महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहत्वा कंसममित्रघ्नः सर्वेषां पश्यतां तदा ।
अभिषिच्योग्रसेनं तं पित्रोः पादमवन्दत ॥
फिर शत्रुनाशन श्रीकृष्णने सब लोगोंके सामने ही कंसको मारकर उग्रसेनको राजपदपर अभिषिक्त कर दिया और अपने माता-पिता देवकी-वसुदेवके चरणोंमें प्रणाम किया।
एवमादीनि कर्माणि कृतवान् वै जनार्दनः ।
उवास कतिचित् तत्र दिनानि सहलायुधः ॥
इस प्रकार जनार्दनने कितने ही अद्भुत कार्य किये और कुछ दिनोंतक बलरामजीके साथ वे मथुरामें ही रहे।
ततस्तौ जग्मतुस्तात गुरुं सान्दीपनिं पुनः ।
गुरुशुश्रूषया युक्तौ धर्मज्ञौ धर्मचारिणौ ॥
तात युधिष्ठिर! तदनन्तर वे दोनों धर्मज्ञ भाई गुरु सान्दीपतिके यहाँ (उज्जयिनीपुरीमें) विद्याध्ययनके लिये गये। वहाँ वे गुरुसेवा-परायण हो सदा धर्मके ही अनुष्ठानमें लगे रहे।
व्रतमुग्रं महात्मानौ विचरन्तावतिष्ठताम् ।
अहोरात्रचतुष्षष्ट्या षडङ्गं वेदमवापतुः ॥
वे दोनों महात्मा कठोर व्रतका पालन करते हुए वहाँ रहते थे। उन्होंने चौंसठ दिन-रातमें ही छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान प्राप्त कर लिया।
लेख्यं च गणितं चोभौ प्राप्तुतां यदुनन्दनौ ।
गान्धर्ववेदं वैद्यं च सकलं समवापतुः ॥