भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1925

वह भी कंसके ही समान बलवान् था एवं सदा कंसकी रक्षाके लिये तत्पर रहता था।
य आसन् सर्ववर्णास्तु हयास्तस्य युधिष्ठिर ।।
स गणो मिश्रको नाम षष्टिसाहस्र उच्यते ।
युधिष्ठिर! कंसके यहाँ घोड़ोंका एक और भी बहुत बड़ा दल था, जिसमें सभी रंगके घोड़े थे। उस दलका नाम था मिश्रक। मिश्रकोंकी संख्या साठ हजार बतलायी जाती है।
कंसरोषमहावेगां ध्वजानूपमहाद्रुमाम् ।।
मत्तद्विपमहाग्राहां वैवस्वतवशानुगाम् ।
(कंसके साथ होनेवाला महान् समर एक भयंकर नदीके समान था।) कंसका रोष ही उस नदीका महान् वेग था। ऊँचे-ऊँचे ध्वज तटवर्ती वृक्षोंके समान जान पड़ते थे। मतवाले हाथी बड़े-बड़े ग्राहोंके समान थे। वह नदी यमराजकी आज्ञाके अधीन होकर चलती थी।
शस्त्रजालमहाफेनां सादिवेगमहाजलाम् ।।
गदापरिघपाठीनां नानाकवचशैवलाम् ।
अस्त्र-शस्त्रोंके समूह उसमें फेनका भ्रम उत्पन्न करते थे। सवारोंका वेग उसमें महान् जलप्रवाह-सा प्रतीत होता था। गदा और परिघ पाठीन नामक मछलियोंके सदृश जान पड़ते थे। नाना प्रकारके कवच सेवारके समान थे।
रथनागमहावर्ता नानारुधिरकर्दमाम् ।।
चित्रकार्मुककल्लोलां रथाश्वकलिलह्रदाम् ।
रथ और हाथी उसमें बड़ी-बड़ी भँवरोंका दृश्य उपस्थित करते थे। नाना प्रकारका रक्त ही कीचड़का काम करता था। विचित्र धनुष उठती हुई लहरोंके समान जान पड़ते थे। रथ और अश्वोंका समूह ह्रदके समान था।
महामृधनदीं घोरां योधावर्तननिःस्वनाम् ।।
को वा नारायणादन्यः कंसहन्ता युधिष्ठिर ।
योद्धाओंके इधर-उधर दौड़ने या बोलनेसे जो शब्द होता था, वही उस भयानक समर-सरिताका कलकल नाद था। युधिष्ठिर! भगवान् नारायणके सिवा ऐसे कंसको कौन मार सकता था?
एष शक्ररथे तिष्ठंस्तान्यनीकानि भारत ।।
व्यधमद् भोजपुत्रस्य महाभ्राणीव मारुतः ।
भारत! जैसे हवा बड़े-बड़े बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार इन भगवान् श्रीकृष्णने इन्द्रके रथमें बैठकर कंसकी उपर्युक्त सारी सेनाओंका संहार कर डाला।
तं सभास्थं सहामात्यं हत्वा कंसं सहान्वयम् ।।
मानयामास मानार्हा देवकीं ससुहृद्गणाम् ।
सभामें विराजमान कंसको मन्त्रियों और परिवारके साथ मारकर श्रीकृष्णने सुहृदोंसहित सम्माननीय माता देवकीका समादर किया।