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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

कार्यका साधन करना असम्भव था, तो भी श्रीकृष्णने उसे पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली।
यश्च सान्दीपनेः पुत्रं जघान भरतर्षभ ।।
सोऽसुरः समरे ताभ्यां समुद्रे विनिपातितः ।
भरतश्रेष्ठ! जिसने सान्दीपानिके पुत्रको मारा था, उस असुरको उन दोनों भाइयोंने युद्ध करके समुद्रमें मार गिराया।
ततः सान्दीपनेः पुत्रः प्रसादादमितौजसः ।।
दीर्घकालं गतः प्रेतं पुनरासीच्छरीरवान् ।
तदनन्तर अमिततेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णके कृपाप्रसादसे सान्दीपानिका पुत्र, जो दीर्घकालसे यमलोकमें जा चुका था, पुनः पूर्ववत् शरीर धारण करके जी उठा।
तदशक्यमचिन्त्यं च दृष्ट्वा सुमहदद्भुतम् ।।
सर्वेषामेव भूतानां विस्मयः समजायत ।
वह अशक्य, अचिन्त्य और अत्यन्त अद्भुत कार्य देखकर सभी प्राणियोंको बड़ा आश्चर्य हुआ।
ऐश्वर्याणि च सर्वाणि गवाश्वं च धनानि च ।।
सर्वं तदुपजह्राते गुरवे रामकेशवौ ।
ततस्तं पुत्रमादाय ददौ च गुरवे प्रभुः ।।
बलराम और श्रीकृष्णने अपने गुरुको सब प्रकारके ऐश्वर्य, गाय, घोड़े और प्रचुर धन सब कुछ दिये। तत्पश्चात् गुरुपुत्रको लेकर भगवान्ने गुरुजीको सौंप दिया।
तं दृष्ट्वा पुत्रमायान्तं सान्दीपनिपुरे जनाः ।
अशक्यमेतत् सर्वेषामचिन्त्यमिति मेनिरे ।।
कश्च नारायणादन्यश्चिन्तयेदिदमद्भुतम् ।
उस पुत्रको आया देख सान्दीपानिके नगरके लोग यह मान गये कि श्रीकृष्णके द्वारा यह ऐसा कार्य सम्पन्न हुआ है, जो अन्य सब लोगोंके लिये असम्भव और अचिन्त्य है। भगवान् नारायणके सिवा दूसरा कौन ऐसा पुरुष है, जो इस अद्भुत कार्यको सोच भी सके (करना तो दूरकी बात है)।
गदापरिघयुद्धेषु सर्वास्त्रेषु च केशवः ।।
परमां मुख्यतां प्राप्तः सर्वलोकेषु विश्रुतः ।
भगवान् श्रीकृष्णने गदा और परिघके युद्धमें तथा सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञानमें सबसे श्रेष्ठ स्थान प्राप्त कर लिया। वे समस्त लोकोंमें विख्यात हो गये।
भोजराजतनूजोऽपि कंसस्तात युधिष्ठिर ।।
अस्त्रज्ञाने बले वीर्ये कार्तवीर्यसमोऽभवत् ।
तात युधिष्ठिर! भोजराजकुमार कंस भी अस्त्रज्ञान, बल और पराक्रममें कार्तवीर्य अर्जुनकी समानता करता था।

तस्य भोजपतेः पुत्राद् भोजराज्यविवर्धनात् ।। उद्विजन्ते स्म राजानः सुपर्णादिव पन्नगाः । भोजवंशके राज्यकी वृद्धि करनेवाले भोजराजकुमार कंससे भूमण्डलके सब राजा उसी प्रकार उद्विग्न रहते थे, जैसे गरुड़से सर्प। चित्रकार्मुकनिस्त्रिंशविमलप्रासयोधिनः ।। शतं शतसहस्राणि पादातास्तस्य भारत । भरतनन्दन! उसके यहाँ धनुष, खड्ग और चमचमाते हुए भाले लेकर विचित्र प्रकारसे युद्ध करनेवाले एक करोड़ पैदल सैनिक थे। अष्टौ शतसहस्राणि शूराणामनिवर्तिनाम् ।। अभवन् भोजराजस्य जाम्बूनदमयध्वजाः । भोजराजके रथी सैनिक, जिनके रथोंपर सुवर्णमय ध्वज फहराते रहते थे तथा जो शूरवीर होनेके साथ ही युद्धमें कभी पीठ दिखलानेवाले नहीं थे, आठ लाखकी संख्यामें थे। स्फुरत्काञ्चनकक्ष्यास्तु गजास्तस्य युधिष्ठिर ।। तावन्त्येव सहस्राणि गजानामनिवर्तिनाम् । युधिष्ठिर! कंसके यहाँ युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले हाथीसवार भी आठ ही लाख थे। उनके हाथियोंकी पीठपर सुवर्णके चमकीले हौदे कसे होते थे। ते च पर्वतसङ्काशाश्चित्रध्वजपताकिनः ।। बभूवुर्भोजराजस्य नित्यं प्रमुदिता गजाः । भोजराजके वे पर्वताकार गजराज विचित्र ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित होते थे और सदा संतुष्ट रहते थे। स्वलङ्कृतानां शीघ्राणां करेणूनां युधिष्ठिर । अभवद् भोजराजस्य द्विस्तावद्धि महद् बलम् ।। युधिष्ठिर! भोजराज कंसके यहाँ आभूषणोंसे सजी हुई शीघ्रगामिनी हथिनियोंकी विशाल सेना गजराजोंकी अपेक्षा दूनी थी। षोडशाश्वसहस्राणि किंशुकाभानि तस्य वै । अपरस्तु महाव्यूहः किशोराणां युधिष्ठिर ।। आरोहवरसम्पन्नो दुर्धर्षः केनचिद् बलात् । स च षोडशसाहस्रः कंसभ्रातृपुरस्सरः ।। उसके यहाँ सोलह हजार घोड़े ऐसे थे, जिनका रंग पलासके फूलकी भाँति लाल था। राजन्! किशोर-अवस्थाके घोड़ोंका एक दूसरा दल भी मौजूद था, जिसकी संख्या सोलह हजार थी। इन अश्वोंके सवार भी बहुत अच्छे थे। इस अश्वसेनाको कोई भी बलपूर्वक दबा नहीं सकता था। कंसका भाई सुनामा इन सबका सरदार था। सुनामा सदृशस्तेन स कंसं पर्यपालयत् ।

वह भी कंसके ही समान बलवान् था एवं सदा कंसकी रक्षाके लिये तत्पर रहता था।
य आसन् सर्ववर्णास्तु हयास्तस्य युधिष्ठिर ।।
स गणो मिश्रको नाम षष्टिसाहस्र उच्यते ।
युधिष्ठिर! कंसके यहाँ घोड़ोंका एक और भी बहुत बड़ा दल था, जिसमें सभी रंगके घोड़े थे। उस दलका नाम था मिश्रक। मिश्रकोंकी संख्या साठ हजार बतलायी जाती है।
कंसरोषमहावेगां ध्वजानूपमहाद्रुमाम् ।।
मत्तद्विपमहाग्राहां वैवस्वतवशानुगाम् ।
(कंसके साथ होनेवाला महान् समर एक भयंकर नदीके समान था।) कंसका रोष ही उस नदीका महान् वेग था। ऊँचे-ऊँचे ध्वज तटवर्ती वृक्षोंके समान जान पड़ते थे। मतवाले हाथी बड़े-बड़े ग्राहोंके समान थे। वह नदी यमराजकी आज्ञाके अधीन होकर चलती थी।
शस्त्रजालमहाफेनां सादिवेगमहाजलाम् ।।
गदापरिघपाठीनां नानाकवचशैवलाम् ।
अस्त्र-शस्त्रोंके समूह उसमें फेनका भ्रम उत्पन्न करते थे। सवारोंका वेग उसमें महान् जलप्रवाह-सा प्रतीत होता था। गदा और परिघ पाठीन नामक मछलियोंके सदृश जान पड़ते थे। नाना प्रकारके कवच सेवारके समान थे।
रथनागमहावर्ता नानारुधिरकर्दमाम् ।।
चित्रकार्मुककल्लोलां रथाश्वकलिलह्रदाम् ।
रथ और हाथी उसमें बड़ी-बड़ी भँवरोंका दृश्य उपस्थित करते थे। नाना प्रकारका रक्त ही कीचड़का काम करता था। विचित्र धनुष उठती हुई लहरोंके समान जान पड़ते थे। रथ और अश्वोंका समूह ह्रदके समान था।
महामृधनदीं घोरां योधावर्तननिःस्वनाम् ।।
को वा नारायणादन्यः कंसहन्ता युधिष्ठिर ।
योद्धाओंके इधर-उधर दौड़ने या बोलनेसे जो शब्द होता था, वही उस भयानक समर-सरिताका कलकल नाद था। युधिष्ठिर! भगवान् नारायणके सिवा ऐसे कंसको कौन मार सकता था?
एष शक्ररथे तिष्ठंस्तान्यनीकानि भारत ।।
व्यधमद् भोजपुत्रस्य महाभ्राणीव मारुतः ।
भारत! जैसे हवा बड़े-बड़े बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार इन भगवान् श्रीकृष्णने इन्द्रके रथमें बैठकर कंसकी उपर्युक्त सारी सेनाओंका संहार कर डाला।
तं सभास्थं सहामात्यं हत्वा कंसं सहान्वयम् ।।
मानयामास मानार्हा देवकीं ससुहृद्गणाम् ।
सभामें विराजमान कंसको मन्त्रियों और परिवारके साथ मारकर श्रीकृष्णने सुहृदोंसहित सम्माननीय माता देवकीका समादर किया।

यशोदां रोहिणीं चैव अभिवाद्य पुनः पुनः ॥
उग्रसेनं च राजानमभिषिच्य जनार्दनः ।
अर्चितो यदुमुख्यैश्च भगवान् वासवानुजः ॥

जनार्दनने यशोदा और रोहिणीको भी बारंबार प्रणाम करके उग्रसेनको राजाके पदपर अभिषिक्त किया। उस समय यदुकुलके प्रधान-प्रधान पुरुषोंने इन्द्रके छोटे भाई भगवान् श्रीहरिका पूजन किया।
ततः पार्थिवमायान्तं सहितं सर्वराजभिः ।
सरस्वत्यां जरासंधमजयत् पुरुषोत्तमः ॥

तदनन्तर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने समस्त राजाओंके सहित आक्रमण करनेवाले राजा जरासंधको सरोवरों या ह्रदोंसे सुशोभित यमुनाके तटपर परास्त किया।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

[नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना]

भीष्म उवाच

शूरसेनपुरं त्यक्त्वा सर्वयादवनन्दनः । द्वारकां भगवान् कृष्णः प्रत्यपद्यत केशवः ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर समस्त यदुवंशियोंको आनन्दित करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण शूरसेनपुरी मथुराको छोड़कर द्वारकामें चले गये।

प्रत्यपद्यत यानानि रत्नानि च बहूनि च । यथार्हं पुण्डरीकाक्षो नैर्ऋतान् प्रतिपालयन् ॥ कमलनयन श्रीकृष्णने असुरोंको पराजित करके जो बहुत-से रत्न और वाहन प्राप्त किये थे, उनका वे द्वारकामें यथोचितरूपसे संरक्षण करते थे।

तत्र विघ्नं चरन्ति स्म दैतेयाः सह दानवैः । ताञ्जघान महाबाहुः वरमत्तान् महासुरान् ॥ उनके इस कार्यमें दैत्य और दानव विघ्न डालने लगे। तब महाबाहु श्रीकृष्णने वरदानसे उन्मत्त हुए उन बड़े-बड़े असुरोंको मार डाला।

स विघ्नमकरोत् तत्र नरको नाम नैर्ऋतः । त्रासनः सुरसंघानां विदितो वः प्रभावतः ॥ तत्पश्चात् नरक नामक राक्षसने भगवान्‌के कार्यमें विघ्न डालना आरम्भ किया। वह समस्त देवताओंको भयभीत करनेवाला था। राजन्! तुम्हें तो उसका प्रभाव विदित ही है।

स भूम्यां मूर्तिलिङ्गस्थः सर्वदेवासुरान्तकः । मानुषाणामृषीणां च प्रतीपमकरोत् तदा ॥ समस्त देवताओंके लिये अन्तकरूप नरकासुर इस धरतीके भीतर मूर्तिलिंगमें* स्थित हो मनुष्यों और ऋषियोंके प्रतिकूल आचरण किया करता था।

त्वष्टुर्दुहितरं भौमः कशेरुमगमत् तदा । गजरूपेण जग्राह रुचिराङ्गीं चतुर्दशीम् ॥ भूमिका पुत्र होनेसे नरकको भौमासुर भी कहते हैं। उसने हाथीका रूप धारण करके प्रजापति त्वष्टाकी पुत्री कशेरुके पास जाकर उसे पकड़ लिया। कशेरु बड़ी सुन्दरी और चौदह वर्षकी अवस्थावाली थी।

प्रमथ्य च जहारैतां हृत्वा च नरकोऽब्रवीत् । नष्टशोकभयाबाधः प्राग्ज्योतिषपतिस्तदा ॥

नरकासुर प्राग्ज्योतिषपुरका राजा था। उसके शोक, भय और बाधाएँ दूर हो गयी थीं। उसने कशेरुको मूर्च्छित करके हर लिया और अपने घर लाकर उससे इस प्रकार कहा।

नरक उवाच

यानि देवमनुष्येषु रत्नानि विविधानि च ।
बिभर्ति च मही कृत्स्ना सागरेषु च यद् वसु ॥
अद्यप्रभृति तद् देवि सहिताः सर्वनेर्ऋताः ।
तवैवोपहरिष्यन्ति दैत्याश्च सह दानवैः ॥
**नरकासुर बोला—**देवि! देवताओं और मनुष्योंके पास जो नाना प्रकारके रत्न हैं, सारी पृथ्वी जिन रत्नोंको धारण करती है तथा समुद्रोंमें जो रत्न संचित हैं, उन सबको आजसे सभी राक्षस ला-लाकर तुम्हें ही अर्पित किया करेंगे। दैत्य और दानव भी तुम्हें उत्तमोत्तम रत्नोंकी भेंट देंगे।

भीष्म उवाच

एवमुत्तमरत्नानि बहूनि विविधानि च ।
स जहार तदा भौमः स्त्रीरत्नानि च भारत ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**भारत! इस प्रकार भौमासुरने नाना प्रकारके बहुत-से उत्तम रत्नों तथा स्त्री-रत्नोंका भी अपहरण किया।
गन्धर्वाणां च याः कन्या जहार नरको बलात् ।
याश्च देवमनुष्याणां सप्त चाप्सरसां गणाः ॥
गन्धर्वोंकी जो कन्याएँ थीं, उन्हें भी नरकासुर बलपूर्वक हर लाया। देवताओं और मनुष्योंकी कन्याओं तथा अप्सराओंके सात समुदायोंका भी उसने अपहरण कर लिया।
चतुर्दशसहस्राणां चैकविंशच्छतानि च ।
एकवेणीधराः सर्वाः सतां मार्गमनुव्रताः ॥
इस प्रकार सोलह हजार एक सौ सुन्दरी कुमारियाँ उसके घरमें एकत्र हो गयीं। वे सब-की-सब सत्पुरुषोंके मार्गका अनुसरण करके व्रत और नियमके पालनमें तत्पर हो एक वेणी धारण करती थीं।
तासामन्तःपुरं भौमोऽकारयन्मणिपर्वते ।
औदकायामदीनात्मा मुरस्य विषयं प्रति ॥
उत्साहयुक्त मनवाले भौमासुरने उनके रहनेके लिये मणिपर्वतपर अन्तःपुरका निर्माण कराया। उस स्थानका नाम था औदका (जलकी सुविधासे सम्पन्न भूमि)। वह अन्तःपुर मुर नामक दैत्यके अधिकृत प्रदेशमें बना था।
ताश्च प्राग्ज्योतिषो राजा मुरस्य दश चात्मजाः ।
नैर्ऋताश्च यथा मुख्याः पालयन्त उपासत ॥

प्राग्ज्योतिषपुरका राजा भौमासुर, मुरके दस पुत्र तथा प्रधान-प्रधान राक्षस उस अन्तःपुरकी रक्षा करते हुए सदा उसके समीप ही रहते थे।

स एव तपसां पारे वरदत्तो महीसुतः ।
अदितिं धर्षयामास कुण्डलार्थं युधिष्ठिर ॥
युधिष्ठिर! पृथ्वीपुत्र भौमासुर तपस्याके अन्तमें वरदान पाकर इतना गर्वोन्मत्त हो गया था कि इसने कुण्डलके लिये देवमाता अदितितकका तिरस्कार कर दिया।

न चासुरगणैः सर्वैः सहितैः कर्म तत् पुरा ।
कृतपूर्वं महाघोरं यदकार्षीन्महासुरः ॥
पूर्वकालमें समस्त महादैत्योंने एक साथ मिलकर भी वैसा अत्यन्त घोर पाप नहीं किया था, जैसा अकेले इस महान् असुरने कर डाला था।

यं मही सुषुवे देवी यस्य प्राग्ज्योतिषं पुरम् ।
विषयान्तपालाश्चत्वारो यस्यासन् युद्धदुर्मदाः ॥
पृथ्वीदेवीने उसे उत्पन्न किया था, प्राग्ज्योतिषपुर उसकी राजधानी थी तथा चार युद्धोन्मत्त दैत्य उसके राज्यकी सीमाकी रक्षा करनेवाले थे।

आदेवयानमावृत्य पन्थानं पर्यवस्थिताः ।
त्रासनाः सुरसङ्घानां विरूपै राक्षसैः सह ॥
वे पृथ्वीसे लेकर देवयानतकके मार्गको रोककर खड़े रहते थे। भयानक रूपवाले राक्षसोंके साथ रहकर वे देवसमुदायको भयभीत किया करते थे।

हयग्रीवो निशुम्भश्च घोरः पञ्चजनस्तथा ।
मुरः पुत्रसहस्रैश्च वरदत्तो महासुरः ॥
उन चारों दैत्योंके नाम इस प्रकार हैं—हयग्रीव, निशुम्भ, भयंकर पंचजन तथा सहस्र पुत्रोंसहित महान् असुर मुर, जो वरदान प्राप्त कर चुका था।

तद्वधार्थं महाबाहुरेष चक्रगदासिधृक् ।
जातो वृष्णिषु देवक्यां वासुदेवो जनार्दनः ॥
उसीके वधके लिये चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले ये महाबाहु श्रीकृष्ण वृष्णिकुलमें देवकीके गर्भसे उत्पन्न हुए हैं। वसुदेवजीके पुत्र होनेसे ये जनार्दन ‘वासुदेव’ कहलाते हैं।

तस्यास्य पुरुषेन्द्रस्य लोकप्रथिततेजसः ।
निवासो द्वारका तात विदितो वः प्रधानतः ॥
तात युधिष्ठिर! इनका तेज सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात है। इन पुरुषोत्तम श्रीकृष्णका निवासस्थान प्रधानतः द्वारका ही है, यह तुम सब लोग जानते हो।

अतीव हि पुरी रम्या द्वारका वासवक्षयात् ।
अति वै राजते पृथ्व्यां प्रत्यक्षं ते युधिष्ठिर ॥

द्वारकापुरी इन्द्रके निवासस्थान अमरावती पुरीसे भी अत्यन्त रमणीय है। युधिष्ठिर! भूमण्डलमें द्वारकाकी शोभा सबसे अधिक है। यह तो तुम प्रत्यक्ष ही देख चुके हो।

तस्मिन् देवपुरप्रख्ये सा सभा वृष्ण्युपाश्रया ।
या दाशार्हीति विख्याता योजनायतविस्तृता ॥
देवपुरीके समान सुशोभित द्वारका नगरीमें वृष्णिवंशियोंके बैठनेके लिये एक सुन्दर सभा है, जो दाशार्हीके नामसे विख्यात है। उसकी लम्बाई और चौड़ाई एक-एक योजनकी है।

तत्र वृष्ण्यन्धकाः सर्वे रामकृष्णपुरोगमाः ।
लोकयात्रामिमां कृत्स्नां परिरक्षन्त आसते ॥
उसमें बलराम और श्रीकृष्ण आदि वृष्णि और अन्धकवंशके सभी लोग बैठते हैं और सम्पूर्ण लोक-जीवनकी रक्षामें दत्तचित्त रहते हैं।

तत्रासीनेषु सर्वेषु कदाचिद् भरतर्षभ ।
दिव्यगन्धा ववुर्वाताः कुसुमानां च वृष्टयः ॥
भरतश्रेष्ठ! एक दिनकी बात है; सभी यदुवंशी उस सभामें विराजमान थे। इतनेमें ही दिव्य सुगन्धसे भरी हुई वायु चलने लगी और दिव्य कुसुमोंकी वर्षा होने लगी।

ततः सूर्यसहस्राभस्तेजोराशिर्महाद्भुतः ।
मुहूर्तमन्तरिक्षेऽभूत् ततो भूमौ प्रतिष्ठितः ॥
तदनन्तर दो ही घड़ीके अंदर आकाशमें सहस्रों सूर्योंके समान महान् एवं अद्भुत तेजोराशि प्रकट हुई। वह धीरे-धीरे पृथ्वीपर आकर खड़ी हो गयी।

मध्ये तु तेजसस्तस्य पाण्डरं गजमास्थितः ।
वृतो देवगणैः सर्वैर्वासवः प्रत्यदृश्यत ॥
उस तेजोमण्डलके भीतर श्वेत हाथीपर बैठे हुए इन्द्र सम्पूर्ण देवताओंसहित दिखायी दिये।

रामकृष्णौ च राजा च वृष्ण्यन्धकगणैः सह ।
उत्पत्य सहसा तस्मै नमस्कारमकुर्वत ॥
बलराम, श्रीकृष्ण तथा राजा उग्रसेन वृष्णि और अन्धकवंशके अन्य लोगोंके साथ सहसा उठकर बाहर आये और सबने देवराज इन्द्रको नमस्कार किया।

सोऽवतीर्य गजात् तूर्णं परिष्वज्य जनार्दनम् ।
सस्वजे बलदेवं च राजानं च तमाहुकम् ॥
इन्द्रने हाथीसे उतरकर शीघ्र ही भगवान् श्रीकृष्णको हृदयसे लगाया। फिर बलराम तथा राजा उग्रसेनसे भी उसी प्रकार मिले।

उद्धवं वसुदेवं च विकद्रुं च महामतिम् ।
प्रद्युम्नसाम्बनिशठाननिरुद्धं ससात्यकिम् ॥

गदं सारणमक्रूरं कृतवर्माणमेव च । चारुदेष्णं सुदेष्णं च अन्यानपि यथोचितम् ।। परिष्वज्य च दृष्ट्वा च भगवान् भूतभावनः । भूतभावन ऐश्वर्यशाली इन्द्रने वसुदेव, उद्धव, महामति विकद्रु, प्रद्युम्न, साम्ब, निशठ, अनिरुद्ध, सात्यकि, गद, सारण, अक्रूर, कृतवर्मा, चारुदेष्ण तथा सुदेष्ण आदि अन्य यादवोंका भी यथोचित रीतिसे आलिंगन करके उन सबकी ओर दृष्टिपात किया। वृष्ण्यन्धकमहामात्रान् परिष्वज्याथ वासवः ।। प्रगृह्य पूजां तैर्दत्तामुवाचावनताननः । इस प्रकार उन्होंने वृष्णि और अन्धकवंशके प्रधान व्यक्तियोंको हृदयसे लगाकर उनकी दी हुई पूजा ग्रहण की तथा मुखको नीचेकी ओर झुकाकर वे इस प्रकार बोले—

इन्द्र उवाच

अदित्या चोदितः कृष्ण तव मात्राहामागतः ।। कुण्डलेऽपहृते तात भौमेन नरकेण च । इन्द्रने कहा—भैया कृष्ण! तुम्हारी माता अदितिकी आज्ञासे मैं यहाँ आया हूँ। तात! भूमिपुत्र नरकासुरने उनके कुण्डल छीन लिये हैं। निदेशशब्दवाच्यस्त्वं लोकेऽस्मिन् मधुसूदन ।। तस्माज्जहि महाभाग भूमिपुत्रं नरेश्वर । मधुसूदन! इस लोकमें माताका आदेश सुननेके पात्र केवल तुम्हीं हो। अतः महाभाग नरेश्वर! तुम भौमासुरको मार डालो।

भीष्म उवाच

तमुवाच महाबाहुः प्रीयमाणो जनार्दनः । निर्जित्य नरकं भौममाहरिष्यामि कुण्डले ।। भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! तब महाबाहु जनार्दन अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले—'देवराज! मैं भूमिपुत्र नरकासुरको पराजित करके माताजीके कुण्डल अवश्य ला दूँगा'। एवमुक्त्वा तु गोविन्दो राममेवाभ्यभाषत । प्रद्युम्नमनिरुद्धं च साम्बं चाप्रतिमं बले ।। एतांश्चोक्त्वा तदा तत्र वासुदेवो महायशाः । अथारुह्य सुपर्णं वै शङ्खचक्रगदासिधृक् ।। ययौ तदा हृषीकेशो देवानां हितकाम्यया । ऐसा कहकर भगवान् गोविन्दने बलरामजीसे बातचीत की। तत्पश्चात् प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और अनुपम बलवान् साम्बसे भी इसके विषयमें वार्तालाप करके महायशस्वी इन्द्रियाधीश्वर

भगवान् श्रीकृष्ण शंख, चक्र, गदा और खड्ग धारणकर गरुड़पर आरूढ़ हो देवताओंका हित करनेकी इच्छासे वहाँसे चल दिये।

तं प्रयान्तममित्रघ्नं देवाः सहपुरन्दराः ।।
पृष्ठतोऽनुययुः प्रीताः स्तुवन्तो विष्णुमच्युतम् ।
शत्रुनाशन भगवान् श्रीकृष्णको प्रस्थान करते देख इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता बड़े प्रसन्न हुए और अच्युत भगवान् कृष्णकी स्तुति करते हुए उन्हींके पीछे-पीछे चले।

सोऽग्रयान् रक्षोगणान् हत्वा नरकस्य महासुरान् ।।
क्षुरान्तान् मौरवान् पाशान् षट्सहस्रं ददर्श सः ।
भगवान् श्रीकृष्णने नरकासुरके उन मुख्य-मुख्य राक्षसोंको मारकर मुर दैत्यके बनाये हुए छः हजार पाशोंको देखा, जिनके किनारोंके भागोंमें छुरे लगे हुए थे।

संछिद्य पाशांस्त्वस्त्रेण मुरं हत्वा सहानुवयम् ।।
शिलासंङ्घानतिक्रम्य निशुम्भमवपोथयत् ।
भगवान्ने अपने अस्त्र (चक्र)-से मुर दैत्यके पाशोंको काटकर मुर नामक असुरको उसके वंशजों-सहित मार डाला और शिलाओंके समूहोंको लाँघकर निशुम्भको भी मार गिराया।

यः सहस्रसमस्त्वेकः सर्वान् देवानयोधयत् ।।
तं जघान महावीर्यं हयग्रीवं महाबलम् ।

तत्पश्चात् जो अकेला ही सहस्रों योद्धाओंके समान था और सम्पूर्ण देवताओंके साथ अकेला ही युद्ध कर सकता था, उस महाबली एवं महापराक्रमी हयग्रीवको भी मार दिया।

अपारतेजा दुर्धर्षः सर्वयादवनन्दनः ॥
मध्ये लोहितगङ्गायां भगवान् देवकीसुतः ।
औदकायां विरूपाक्षं जघान भरतर्षभ ॥
पञ्च पञ्चजनान् घोरान् नरकस्य महासुरान् ।
भरतश्रेष्ठ! सम्पूर्ण यादवोंको आनन्दित करनेवाले अमित तेजस्वी दुर्धर्ष वीर भगवान् देवकीनन्दनने औदकाके अन्तर्गत लोहितगंगाके बीच विरूपाक्षको तथा 'पंचजन' नामसे प्रसिद्ध नरकासुरके पाँच भयंकर राक्षसोंको भी मार गिराया।

ततः प्राग्ज्योतिषं नाम दीप्यमानमिव श्रिया ॥
पुरमासादयामास तत्र युद्धमवर्तत ।
फिर भगवान् अपनी शोभासे उद्दीप्त-से दिखायी देनेवाले प्राग्ज्योतिषपुरमें जा पहुँचे। वहाँ उनका दानवोंसे फिर युद्ध छिड़ गया।

महद् दैवासुरं युद्धं यद् वृत्तं भरतर्षभ ॥
युद्धं न स्यात् समं तेन लोकविस्मयकारकम् ।
भरतकुलभूषण! वह युद्ध महान् देवासुर-संग्रामके रूपमें परिणत हो गया। उसके समान लोकविस्मयकारी युद्ध दूसरा कोई नहीं हो सकता।

चक्रलाञ्छनसंछिन्नाः शक्तिखड्गहतास्तदा ॥
निपेतुर्दानवास्तत्र समासाद्य जनार्दनम् ।
चक्रधारी भगवान् श्रीकृष्णसे भिड़कर सभी दानव वहाँ चक्रसे छिन्न-भिन्न एवं शक्ति तथा खड्गसे आहत होकर धराशायी हो गये।

अष्टौ शतसहस्राणि दानवानां परंतप ।
निहत्य पुरुषव्याघ्रः पातालविवरं ययौ ॥
त्रासनं सुरसङ्घानां नरकं पुरुषोत्तमः ।
योधयत्यतितेजस्वी मधुवन्मधुसूदनः ॥
परंतप युधिष्ठिर! इस प्रकार आठ लाख दानवोंका संहार करके पुरुषसिंह पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण पातालगुफामें गये, जहाँ देवसमुदायको आतंकित करनेवाला नरकासुर रहता था। अत्यन्त तेजस्वी भगवान् मधुसूदनने मधुकी भाँति पराक्रमी नरकासुरसे युद्ध प्रारम्भ किया।

तद् युद्धमभवद् घोरं तेन भौमेन भारत ।
कुण्डलार्थे सुरेशस्य नरकेण महात्मना ॥
भारत! देवमाता अदितिके कुण्डलोंके लिये भूमिपुत्र महाकाय नरकासुरके साथ छिड़ा हुआ वह युद्ध बड़ा भयंकर था।

मुहूर्तं लालयित्वाथ नरकं मधुसूदनः ।

प्रवृत्तचक्रं चक्रेण प्रममाथ बलाद् बली ॥ बलवान् मधुसूदनने चक्र हाथमें लिये हुए नरकासुरके साथ दो घड़ीतक खिलवाड़ करके बलपूर्वक चक्रसे उसके मस्तकको काट डाला। चक्रप्रमथितं तस्य पपात सहसा भुवि । उत्तमाङ्गं हताङ्गस्य वृत्रे वज्रहते यथा ॥ चक्रसे छिन्न-भिन्न होकर घायल हुए शरीरवाले नरकासुरका मस्तक वज्रके मारे हुए वृत्रासुरके सिरकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा। भूमिस्तु पतितं दृष्ट्वा ते वै प्रादाच्च कुण्डले । प्रदाय च महाबाहुमिदं वचनमब्रवीत् ॥ भूमिने अपने पुत्रको रणभूमिमें गिरा देख अदितिके दोनों कुण्डल लौटा दिये और महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा।

भूमिरुवाच

सृष्टस्त्वयैव मधुहंस्त्वयैव निहतः प्रभो । यथेच्छसि तथा क्रीडन् प्रजास्तस्यानुपालय ॥ **भूमि बोली—**प्रभो मधुसूदन! आपने ही इसे जन्म दिया था और आपने ही इसे मारा है। आपकी जैसी इच्छा हो, वैसी ही लीला करते हुए नरकासुरकी संतानका पालन कीजिये।

श्रीभगवानुवाच

देवानां च मुनीनां च पितॄणां च महात्मनाम् ।
उद्वेजनीयो भूतानां ब्रह्मद्विट् पुरुषाधमः ॥
लोकद्विष्टः सुतस्ते तु देवारिर्लोककण्टकः ।
श्रीभगवान्ने कहा— भामिनि! तुम्हारा यह पुत्र देवताओं, मुनियों, पितरों, महात्माओं तथा सम्पूर्ण भूतोंके उद्वेगका पात्र हो रहा था। यह पुरुषाधम ब्राह्मणोंसे द्वेष रखनेवाला, देवताओंका शत्रु तथा सम्पूर्ण विश्वका कण्टक था, इसलिये सब लोग इससे द्वेष रखते थे।
सर्वलोकनमस्कार्यामदितिं बाधते बली ॥
कुण्डले दर्पसम्पूर्णस्ततोऽसौ निहतोऽसुरः ।
इस बलवान् असुरने बलके घमंडमें आकर सम्पूर्ण विश्वके लिये वन्दनीय देवमाता अदितिको भी कष्ट पहुँचाया और उनके कुण्डल ले लिये। इन्हीं सब कारणोंसे यह मारा गया है।
नैव मन्युस्त्वया कार्यो यत् कृतं मयि भामिनि ॥
मत्प्रभावाच्च ते पुत्रो लब्धवान् गतिमुत्तमाम् ।
तस्माद् गच्छ महाभागे भारावतरणं कृतम् ॥
भामिनि! मैंने इस समय जो कुछ किया है, उसके लिये तुम्हें मुझपर क्षोभ नहीं करना चाहिये। महाभागे! तुम्हारे पुत्रने मेरे प्रभावसे अत्यन्त उत्तम गति प्राप्त की है; इसलिये जाओ, मैंने तुम्हारा भार उतार दिया है।

अध्याय (पृष्ठ 1936)

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भूमिका भगवान्‌को अदितिके कुण्डल देना

भीष्म उवाच

निहत्य नरकं भौमं सत्यभामासहायवान् ।
सहितो लोकपालैश्च ददर्श नरकालयम् ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! भूमिपुत्र नरकासुरको मारकर सत्यभामासहित भगवान् श्रीकृष्णने लोकपालोंके साथ जाकर नरकासुरके घरको देखा।
अथास्य गृहमासाद्य नरकस्य यशस्विनः ।
ददर्श धनमक्षय्यं रत्नानि विविधानि च ॥
यशस्वी नरकके घरमें जाकर उन्होंने नाना प्रकारके रत्न और अक्षय धन देखा।
मणिमुक्ताप्रवालानि वैडूर्यविकृतानि च ।
अश्मसारानर्कमणीन् विमलान् स्फाटिकानपि ॥
मणि, मोती, मूँगे, वैडूर्यमणिकी बनी हुई वस्तुएँ, पुखराज, सूर्यकान्तमणि और निर्मल स्फटिकमणिकी वस्तुएँ भी वहाँ देखनेमें आयीं।
जाम्बूनदमयान्येव शातकुम्भमयानि च ।
प्रदीप्तज्वलनाभानि शीतरश्मिप्रभाणि च ॥
जाम्बूनद तथा शातकुम्भसंज्ञक सुवर्णकी बनी हुई बहुत-सी ऐसी वस्तुएँ वहाँ दृष्टिगोचर हुईं, जो प्रज्वलित अग्नि और शीतरश्मि चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रही थीं।
हिरण्यवर्णं रुचिरं श्वेतमभ्यन्तरं गृहम् ।
यदक्षयं गृहे दृष्टं नरकस्य धनं बहु ॥
न हि राज्ञः कुबेरस्य तावद् धनसमुच्चयः ।
दृष्टपूर्वः पुरा साक्षान्महेन्द्रसदनेष्वपि ॥
नरकासुरका भीतरी भवन सुवर्णके समान सुन्दर, कान्तिमान् एवं उज्ज्वल था। उसके घरमें जो असंख्य एवं अक्षय धन दिखायी दिया, उतनी धनराशि राजा कुबेरके घरमें भी नहीं है। देवराज इन्द्रके भवनमें भी पहले कभी उतना वैभव नहीं देखा गया था।

इन्द्र उवाच

इमानि मणिरत्नानि विविधानि वसूनि च ॥
हेमसूत्रा महाकक्ष्यास्तोमरैर्वीर्यशालिनः ।
भीमरूपाश्च मातङ्गाः प्रवालविकृताः कुथाः ॥
विमलाभिः पताकाभिर्वासांसि विविधानि च ।
ते च विंशतिसाहस्रा द्विस्तावत्यः करेणवः ॥
इन्द्र बोले— जनार्दन! ये जो नाना प्रकारके माणिक्य, रत्न, धन तथा सोनेकी जालियोंसे सुशोभित बड़े-बड़े हौदोंवाले, तोमरसहित पराक्रमशाली बड़े भारी गजराज एवं उनपर बिछानेके लिये मूँगेसे विभूषित कम्बल, निर्मल पताकाओंसे युक्त नाना प्रकारके वस्त्र

आदि हैं, इन सबपर आपका अधिकार है। इन गजराजोंकी संख्या बीस हजार है तथा इससे दूनी हथिनियाँ हैं। अष्टौ शतसहस्राणि देशजाश्चोत्तमा हयाः ।
गोभिश्चाविकृतैर्यानैः कामं तव जनार्दन ।।
जनार्दन! यहाँ आठ लाख उत्तम देशी घोड़े हैं और बैल जुते हुए नये-नये वाहन हैं। इनमेंसे जिनकी आपको आवश्यकता हो, वे सब आपके यहाँ जा सकते हैं।
आविकानि च सूक्ष्माणि शयनान्यासनानि च ।
कामव्याहारिणश्चैव पक्षिणः प्रियदर्शनाः ।।
चन्दनागुरुमिश्राणि यानानि विविधानि च ।
एतत् ते प्रापयिष्यामि वृष्ण्यावासमरिंदम ।।
शत्रुदमन! ये महीन ऊनी वस्त्र, अनेक प्रकारकी शय्याएँ, बहुत-से आसन, इच्छानुसार बोली बोलनेवाले देखनेमें सुन्दर पक्षी, चन्दन और अगुरुमिश्रित नाना प्रकारके रथ—ये सब वस्तुएँ मैं आपके लिये वृष्णियोंके निवासस्थान द्वारकामें पहुँचा दूँगा।

भीष्म उवाच

देवगन्धर्वरत्नानि दैतेयासुरजानि च ।
यानि सन्तीह रत्नानि नरकस्य निवेशने ।।
एतत् तु गरुडे सर्वं क्षिप्रमारोप्य वासवः ।
दाशार्हपतिना सार्धमुपायान्मणिपर्वतम् ।।
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! देवता, गन्धर्व, दैत्य और असुरसम्बन्धी जितने भी रत्न नरकासुरके घरमें उपलब्ध हुए, उन्हें शीघ्र ही गरुड़पर रखकर देवराज इन्द्र दाशार्हवंशके अधिपति भगवान् श्रीकृष्णके साथ मणिपर्वतपर गये।
तत्र पुण्या ववुर्वाताः प्रभाश्चित्राः समुज्ज्वलाः ।
प्रेक्षतां सुरसङ्घानां विस्मयः समपद्यत ।।
वहाँ बड़ी पवित्र हवा बह रही थी तथा विचित्र एवं उज्ज्वल प्रभा सब ओर फैली हुई थी। यह सब देखकर देवताओंको बड़ा विस्मय हुआ।
त्रिदशा ऋषयश्चैव चन्द्रादित्यौ यथा दिवि ।
प्रभया तस्य शैलस्य निर्विशेषमिवाभवत् ।।
आकाशमण्डलमें प्रकाशित होनेवाले देवता, ऋषि, चन्द्रमा और सूर्यकी भाँति वहाँ आये हुए देवगण उस पर्वतकी प्रभासे तिरस्कृत हो साधारण-से प्रतीत हो रहे थे।
अनुज्ञातस्तु रामेण वासवेन च केशवः ।
प्रीयमाणो महाबाहुर्विवेश मणिपर्वतम् ।।

तदनन्तर बलरामजी तथा देवराज इन्द्रकी आज्ञासे महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णने नरकासुरके मणिपर्वतपर बने हुए अन्तःपुरमें प्रसन्नतापूर्वक प्रवेश किया। तत्र वैदूर्यवर्णानि ददर्श मधुसूदनः । सतोरणपताकानि द्वाराणि शरणानि च ॥ मधुसूदनने देखा; उस अन्तःपुरके द्वार और गृह वैदूर्यमणिके समान प्रकाशित हो रहे हैं। उनके फाटकोंपर पताकाएँ फहरा रही थीं। चित्रग्रथितमेघाभः प्रबभौ मणिपर्वतः । हेमचित्रपताकैश्च प्रासादैरुपशोभितः ॥ सुवर्णमय विचित्र पताकाओंवाले महलोंसे सुशोभित वह मणिपर्वत चित्रलिखित मेघोंके समान प्रतीत होता था। हर्म्याणि च विशालानि मणिसोपानवन्ति च । तत्रस्था वरवर्णाभा ददृशुर्मधुसूदनम् ॥ गन्धर्वसुरमुख्यानां प्रिया दुहितरस्तदा । त्रिविष्टपसमे देशे तिष्ठन्तमपराजितम् ॥ उन महलोंमें विशाल अट्टालिकाएँ बनी थीं, जिनपर चढ़नेके लिये मणिनिर्मित सीढ़ियाँ सुशोभित हो रही थीं। वहाँ रहनेवाली प्रधान-प्रधान गन्धर्वों और सुरोंकी परम सुन्दरी प्यारी पुत्रियोंने उस स्वर्गके समान प्रदेशमें खड़े हुए अपराजित वीर भगवान् मधुसूदनको देखा। परिवव्रुर्महाबाहुमेकवेणीधराः स्त्रियः । सर्वाः काषायवासिन्यः सर्वाश्च नियतेन्द्रियाः ॥ देखते-देखते ही उन सबने महाबाहु श्रीकृष्णको घेर लिया। वे सभी स्त्रियाँ एक वेणी धारण किये गेरुए वस्त्र पहने इन्द्रियसंयमपूर्वक वहाँ तपस्या करती थीं। व्रतसंतापजः शोको नात्र काश्चिदपीडयत् । अरजांसि च वासांसि बिभ्रत्यः कौशिकान्यपि ॥ समेत्य यदुसिंहस्य चक्रुरस्याञ्जलिं स्त्रियः । ऊचुश्चैनं हृषीकेशं सर्वास्ताः कमलेक्षणाः ॥ उस समय व्रत और संतापजनित शोक उनमेंसे किसीको पीड़ा नहीं दे सका। वे निर्मल रेशमी वस्त्र पहने हुए यदुवीर श्रीकृष्णके पास जा उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गयीं। उन कमलनयनी कामिनियोंने अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंके स्वामी श्रीहरिसे इस प्रकार कहा।

कन्यका ऊचुः

नारदेन समाख्यातमस्माकं पुरुषोत्तम । आगमिष्यति गोविन्दः सुरकार्यार्थसिद्धये ॥ कन्याएँ बोलीं— पुरुषोत्तम! देवर्षि नारदने हमसे कह रखा था कि 'देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये भगवान् गोविन्द यहाँ पधारेंगे। सोऽसुरं नरकं हत्वा निशुम्भं मुरमेव च । भौमं च सपरीवारं हयग्रीवं च दानवम् ॥ तथा पञ्चजनं चैव प्राप्स्यते धनमक्षयम् । 'एवं वे सपरिवार नरकासुर, निशुम्भ, मुर, दानव हयग्रीव तथा पंचजनको मारकर अक्षय धन प्राप्त करेंगे। सोऽचिरेणैव कालेन युष्मन्मोक्ता भविष्यति ॥ एवमुक्त्वागमद् धीमान् देवर्षिर्नारदस्तथा । 'थोड़े ही दिनोंमें भगवान् यहाँ पधारकर तुम सब लोगोंका इस संकटसे उद्धार करेंगे।' ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् देवर्षि नारद यहाँसे चले गये। त्वां चिन्तयानाः सततं तपो घोरमुपास्महे ।। कालेऽतीते महाबाहुं कदा द्रक्ष्याम माधवम् । हम सदा आपका ही चिन्तन करती हुई घोर तपस्यामें लग गयीं। हमारे मनमें यह संकल्प उठता रहता था कि कितना समय बीतनेपर हमें महाबाहु माधवका दर्शन प्राप्त होगा।

इत्येवं हृदि संकल्पं कृत्वा पुरुषसत्तम ।।
तपश्चराम सततं रक्ष्यमाणा हि दानवैः ।
पुरुषोत्तम! यही संकल्प लेकर दानवोंद्वारा सुरक्षित हो हम सदा तपस्या करती आ रही हैं।
गान्धर्वेण विवाहेन विवाहं कुरु नः प्रियम् ।।
ततोऽस्मत्प्रियकामार्थं भगवान् मारुतोऽब्रवीत् ।
यथोक्तं नारदेनाद्य न चिरात् तद् भविष्यति ।।
भगवन्! आप गान्धर्व विवाहकी रीतिसे हमारे साथ विवाह करके हमारा प्रिय करें। हमारे पूर्वोक्त मनोरथको जानकर भगवान् वायुदेवने भी हम सबके प्रिय मनोरथकी सिद्धिके लिये कहा था कि ‘देवर्षि नारदजीने जो कहा है, वह शीघ्र ही पूर्ण होगा’।

भीष्म उवाच

तासां परमनारीणामृषभाक्षं पुरस्कृतम् ।
ददृशुर्देवगन्धर्वा गृष्टीनामिव गोपतिम् ।।
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! देवताओं तथा गन्धर्वोंने देखा, वृषभके समान विशाल नेत्रोंवाले भगवान् श्रीकृष्ण उन परम सुन्दरी नारियोंके समक्ष वैसे ही खड़े थे, जैसे नयी गायोंके आगे साँड़ हो।
तस्य चन्द्रोपमं वक्त्रमुदीक्ष्य मुदितेन्द्रियाः ।
सम्प्रहृष्टा महाबाहुमिदं वचनमब्रुवन् ।।
भगवान्‌के मुखचन्द्रको देखकर उन सबकी इन्द्रियाँ उल्लसित हो उठीं और वे हर्षमें भरकर महाबाहु श्रीकृष्णसे पुनः इस प्रकार बोलीं।

कन्यका ऊचुः

सत्यं बत पुरा वायुरिदमस्मानिहाब्रवीत् ।
सर्वभूतकृतज्ञश्च महर्षिरपि नारदः ।।
कन्याओंने कहा— बड़े हर्षकी बात है कि पूर्व-कालमें वायुदेवने तथा सम्पूर्ण भूतोंके प्रति कृतज्ञता रखनेवाले महर्षि नारदजीने जो बात कही थी, वह सत्य हो गयी।
विष्णुर्नारायणो देवः शङ्खचक्रगदासिधृक् ।
स भौमं नरकं हत्वा भर्ता वो भविता ह्यतः ।।
उन्होंने कहा था कि ‘शंख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले सर्वव्यापी नारायण भगवान् विष्णु भूमिपुत्र नरकको मारकर तुमलोगोंके पति होंगे’।
दिष्ट्या तस्यर्षिमुख्यस्य नारदस्य महात्मनः ।
वचनं दर्शनादेव सत्यं भवितुमर्हति ।।

ऋषियोंमें प्रधान महात्मा नारदका वह वचन आज आपके दर्शनमात्रसे सत्य होने जा रहा है, यह बड़े सौभाग्यकी बात है।

यत् प्रियं बत पश्याम वक्त्रं चन्द्रोपमं तु ते ।
दर्शनेन कृतार्थाः स्मो वयमद्य महात्मनः ॥
तभी तो आज हम आपके परम प्रिय चन्द्रतुल्य मुखका दर्शन कर रही हैं। आप परमात्माके दर्शनमात्रसे ही हम कृतार्थ हो गयीं।

भीष्म उवाच

उवाच स यदुश्रेष्ठः सर्वास्ता जातमन्मथाः ।
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! भगवान्‌के प्रति उन सबके हृदयमें कामभावका संचार हो गया था। उस समय यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णने उनसे कहा।

श्रीभगवानुवाच

यथा ब्रूत विशालाक्ष्यस्तत् सर्वं वो भविष्यति ॥
**श्रीभगवान् बोले—**विशाल नेत्रोंवाली सुन्दरियो! जैसा तुम कहती हो, उसके अनुसार तुम्हारी सारी अभिलाषा पूर्ण हो जायगी।

भीष्म उवाच

तानि सर्वाणि रत्नानि गमयित्वाथ किङ्करैः ।
स्त्रियश्च गमयित्वाथ देवतानृपकन्यकाः ॥
वैनतेयभुजे कृष्णो मणिपर्वतमुत्तमम् ।
क्षिप्रमारोपयाञ्चक्रे भगवान् देवकीसुतः ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! सेवकोंद्वारा उन सब रत्नोंको तथा देवताओं एवं राजाओं आदिकी कन्याओंको द्वारका भेजकर देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने उस उत्तम मणिपर्वतको शीघ्र ही गरुड़की बाँह (पंख या पीठ)-पर चढ़ा दिया।

सपक्षिगणमातङ्गं सव्यालमृगपन्नगम् ।
शाखामृगगणैर्जुष्टं सप्रस्तरशिलातलम् ॥
न्यङ्कुभिश्च वराहेश्च रुरुभिश्च निषेवितम् ।
सप्रपातमहासानुं विचित्रशिखिसंकुलम् ॥
तं महेन्द्रानुजः शौरिश्चकार गरुडोपरि ।
पश्यतां सर्वभूतानामुत्पाट्य मणिपर्वतम् ॥
केवल पर्वत ही नहीं, उसपर रहनेवाले जो पक्षियोंके समुदाय, हाथी, सर्प, मृग, नाग, बंदर, पत्थर, शिला, न्यंकु, वराह, रुरु मृग, झरने, बड़े-बड़े शिखर तथा विचित्र मोर आदि