महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1922, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंइतना ही नहीं, उन यदुकुलकुमारोंने लेख्य (चित्रकला), गणित, गान्धर्ववेद तथा सारे वेदको भी उतने ही समयके भीतर जान लिया। हस्तिशिक्षामश्वशिक्षां द्वादशाहेन चापतुः । तावुभौ जग्मतुर्वीरौ गुरुं सान्दीपनिं पुनः ।। धनुर्वेदचिकीर्षार्थं धर्मज्ञौ धर्मचारिणौ । गजशिक्षा तथा अश्वशिक्षाको तो उन्होंने कुल बारह दिनोंमें ही प्राप्त कर लिया। इसके बाद वे दोनों धर्मज्ञ एवं धर्मपरायण वीर धनुर्वेद सीखनेके लिये पुनः सान्दीपनि मुनिके पास गये। ताविष्वास्त्रवराचार्यमभिगम्य प्रणम्य च ।। तेन तौ सत्कृतौ राजन् विचरन्ताववन्तिषु । राजन्! धनुर्वेदके श्रेष्ठ आचार्य सान्दीपतिके पास जाकर उन दोनोंने प्रणाम किया। सान्दीपनिने उन्हें सत्कारपूर्वक अपनाया एवं वे फिर अवन्तीमें विचरते हुए वहाँ रहने लगे। पञ्चाशद्भिरहोरात्रैर्दशाङ्गं सुप्रतिष्ठितम् ।। सरहस्यं धनुर्वेदं सकलं ताववापतुः । पचास दिन-रातमें ही उन दोनोंने दस अंगोंसे युक्त, सुप्रतिष्ठित एवं रहस्यसहित सम्पूर्ण धनुर्वेदका ज्ञान प्राप्त कर लिया। दृष्ट्वा कृतास्त्रौ विप्रेन्द्रो गुर्वर्थे तावचोदयत् ।। अयाचतार्थं गोविन्दं ततः सान्दीपनिर्विभुः । उन दोनों भाइयोंको अस्त्र-विद्यामें निपुण देखकर विप्रवर सान्दीपनिने उन्हें गुरुदक्षिणा देनेकी आज्ञा दी। सान्दीपनिजी सब विषयोंमें विद्वान् थे। उन्होंने श्रीकृष्णसे अपने अभीष्ट मनोरथकी याचना इस प्रकार की।
सान्दीपनिरुवाच
मम पुत्रः समुद्रेऽस्मिंस्तिमिना चापवाहितः ।। पुत्रमानय भद्रं ते भक्षितं तिमिना मम । **सान्दीपनिजी बोले—**मेरा पुत्र इस समुद्रमें नहा रहा था, उस समय 'तिमि' नामक जलजन्तु उसे पकड़कर भीतर ले गया और उसके शरीरको खा गया। तुम दोनोंका भला हो। मेरे उस मरे हुए पुत्रको जीवित करके यहाँ ला दो।
भीष्म उवाच
आर्ताय गुरवे तत्र प्रतिशुश्राव दुष्करम् ।। अशक्यं त्रिषु लोकेषु कर्तुमन्येन केनचित् । **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! इतना कहते-कहते गुरु सान्दीपनि पुत्रशोकसे आर्त हो गये। यद्यपि उनकी माँग बहुत कठिन थी, तीनों लोकोंमें दूसरे किसी पुरुषके लिये इस