके यहाँ आभूषणोंसे सजी हुई शीघ्रगामिनी हथिनियोंकी विशाल सेना गजराजोंकी अपेक्षा दूनी थी। षोडशाश्वसहस्राणि किंशुकाभानि तस्य वै । अपरस्तु महाव्यूहः किशोराणां युधिष्ठिर ।। आरोहवरसम्पन्नो दुर्धर्षः केनचिद् बलात् । स च षोडशसाहस्रः कंसभ्रातृपुरस्सरः ।। उसके यहाँ सोलह हजार घोड़े ऐसे थे, जिनका रंग पलासके फूलकी भाँति लाल था। राजन्! किशोर-अवस्थाके घोड़ोंका एक दूसरा दल भी मौजूद था, जिसकी संख्या सोलह हजार थी। इन अश्वोंके सवार भी बहुत अच्छे थे। इस अश्वसेनाको कोई भी बलपूर्वक दबा नहीं सकता था। कंसका भाई सुनामा इन सबका सरदार था। सुनामा सदृशस्तेन स कंसं पर्यपालयत् ।

वह भी कंसके ही समान बलवान् था एवं सदा कंसकी रक्षाके लिये तत्पर रहता था।
य आसन् सर्ववर्णास्तु हयास्तस्य युधिष्ठिर ।।
स गणो मिश्रको नाम षष्टिसाहस्र उच्यते ।
युधिष्ठिर! कंसके यहाँ घोड़ोंका एक और भी बहुत बड़ा दल था, जिसमें सभी रंगके घोड़े थे। उस दलका नाम था मिश्रक। मिश्रकोंकी संख्या साठ हजार बतलायी जाती है।
कंसरोषमहावेगां ध्वजानूपमहाद्रुमाम् ।।
मत्तद्विपमहाग्राहां वैवस्वतवशानुगाम् ।
(कंसके साथ होनेवाला महान् समर एक भयंकर नदीके समान था।) कंसका रोष ही उस नदीका महान् वेग था। ऊँचे-ऊँचे ध्वज तटवर्ती वृक्षोंके समान जान पड़ते थे। मतवाले हाथी बड़े-बड़े ग्राहोंके समान थे। वह नदी यमराजकी आज्ञाके अधीन होकर चलती थी।
शस्त्रजालमहाफेनां सादिवेगमहाजलाम् ।।
गदापरिघपाठीनां नानाकवचशैवलाम् ।
अस्त्र-शस्त्रोंके समूह उसमें फेनका भ्रम उत्पन्न करते थे। सवारोंका वेग उसमें महान् जलप्रवाह-सा प्रतीत होता था। गदा और परिघ पाठीन नामक मछलियोंके सदृश जान पड़ते थे। नाना प्रकारके कवच सेवारके समान थे।
रथनागमहावर्ता नानारुधिरकर्दमाम् ।।
चित्रकार्मुककल्लोलां रथाश्वकलिलह्रदाम् ।
रथ और हाथी उसमें बड़ी-बड़ी भँवरोंका दृश्य उपस्थित करते थे। नाना प्रकारका रक्त ही कीचड़का काम करता था। विचित्र धनुष उठती हुई लहरोंके समान जान पड़ते थे। रथ और अश्वोंका समूह ह्रदके समान था।
महामृधनदीं घोरां योधावर्तननिःस्वनाम् ।।
को वा नारायणादन्यः कंसहन्ता युधिष्ठिर ।
योद्धाओंके इधर-उधर दौड़ने या बोलनेसे जो शब्द होता था, वही उस भयानक समर-सरिताका कलकल नाद था। युधिष्ठिर! भगवान् नारायणके सिवा ऐसे कंसको कौन मार सकता था?
एष शक्ररथे तिष्ठंस्तान्यनीकानि भारत ।।
व्यधमद् भोजपुत्रस्य महाभ्राणीव मारुतः ।
भारत! जैसे हवा बड़े-बड़े बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार इन भगवान् श्रीकृष्णने इन्द्रके रथमें बैठकर कंसकी उपर्युक्त सारी सेनाओंका संहार कर डाला।
तं सभास्थं सहामात्यं हत्वा कंसं सहान्वयम् ।।
मानयामास मानार्हा देवकीं ससुहृद्गणाम् ।
सभामें विराजमान कंसको मन्त्रियों और परिवारके साथ मारकर श्रीकृष्णने सुहृदोंसहित सम्माननीय माता देवकीका समादर किया।

यशोदां रोहिणीं चैव अभिवाद्य पुनः पुनः ॥
उग्रसेनं च राजानमभिषिच्य जनार्दनः ।
अर्चितो यदुमुख्यैश्च भगवान् वासवानुजः ॥

जनार्दनने यशोदा और रोहिणीको भी बारंबार प्रणाम करके उग्रसेनको राजाके पदपर अभिषिक्त किया। उस समय यदुकुलके प्रधान-प्रधान पुरुषोंने इन्द्रके छोटे भाई भगवान् श्रीहरिका पूजन किया।
ततः पार्थिवमायान्तं सहितं सर्वराजभिः ।
सरस्वत्यां जरासंधमजयत् पुरुषोत्तमः ॥

तदनन्तर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने समस्त राजाओंके सहित आक्रमण करनेवाले राजा जरासंधको सरोवरों या ह्रदोंसे सुशोभित यमुनाके तटपर परास्त किया।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

[नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना]

भीष्म उवाच

शूरसेनपुरं त्यक्त्वा सर्वयादवनन्दनः । द्वारकां भगवान् कृष्णः प्रत्यपद्यत केशवः ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर समस्त यदुवंशियोंको आनन्दित करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण शूरसेनपुरी मथुराको छोड़कर द्वारकामें चले गये।

प्रत्यपद्यत यानानि रत्नानि च बहूनि च । यथार्हं पुण्डरीकाक्षो नैर्ऋतान् प्रतिपालयन् ॥ कमलनयन श्रीकृष्णने असुरोंको पराजित करके जो बहुत-से रत्न और वाहन प्राप्त किये थे, उनका वे द्वारकामें यथोचितरूपसे संरक्षण करते थे।

तत्र विघ्नं चरन्ति स्म दैतेयाः सह दानवैः । ताञ्जघान महाबाहुः वरमत्तान् महासुरान् ॥ उनके इस कार्यमें दैत्य और दानव विघ्न डालने लगे। तब महाबाहु श्रीकृष्णने वरदानसे उन्मत्त हुए उन बड़े-बड़े असुरोंको मार डाला।

स विघ्नमकरोत् तत्र नरको नाम नैर्ऋतः । त्रासनः सुरसंघानां विदितो वः प्रभावतः ॥ तत्पश्चात् नरक नामक राक्षसने भगवान्‌के कार्यमें विघ्न डालना आरम्भ किया। वह समस्त देवताओंको भयभीत करनेवाला था। राजन्! तुम्हें तो उसका प्रभाव विदित ही है।

स भूम्यां मूर्तिलिङ्गस्थः सर्वदेवासुरान्तकः । मानुषाणामृषीणां च प्रतीपमकरोत् तदा ॥ समस्त देवताओंके लिये अन्तकरूप नरकासुर इस धरतीके भीतर मूर्तिलिंगमें* स्थित हो मनुष्यों और ऋषियोंके प्रतिकूल आचरण किया करता था।

त्वष्टुर्दुहितरं भौमः कशेरुमगमत् तदा । गजरूपेण जग्राह रुचिराङ्गीं चतुर्दशीम् ॥ भूमिका पुत्र होनेसे नरकको भौमासुर भी कहते हैं। उसने हाथीका रूप धारण करके प्रजापति त्वष्टाकी पुत्री कशेरुके पास जाकर उसे पकड़ लिया। कशेरु बड़ी सुन्दरी और चौदह वर्षकी अवस्थावाली थी।

प्रमथ्य च जहारैतां हृत्वा च नरकोऽब्रवीत् । नष्टशोकभयाबाधः प्राग्ज्योतिषपतिस्तदा ॥

नरकासुर प्राग्ज्योतिषपुरका राजा था। उसके शोक, भय और बाधाएँ दूर हो गयी थीं। उसने कशेरुको मूर्च्छित करके हर लिया और अपने घर लाकर उससे इस प्रकार कहा।

नरक उवाच

यानि देवमनुष्येषु रत्नानि विविधानि च ।
बिभर्ति च मही कृत्स्ना सागरेषु च यद् वसु ॥
अद्यप्रभृति तद् देवि सहिताः सर्वनेर्ऋताः ।
तवैवोपहरिष्यन्ति दैत्याश्च सह दानवैः ॥
**नरकासुर बोला—**देवि! देवताओं और मनुष्योंके पास जो नाना प्रकारके रत्न हैं, सारी पृथ्वी जिन रत्नोंको धारण करती है तथा समुद्रोंमें जो रत्न संचित हैं, उन सबको आजसे सभी राक्षस ला-लाकर तुम्हें ही अर्पित किया करेंगे। दैत्य और दानव भी तुम्हें उत्तमोत्तम रत्नोंकी भेंट देंगे।

भीष्म उवाच

एवमुत्तमरत्नानि बहूनि विविधानि च ।
स जहार तदा भौमः स्त्रीरत्नानि च भारत ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**भारत! इस प्रकार भौमासुरने नाना प्रकारके बहुत-से उत्तम रत्नों तथा स्त्री-रत्नोंका भी अपहरण किया।
गन्धर्वाणां च याः कन्या जहार नरको बलात् ।
याश्च देवमनुष्याणां सप्त चाप्सरसां गणाः ॥
गन्धर्वोंकी जो कन्याएँ थीं, उन्हें भी नरकासुर बलपूर्वक हर लाया। देवताओं और मनुष्योंकी कन्याओं तथा अप्सराओंके सात समुदायोंका भी उसने अपहरण कर लिया।
चतुर्दशसहस्राणां चैकविंशच्छतानि च ।
एकवेणीधराः सर्वाः सतां मार्गमनुव्रताः ॥
इस प्रकार सोलह हजार एक सौ सुन्दरी कुमारियाँ उसके घरमें एकत्र हो गयीं। वे सब-की-सब सत्पुरुषोंके मार्गका अनुसरण करके व्रत और नियमके पालनमें तत्पर हो एक वेणी धारण करती थीं।
तासामन्तःपुरं भौमोऽकारयन्मणिपर्वते ।
औदकायामदीनात्मा मुरस्य विषयं प्रति ॥
उत्साहयुक्त मनवाले भौमासुरने उनके रहनेके लिये मणिपर्वतपर अन्तःपुरका निर्माण कराया। उस स्थानका नाम था औदका (जलकी सुविधासे सम्पन्न भूमि)। वह अन्तःपुर मुर नामक दैत्यके अधिकृत प्रदेशमें बना था।
ताश्च प्राग्ज्योतिषो राजा मुरस्य दश चात्मजाः ।
नैर्ऋताश्च यथा मुख्याः पालयन्त उपासत ॥

प्राग्ज्योतिषपुरका राजा भौमासुर, मुरके दस पुत्र तथा प्रधान-प्रधान राक्षस उस अन्तःपुरकी रक्षा करते हुए सदा उसके समीप ही रहते थे।

स एव तपसां पारे वरदत्तो महीसुतः ।
अदितिं धर्षयामास कुण्डलार्थं युधिष्ठिर ॥
युधिष्ठिर! पृथ्वीपुत्र भौमासुर तपस्याके अन्तमें वरदान पाकर इतना गर्वोन्मत्त हो गया था कि इसने कुण्डलके लिये देवमाता अदितितकका तिरस्कार कर दिया।

न चासुरगणैः सर्वैः सहितैः कर्म तत् पुरा ।
कृतपूर्वं महाघोरं यदकार्षीन्महासुरः ॥
पूर्वकालमें समस्त महादैत्योंने एक साथ मिलकर भी वैसा अत्यन्त घोर पाप नहीं किया था, जैसा अकेले इस महान् असुरने कर डाला था।

यं मही सुषुवे देवी यस्य प्राग्ज्योतिषं पुरम् ।
विषयान्तपालाश्चत्वारो यस्यासन् युद्धदुर्मदाः ॥
पृथ्वीदेवीने उसे उत्पन्न किया था, प्राग्ज्योतिषपुर उसकी राजधानी थी तथा चार युद्धोन्मत्त दैत्य उसके राज्यकी सीमाकी रक्षा करनेवाले थे।

आदेवयानमावृत्य पन्थानं पर्यवस्थिताः ।
त्रासनाः सुरसङ्घानां विरूपै राक्षसैः सह ॥
वे पृथ्वीसे लेकर देवयानतकके मार्गको रोककर खड़े रहते थे। भयानक रूपवाले राक्षसोंके साथ रहकर वे देवसमुदायको भयभीत किया करते थे।

हयग्रीवो निशुम्भश्च घोरः पञ्चजनस्तथा ।
मुरः पुत्रसहस्रैश्च वरदत्तो महासुरः ॥
उन चारों दैत्योंके नाम इस प्रकार हैं—हयग्रीव, निशुम्भ, भयंकर पंचजन तथा सहस्र पुत्रोंसहित महान् असुर मुर, जो वरदान प्राप्त कर चुका था।

तद्वधार्थं महाबाहुरेष चक्रगदासिधृक् ।
जातो वृष्णिषु देवक्यां वासुदेवो जनार्दनः ॥
उसीके वधके लिये चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले ये महाबाहु श्रीकृष्ण वृष्णिकुलमें देवकीके गर्भसे उत्पन्न हुए हैं। वसुदेवजीके पुत्र होनेसे ये जनार्दन ‘वासुदेव’ कहलाते हैं।

तस्यास्य पुरुषेन्द्रस्य लोकप्रथिततेजसः ।
निवासो द्वारका तात विदितो वः प्रधानतः ॥
तात युधिष्ठिर! इनका तेज सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात है। इन पुरुषोत्तम श्रीकृष्णका निवासस्थान प्रधानतः द्वारका ही है, यह तुम सब लोग जानते हो।

अतीव हि पुरी रम्या द्वारका वासवक्षयात् ।
अति वै राजते पृथ्व्यां प्रत्यक्षं ते युधिष्ठिर ॥

द्वारकापुरी इन्द्रके निवासस्थान अमरावती पुरीसे भी अत्यन्त रमणीय है। युधिष्ठिर! भूमण्डलमें द्वारकाकी शोभा सबसे अधिक है। यह तो तुम प्रत्यक्ष ही देख चुके हो।

तस्मिन् देवपुरप्रख्ये सा सभा वृष्ण्युपाश्रया ।
या दाशार्हीति विख्याता योजनायतविस्तृता ॥
देवपुरीके समान सुशोभित द्वारका नगरीमें वृष्णिवंशियोंके बैठनेके लिये एक सुन्दर सभा है, जो दाशार्हीके नामसे विख्यात है। उसकी लम्बाई और चौड़ाई एक-एक योजनकी है।

तत्र वृष्ण्यन्धकाः सर्वे रामकृष्णपुरोगमाः ।
लोकयात्रामिमां कृत्स्नां परिरक्षन्त आसते ॥
उसमें बलराम और श्रीकृष्ण आदि वृष्णि और अन्धकवंशके सभी लोग बैठते हैं और सम्पूर्ण लोक-जीवनकी रक्षामें दत्तचित्त रहते हैं।

तत्रासीनेषु सर्वेषु कदाचिद् भरतर्षभ ।
दिव्यगन्धा ववुर्वाताः कुसुमानां च वृष्टयः ॥
भरतश्रेष्ठ! एक दिनकी बात है; सभी यदुवंशी उस सभामें विराजमान थे। इतनेमें ही दिव्य सुगन्धसे भरी हुई वायु चलने लगी और दिव्य कुसुमोंकी वर्षा होने लगी।

ततः सूर्यसहस्राभस्तेजोराशिर्महाद्भुतः ।
मुहूर्तमन्तरिक्षेऽभूत् ततो भूमौ प्रतिष्ठितः ॥
तदनन्तर दो ही घड़ीके अंदर आकाशमें सहस्रों सूर्योंके समान महान् एवं अद्भुत तेजोराशि प्रकट हुई। वह धीरे-धीरे पृथ्वीपर आकर खड़ी हो गयी।

मध्ये तु तेजसस्तस्य पाण्डरं गजमास्थितः ।
वृतो देवगणैः सर्वैर्वासवः प्रत्यदृश्यत ॥
उस तेजोमण्डलके भीतर श्वेत हाथीपर बैठे हुए इन्द्र सम्पूर्ण देवताओंसहित दिखायी दिये।

रामकृष्णौ च राजा च वृष्ण्यन्धकगणैः सह ।
उत्पत्य सहसा तस्मै नमस्कारमकुर्वत ॥
बलराम, श्रीकृष्ण तथा राजा उग्रसेन वृष्णि और अन्धकवंशके अन्य लोगोंके साथ सहसा उठकर बाहर आये और सबने देवराज इन्द्रको नमस्कार किया।

सोऽवतीर्य गजात् तूर्णं परिष्वज्य जनार्दनम् ।
सस्वजे बलदेवं च राजानं च तमाहुकम् ॥
इन्द्रने हाथीसे उतरकर शीघ्र ही भगवान् श्रीकृष्णको हृदयसे लगाया। फिर बलराम तथा राजा उग्रसेनसे भी उसी प्रकार मिले।

उद्धवं वसुदेवं च विकद्रुं च महामतिम् ।
प्रद्युम्नसाम्बनिशठाननिरुद्धं ससात्यकिम् ॥

गदं सारणमक्रूरं कृतवर्माणमेव च । चारुदेष्णं सुदेष्णं च अन्यानपि यथोचितम् ।। परिष्वज्य च दृष्ट्वा च भगवान् भूतभावनः । भूतभावन ऐश्वर्यशाली इन्द्रने वसुदेव, उद्धव, महामति विकद्रु, प्रद्युम्न, साम्ब, निशठ, अनिरुद्ध, सात्यकि, गद, सारण, अक्रूर, कृतवर्मा, चारुदेष्ण तथा सुदेष्ण आदि अन्य यादवोंका भी यथोचित रीतिसे आलिंगन करके उन सबकी ओर दृष्टिपात किया। वृष्ण्यन्धकमहामात्रान् परिष्वज्याथ वासवः ।। प्रगृह्य पूजां तैर्दत्तामुवाचावनताननः । इस प्रकार उन्होंने वृष्णि और अन्धकवंशके प्रधान व्यक्तियोंको हृदयसे लगाकर उनकी दी हुई पूजा ग्रहण की तथा मुखको नीचेकी ओर झुकाकर वे इस प्रकार बोले—

इन्द्र उवाच

अदित्या चोदितः कृष्ण तव मात्राहामागतः ।। कुण्डलेऽपहृते तात भौमेन नरकेण च । इन्द्रने कहा—भैया कृष्ण! तुम्हारी माता अदितिकी आज्ञासे मैं यहाँ आया हूँ। तात! भूमिपुत्र नरकासुरने उनके कुण्डल छीन लिये हैं। निदेशशब्दवाच्यस्त्वं लोकेऽस्मिन् मधुसूदन ।। तस्माज्जहि महाभाग भूमिपुत्रं नरेश्वर । मधुसूदन! इस लोकमें माताका आदेश सुननेके पात्र केवल तुम्हीं हो। अतः महाभाग नरेश्वर! तुम भौमासुरको मार डालो।

भीष्म उवाच

तमुवाच महाबाहुः प्रीयमाणो जनार्दनः । निर्जित्य नरकं भौममाहरिष्यामि कुण्डले ।। भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! तब महाबाहु जनार्दन अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले—'देवराज! मैं भूमिपुत्र नरकासुरको पराजित करके माताजीके कुण्डल अवश्य ला दूँगा'। एवमुक्त्वा तु गोविन्दो राममेवाभ्यभाषत । प्रद्युम्नमनिरुद्धं च साम्बं चाप्रतिमं बले ।। एतांश्चोक्त्वा तदा तत्र वासुदेवो महायशाः । अथारुह्य सुपर्णं वै शङ्खचक्रगदासिधृक् ।। ययौ तदा हृषीकेशो देवानां हितकाम्यया । ऐसा कहकर भगवान् गोविन्दने बलरामजीसे बातचीत की। तत्पश्चात् प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और अनुपम बलवान् साम्बसे भी इसके विषयमें वार्तालाप करके महायशस्वी इन्द्रियाधीश्वर

भगवान् श्रीकृष्ण शंख, चक्र, गदा और खड्ग धारणकर गरुड़पर आरूढ़ हो देवताओंका हित करनेकी इच्छासे वहाँसे चल दिये।

तं प्रयान्तममित्रघ्नं देवाः सहपुरन्दराः ।।
पृष्ठतोऽनुययुः प्रीताः स्तुवन्तो विष्णुमच्युतम् ।
शत्रुनाशन भगवान् श्रीकृष्णको प्रस्थान करते देख इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता बड़े प्रसन्न हुए और अच्युत भगवान् कृष्णकी स्तुति करते हुए उन्हींके पीछे-पीछे चले।

सोऽग्रयान् रक्षोगणान् हत्वा नरकस्य महासुरान् ।।
क्षुरान्तान् मौरवान् पाशान् षट्सहस्रं ददर्श सः ।
भगवान् श्रीकृष्णने नरकासुरके उन मुख्य-मुख्य राक्षसोंको मारकर मुर दैत्यके बनाये हुए छः हजार पाशोंको देखा, जिनके किनारोंके भागोंमें छुरे लगे हुए थे।

संछिद्य पाशांस्त्वस्त्रेण मुरं हत्वा सहानुवयम् ।।
शिलासंङ्घानतिक्रम्य निशुम्भमवपोथयत् ।
भगवान्ने अपने अस्त्र (चक्र)-से मुर दैत्यके पाशोंको काटकर मुर नामक असुरको उसके वंशजों-सहित मार डाला और शिलाओंके समूहोंको लाँघकर निशुम्भको भी मार गिराया।

यः सहस्रसमस्त्वेकः सर्वान् देवानयोधयत् ।।
तं जघान महावीर्यं हयग्रीवं महाबलम् ।

तत्पश्चात् जो अकेला ही सहस्रों योद्धाओंके समान था और सम्पूर्ण देवताओंके साथ अकेला ही युद्ध कर सकता था, उस महाबली एवं महापराक्रमी हयग्रीवको भी मार दिया।

अपारतेजा दुर्धर्षः सर्वयादवनन्दनः ॥
मध्ये लोहितगङ्गायां भगवान् देवकीसुतः ।
औदकायां विरूपाक्षं जघान भरतर्षभ ॥
पञ्च पञ्चजनान् घोरान् नरकस्य महासुरान् ।
भरतश्रेष्ठ! सम्पूर्ण यादवोंको आनन्दित करनेवाले अमित तेजस्वी दुर्धर्ष वीर भगवान् देवकीनन्दनने औदकाके अन्तर्गत लोहितगंगाके बीच विरूपाक्षको तथा 'पंचजन' नामसे प्रसिद्ध नरकासुरके पाँच भयंकर राक्षसोंको भी मार गिराया।

ततः प्राग्ज्योतिषं नाम दीप्यमानमिव श्रिया ॥
पुरमासादयामास तत्र युद्धमवर्तत ।
फिर भगवान् अपनी शोभासे उद्दीप्त-से दिखायी देनेवाले प्राग्ज्योतिषपुरमें जा पहुँचे। वहाँ उनका दानवोंसे फिर युद्ध छिड़ गया।

महद् दैवासुरं युद्धं यद् वृत्तं भरतर्षभ ॥
युद्धं न स्यात् समं तेन लोकविस्मयकारकम् ।
भरतकुलभूषण! वह युद्ध महान् देवासुर-संग्रामके रूपमें परिणत हो गया। उसके समान लोकविस्मयकारी युद्ध दूसरा कोई नहीं हो सकता।

चक्रलाञ्छनसंछिन्नाः शक्तिखड्गहतास्तदा ॥
निपेतुर्दानवास्तत्र समासाद्य जनार्दनम् ।
चक्रधारी भगवान् श्रीकृष्णसे भिड़कर सभी दानव वहाँ चक्रसे छिन्न-भिन्न एवं शक्ति तथा खड्गसे आहत होकर धराशायी हो गये।

अष्टौ शतसहस्राणि दानवानां परंतप ।
निहत्य पुरुषव्याघ्रः पातालविवरं ययौ ॥
त्रासनं सुरसङ्घानां नरकं पुरुषोत्तमः ।
योधयत्यतितेजस्वी मधुवन्मधुसूदनः ॥
परंतप युधिष्ठिर! इस प्रकार आठ लाख दानवोंका संहार करके पुरुषसिंह पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण पातालगुफामें गये, जहाँ देवसमुदायको आतंकित करनेवाला नरकासुर रहता था। अत्यन्त तेजस्वी भगवान् मधुसूदनने मधुकी भाँति पराक्रमी नरकासुरसे युद्ध प्रारम्भ किया।

तद् युद्धमभवद् घोरं तेन भौमेन भारत ।
कुण्डलार्थे सुरेशस्य नरकेण महात्मना ॥
भारत! देवमाता अदितिके कुण्डलोंके लिये भूमिपुत्र महाकाय नरकासुरके साथ छिड़ा हुआ वह युद्ध बड़ा भयंकर था।

मुहूर्तं लालयित्वाथ नरकं मधुसूदनः ।

प्रवृत्तचक्रं चक्रेण प्रममाथ बलाद् बली ॥ बलवान् मधुसूदनने चक्र हाथमें लिये हुए नरकासुरके साथ दो घड़ीतक खिलवाड़ करके बलपूर्वक चक्रसे उसके मस्तकको काट डाला। चक्रप्रमथितं तस्य पपात सहसा भुवि । उत्तमाङ्गं हताङ्गस्य वृत्रे वज्रहते यथा ॥ चक्रसे छिन्न-भिन्न होकर घायल हुए शरीरवाले नरकासुरका मस्तक वज्रके मारे हुए वृत्रासुरके सिरकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा। भूमिस्तु पतितं दृष्ट्वा ते वै प्रादाच्च कुण्डले । प्रदाय च महाबाहुमिदं वचनमब्रवीत् ॥ भूमिने अपने पुत्रको रणभूमिमें गिरा देख अदितिके दोनों कुण्डल लौटा दिये और महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा।

भूमिरुवाच

सृष्टस्त्वयैव मधुहंस्त्वयैव निहतः प्रभो । यथेच्छसि तथा क्रीडन् प्रजास्तस्यानुपालय ॥ **भूमि बोली—**प्रभो मधुसूदन! आपने ही इसे जन्म दिया था और आपने ही इसे मारा है। आपकी जैसी इच्छा हो, वैसी ही लीला करते हुए नरकासुरकी संतानका पालन कीजिये।

श्रीभगवानुवाच