भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1924

तस्य भोजपतेः पुत्राद् भोजराज्यविवर्धनात् ।। उद्विजन्ते स्म राजानः सुपर्णादिव पन्नगाः । भोजवंशके राज्यकी वृद्धि करनेवाले भोजराजकुमार कंससे भूमण्डलके सब राजा उसी प्रकार उद्विग्न रहते थे, जैसे गरुड़से सर्प। चित्रकार्मुकनिस्त्रिंशविमलप्रासयोधिनः ।। शतं शतसहस्राणि पादातास्तस्य भारत । भरतनन्दन! उसके यहाँ धनुष, खड्ग और चमचमाते हुए भाले लेकर विचित्र प्रकारसे युद्ध करनेवाले एक करोड़ पैदल सैनिक थे। अष्टौ शतसहस्राणि शूराणामनिवर्तिनाम् ।। अभवन् भोजराजस्य जाम्बूनदमयध्वजाः । भोजराजके रथी सैनिक, जिनके रथोंपर सुवर्णमय ध्वज फहराते रहते थे तथा जो शूरवीर होनेके साथ ही युद्धमें कभी पीठ दिखलानेवाले नहीं थे, आठ लाखकी संख्यामें थे। स्फुरत्काञ्चनकक्ष्यास्तु गजास्तस्य युधिष्ठिर ।। तावन्त्येव सहस्राणि गजानामनिवर्तिनाम् । युधिष्ठिर! कंसके यहाँ युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले हाथीसवार भी आठ ही लाख थे। उनके हाथियोंकी पीठपर सुवर्णके चमकीले हौदे कसे होते थे। ते च पर्वतसङ्काशाश्चित्रध्वजपताकिनः ।। बभूवुर्भोजराजस्य नित्यं प्रमुदिता गजाः । भोजराजके वे पर्वताकार गजराज विचित्र ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित होते थे और सदा संतुष्ट रहते थे। स्वलङ्कृतानां शीघ्राणां करेणूनां युधिष्ठिर । अभवद् भोजराजस्य द्विस्तावद्धि महद् बलम् ।। युधिष्ठिर! भोजराज कंसके यहाँ आभूषणोंसे सजी हुई शीघ्रगामिनी हथिनियोंकी विशाल सेना गजराजोंकी अपेक्षा दूनी थी। षोडशाश्वसहस्राणि किंशुकाभानि तस्य वै । अपरस्तु महाव्यूहः किशोराणां युधिष्ठिर ।। आरोहवरसम्पन्नो दुर्धर्षः केनचिद् बलात् । स च षोडशसाहस्रः कंसभ्रातृपुरस्सरः ।। उसके यहाँ सोलह हजार घोड़े ऐसे थे, जिनका रंग पलासके फूलकी भाँति लाल था। राजन्! किशोर-अवस्थाके घोड़ोंका एक दूसरा दल भी मौजूद था, जिसकी संख्या सोलह हजार थी। इन अश्वोंके सवार भी बहुत अच्छे थे। इस अश्वसेनाको कोई भी बलपूर्वक दबा नहीं सकता था। कंसका भाई सुनामा इन सबका सरदार था। सुनामा सदृशस्तेन स कंसं पर्यपालयत् ।