महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1923, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंकार्यका साधन करना असम्भव था, तो भी श्रीकृष्णने उसे पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली।
यश्च सान्दीपनेः पुत्रं जघान भरतर्षभ ।।
सोऽसुरः समरे ताभ्यां समुद्रे विनिपातितः ।
भरतश्रेष्ठ! जिसने सान्दीपानिके पुत्रको मारा था, उस असुरको उन दोनों भाइयोंने युद्ध करके समुद्रमें मार गिराया।
ततः सान्दीपनेः पुत्रः प्रसादादमितौजसः ।।
दीर्घकालं गतः प्रेतं पुनरासीच्छरीरवान् ।
तदनन्तर अमिततेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णके कृपाप्रसादसे सान्दीपानिका पुत्र, जो दीर्घकालसे यमलोकमें जा चुका था, पुनः पूर्ववत् शरीर धारण करके जी उठा।
तदशक्यमचिन्त्यं च दृष्ट्वा सुमहदद्भुतम् ।।
सर्वेषामेव भूतानां विस्मयः समजायत ।
वह अशक्य, अचिन्त्य और अत्यन्त अद्भुत कार्य देखकर सभी प्राणियोंको बड़ा आश्चर्य हुआ।
ऐश्वर्याणि च सर्वाणि गवाश्वं च धनानि च ।।
सर्वं तदुपजह्राते गुरवे रामकेशवौ ।
ततस्तं पुत्रमादाय ददौ च गुरवे प्रभुः ।।
बलराम और श्रीकृष्णने अपने गुरुको सब प्रकारके ऐश्वर्य, गाय, घोड़े और प्रचुर धन सब कुछ दिये। तत्पश्चात् गुरुपुत्रको लेकर भगवान्ने गुरुजीको सौंप दिया।
तं दृष्ट्वा पुत्रमायान्तं सान्दीपनिपुरे जनाः ।
अशक्यमेतत् सर्वेषामचिन्त्यमिति मेनिरे ।।
कश्च नारायणादन्यश्चिन्तयेदिदमद्भुतम् ।
उस पुत्रको आया देख सान्दीपानिके नगरके लोग यह मान गये कि श्रीकृष्णके द्वारा यह ऐसा कार्य सम्पन्न हुआ है, जो अन्य सब लोगोंके लिये असम्भव और अचिन्त्य है। भगवान् नारायणके सिवा दूसरा कौन ऐसा पुरुष है, जो इस अद्भुत कार्यको सोच भी सके (करना तो दूरकी बात है)।
गदापरिघयुद्धेषु सर्वास्त्रेषु च केशवः ।।
परमां मुख्यतां प्राप्तः सर्वलोकेषु विश्रुतः ।
भगवान् श्रीकृष्णने गदा और परिघके युद्धमें तथा सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञानमें सबसे श्रेष्ठ स्थान प्राप्त कर लिया। वे समस्त लोकोंमें विख्यात हो गये।
भोजराजतनूजोऽपि कंसस्तात युधिष्ठिर ।।
अस्त्रज्ञाने बले वीर्ये कार्तवीर्यसमोऽभवत् ।
तात युधिष्ठिर! भोजराजकुमार कंस भी अस्त्रज्ञान, बल और पराक्रममें कार्तवीर्य अर्जुनकी समानता करता था।